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पत्नी का पैकेज 11 लाख, फिर भी तलाक के बाद HC ने पति से कहा- 'गुजारा भत्ता तो देना पड़ेगा'

इलाहाबाद हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान पति ने कहा कि पत्नी की सालाना आय लगभग 11 लाख रुपये से अधिक है. उसने कहा कि जब पत्नी पहले से ही 11 लाख सालाना कमा रही है तो किस बात का गुजारा भत्ता. लेकिन, फिर पत्नी की तरफ से एक ऐसी दलील रखी गई, जिसके बाद कोर्ट ने पति से कहा कि गुजारा भत्ता तो देना ही पड़ेगा.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया है ये फैसला. (सांकेतिक तस्वीर- India Today)
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सौरभ
16 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 16 फ़रवरी 2026, 12:13 PM IST)
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उत्तर प्रदेश में एक दंपति का तलाक हो गया. पत्नी ने गुजारा भत्ता मांगा. फैमिली कोर्ट ने पति से हर महीने 15,000 रुपये पत्नी को देने का आदेश दिया. वह पहुंच गया इलाहाबाद हाई कोर्ट. उसने कहा कि जब पत्नी पहले से ही 11 लाख सालाना कमा रही है तो किस बात का गुजारा भत्ता. उसे उम्मीद थी कि हाई कोर्ट में उसकी सुनवाई होगी. लेकिन मामला उल्टा पड़ गया. हाई कोर्ट की बेंच ने भी याचिका दाखिल करने वाले पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया.

कोर्ट ने ऐसा क्यों किया? अदालत ने पति की 11 लाख सालाना वाली दलील क्यों नहीं मानी? विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यह याचिका रविंद्र सिंह बिष्ट ने दाखिल की थी. मामला जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ के सामने आया. बिष्ट के वकील का तर्क था कि पत्नी पढ़ी-लिखी हैं, नौकरी करती हैं और आर्थिक रूप से सक्षम हैं. इसलिए उन्हें मेंटेनेंस देने की जरूरत नहीं है. पति ने कहा कि पत्नी की सालाना आय लगभग 11 लाख रुपये से अधिक है. सपोर्ट में, पत्नी ने 2018 में जो इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया था, कोर्ट के सामने रखा गया. इसके मुताबिक उसकी सालाना सैलरी 11,28,780 रुपये बताई गई थी.

लेकिन पत्नी की एक दलील ने पति के सारे तर्क हवा कर दिए. महिला के वकील ने बताया कि पति का पैकेज करीब 40 लाख रुपये सालाना है.

याचिका का विरोध करते हुए, वकील ने कहा कि पति ने कोर्ट के सामने अपनी असली सैलेरी नहीं बताई. इस बात के सपोर्ट में महिला के वकील ने ट्रायल कोर्ट के सामने दर्ज पति का बयान पेश किया. इसमें उसने माना कि वह अप्रैल 2018 से अप्रैल 2020 तक एक कंपनी में काम कर रहा था और उसे हर साल लगभग 40 लाख रुपये का पैकेज मिल रहा था.

इसके बाद अदालत ने नज़ीर पेश करने वाला फैसला दिया. जस्टिस सिंह की बेंच ने कहा,

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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया,

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बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, 

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पति की ओर से यह भी कहा गया कि पत्नी ने अपनी मर्जी से घर छोड़ा, वह वैवाहिक जिम्मेदारियां निभाने को तैयार नहीं थी और पति के बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहने से इनकार कर रही थी. साथ ही, पति ने दावा किया कि उसे अपने बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी और उस पर आर्थिक जिम्मेदारियों का बोझ है. लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को गुज़ारा भत्ता रोकने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना और फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा.

वीडियो: तारीख: कहानी भारत के पहले तलाक की जिसने महिलाओं को उनका अधिकार दिलाया

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