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गुजरात दंगों की जांच में तथ्यों की अनदेखी के आरोप पर क्या बोली SIT?

SIT की जांच रिपोर्ट के आधार पर ही गुजरात दंगों के मामले में मोदी को क्लीन चिट मिली थी.

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सुप्रीम कोर्ट. (तस्वीर- पीटीआई)
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28 अक्तूबर 2021 (अपडेटेड: 28 अक्तूबर 2021, 06:06 PM IST)
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जकिया जाफरी. गुजरात दंगों में मारे गए कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी. जकिया जाफरी ने गुजरात दंगों की जांच में तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी और अन्य लोगों को क्लीन चिट देने वाली SIT रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही ये SIT बनाई गई थी. जकिया जाफरी के दावों के मद्देनजर शीर्ष अदालत ने उस रिपोर्ट को फिर से देखने की बात कही थी. अब SIT ने कहा है कि वो जकिया जाफरी की तरफ से उठाए गए सवालों के जवाब देगी. उसकी तरफ से जाने-माने वकील मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि SIT ने दंगों से जुड़े सभी पहलुओं को कवर करते हुए ही रिपोर्ट तैयार की थी. SIT की रिपोर्ट के आधार पर अहमदाबाद मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट ने नरेंद्र मोदी और 63 अन्य आरोपियों को क्लीन चिट दी थी. बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2017 को इस फैसले को बरकरार रखा था. नवंबर 2018 में जकिया जाफरी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. कहा कि उनकी शिकायतों और दंगों से जुड़े तथ्यों को रिपोर्ट में अनदेखा किया गया. जकिया जाफरी की अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट देखने की बात कही. अब इस पर SIT का जवाब आया है. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक एसआईटी की तरफ से मुकुल रोहतगी ने कहा है कि मामले की जांच सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर की गई थी. उन्होंने जस्टिस एएम खानविलकर की अगुवाई वाली बेंच से कहा,
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इससे पहले मंगलवार 26 अक्टूबर को जकिया जाफरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. उनकी तरफ से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल पेश हुए. सिब्बल ने कोर्ट में दलील दी कि एसआईटी की रिपोर्ट में जकिया जाफरी की शिकायतों और दूसरे जरूरी तथ्यों के अलावा संजीव भट्ट जैसे आईपीएस अधिकारी के सबूतों की भी अनदेखी की गई थी. इसके बाद बेंच ने कहा,
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अब SIR की तरफ से मुकुल रोहतगी ने कह दिया है कि रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी जाएगी. देखना होगा उसके बाद सुप्रीम कोर्ट क्या कदम उठाएगा. इस तरह मिली मोदी को क्लीनचिट गोधराकांड के एक दिन बाद. तारीख, 28 फरवरी 2002. अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी को हजारों लोगों ने घेर लिया. 29 बंगलों और 10 फ्लैटों की इस सोसाइटी में एक पारसी और बाकी मुस्लिम परिवार रहते थे. कांग्रेस सांसद रह चुके एहसान जाफरी भी यहीं रहते थे. हिंसक भीड़ ने सोसायटी पर हमला किया. घरों से निकाल-निकाल कर लोगों को मार डाला. मरने वालों में एहसान जाफरी भी थे. 2006 में एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने पुलिस को फरियाद दी. इसमें उन्होंने इस हत्याकांड के लिए उस वक्त के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, कई मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों को जिम्मेदार बताया. पुलिस ने ये फरियाद लेने से इन्कार कर दिया. 7 नवंबर 2007 को गुजरात हाई कोर्ट ने भी इस फरियाद को FIR मानकर जांच करवाने से इन्कार कर दिया. बाद में 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के 10 बड़े केसों की जांच के लिए आरके राघवन की अध्यक्षता में SIT बनाई. इनमें गुलबर्ग का मामला भी था. 6 मार्च 2009 को ज़किया की फरियाद की जांच का जिम्मा भी सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को सौंपा. 8 फरवरी 2012 को एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट अहमदाबाद मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की कोर्ट में पेश की. मजिस्ट्रेट ने SIT की रिपोर्ट के आधार पर माना कि नरेंद्र मोदी और दूसरे 63 लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं.

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