जिस सरकारी इंस्टीट्यूट पर वैज्ञानिक बनाने की जिम्मेदारी उसके पास सैलरी देने के पैसे तक नहीं
वैज्ञानिकों, रिसर्चरों से कहा गया आधी सैलरी नहीं मिलेगी.
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TIFR की 1945 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से प्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की देख-रेख में हुई थी. भाभा (बाएं). फाइल फोटो. इडिया टुडे.
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देश के परमाणु ऊर्जा वैज्ञानिकों के लिए तनख्वाह के लाले पड़ रहे हैं. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं. इसका खुलासा उस वक्त हुआ जब सेंटर के रजिस्ट्रार ने फंड की कमी होने के बाबत कर्मचारियों को चिट्ठी लिखी. रजिस्ट्रार विंग कमांडर (रिटायर्ड) जॉर्ज एंटोनी ने कर्मचारियों को लिखा कि उनको फरवरी की सिर्फ आधी तनख्वाह ही दी जा सकती है. संस्थान के पास फंड की कमी है. एंटोनी की ये चिट्ठी वायरल होते ही मुंबई से दिल्ली तक खलबली मच गई. आनन-फानन में फैसला हुआ और कर्मचारियों के खाते में पूरी सेलरी डाली गई. मगर रजिस्ट्रार की चिट्ठी ने संस्थान की पोल खोलकर रख दी.
क्या काम करता है ये संस्थान? टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च TIFR भारत सरकार के अधीन राष्ट्रीय संस्थान है. इस इंस्टीट्यूट की स्थापना साल 1945 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से प्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की देख-रेख में हुआ था. संस्थान में केमिस्ट्री, बॉयलॉजी, मैथमैटिक्स, कंप्यूटर साइंस और साइंस एजुकेशन पर रिसर्च किया जाता है. इसका मुख्य कैंपस मुंबई में है. बाकी पुणे, बेंगलुरू और हैदराबाद में इससे संबद्ध दूसरे सेंटर हैं. संस्थान मास्टर डिग्री के साथ रिसर्च प्रोग्राम संचालित करता है. साल 2002 में इस संस्थान को भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया गया था. संस्थान के मुंबई समेत सभी सेंटर में इस वक्त करीब 3,000 स्टाफ और स्टूडेंट्स हैं. इन सभी के लिए रजिस्ट्रार ने लेटर लिखा.

संस्थान का काफी नाम रहा है. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.
रजिट्रार ने क्या लिखा चिट्ठी में? रजिस्ट्रार जॉर्ज एंटोनी की ओर से लिखी गई चिट्ठी में कहा गया कि 'संस्थान में इस वक्त पैसे की कमी है. इस वजह से स्टाफ, स्टूडेंट्स और पोस्ट डेक्टोरियल फेलो को फरवरी महीने में उनकी सैलरी का 50 फीसदी ही दिया जाएगा. बाकी की 50 परसेंट तनख्वाह तब दी जाएगी, जब संस्थान के पास पर्याप्त फंड आ जाएगा.' रजिस्ट्रार की ये चिट्ठी मिलते ही संस्थान के वैज्ञानिकों में खलबली मच गई. चिट्ठी वायरल हुई तो खबरें भी छपने लगीं. विवाद बढ़ने पर कर्मचारियों के खाते में उनकी पूरी सेलरी भेज दी गई.
सरकार से सवाल कर रहे लोग देश का मशहूर संस्थान इन दिनों संकट में है. इसको लेकर लोग सरकार पर उंगली उठा रहे हैं. लोगों ने मानव संस्थान विकास मंत्रालय से इस बारे में जवाब देने की भी मांग की है.
वीडियोः राफेल डील में ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का जिक्र, मगर ये होता क्या है?
क्या काम करता है ये संस्थान? टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च TIFR भारत सरकार के अधीन राष्ट्रीय संस्थान है. इस इंस्टीट्यूट की स्थापना साल 1945 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से प्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की देख-रेख में हुआ था. संस्थान में केमिस्ट्री, बॉयलॉजी, मैथमैटिक्स, कंप्यूटर साइंस और साइंस एजुकेशन पर रिसर्च किया जाता है. इसका मुख्य कैंपस मुंबई में है. बाकी पुणे, बेंगलुरू और हैदराबाद में इससे संबद्ध दूसरे सेंटर हैं. संस्थान मास्टर डिग्री के साथ रिसर्च प्रोग्राम संचालित करता है. साल 2002 में इस संस्थान को भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया गया था. संस्थान के मुंबई समेत सभी सेंटर में इस वक्त करीब 3,000 स्टाफ और स्टूडेंट्स हैं. इन सभी के लिए रजिस्ट्रार ने लेटर लिखा.

संस्थान का काफी नाम रहा है. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.
रजिट्रार ने क्या लिखा चिट्ठी में? रजिस्ट्रार जॉर्ज एंटोनी की ओर से लिखी गई चिट्ठी में कहा गया कि 'संस्थान में इस वक्त पैसे की कमी है. इस वजह से स्टाफ, स्टूडेंट्स और पोस्ट डेक्टोरियल फेलो को फरवरी महीने में उनकी सैलरी का 50 फीसदी ही दिया जाएगा. बाकी की 50 परसेंट तनख्वाह तब दी जाएगी, जब संस्थान के पास पर्याप्त फंड आ जाएगा.' रजिस्ट्रार की ये चिट्ठी मिलते ही संस्थान के वैज्ञानिकों में खलबली मच गई. चिट्ठी वायरल हुई तो खबरें भी छपने लगीं. विवाद बढ़ने पर कर्मचारियों के खाते में उनकी पूरी सेलरी भेज दी गई.
सरकार से सवाल कर रहे लोग देश का मशहूर संस्थान इन दिनों संकट में है. इसको लेकर लोग सरकार पर उंगली उठा रहे हैं. लोगों ने मानव संस्थान विकास मंत्रालय से इस बारे में जवाब देने की भी मांग की है.
प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी ट्वीट करके इस संस्थान की माली हालत पर चिंता जताई. उन्होंने कहा, 'टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च एक संकटग्रस्त राज्य की तरह हो गया है. देश का बेहतरीन वैज्ञानिक रिसर्च इंस्टीट्यूट इस वक्त बुरे आर्थिक हालात में फंस गया है.'@HRDMinistry
— Arnav Mandal (@EtoKyeth) March 6, 2019
please explain why this has happened. If this is the condition of TIFR, then what will be the future of education in our country? pic.twitter.com/0UDXLR4HcV
The perilous financial state of one of India’s finest scientific research institutes https://t.co/Zr4HYBzycC
— Ramachandra Guha (@Ram_Guha) March 7, 2019
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