दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो, जिन्हें बाहर खाना पसंद होता है.घूम-घूमकर खाने वाले लोग. चुन-चुनकर खाने वाले लोग. दुनिया-जहान की डिशेज पर एकदमविनोद दुआ वाली राय रखने वाले लोग, 'मदनी वाले का मुर्ग मुसल्लम खाइए साहब, उसका जोसौंठ और काली मिर्च का इस्तेमाल है, कसम से मेरी दादी को मात करता है' या 'यहां केस्टेक्स ट्राय करो, मीडियम ग्रिल्ड; कसम से बहुत सही होता है'. ये लोग बाहर खाने केलिए पैसे खर्च करने में भी बड़े लिबरल होते हैं.दूसरी कैटेगरी उन लोगों की होती है, जो बस जीने के लिए खाते हैं. ये बाहर तभी खातेहैं, जब इन्हें खाना पड़ता है. मसलन कोई ऐसा दिन, जब दरवाज़े के बाहर रखा टिफिनखोलने का दिल न हो या जब मेस का खाना निगलने की हिम्मत न हो या जिस दिन टेस्ट चेंजकरना हो. बस तभी. यही वो अभागे हैं, जो शू-शां जगह भी मनाते हैं कि जो भी मिले, हाफज़रूर मिले, क्योंकि फुल ज़्यादा होता है. पूरा खा नहीं पाते और पैसा अलग भुगतनापड़ता है. हाफ में चार पैसे बचते हैं सो अलग. यही वो लोग हैं, जो बाहर खाने से पहलेपचास लोगों को फोन लगाते हैं कि साथ चल दो (ताकि बिल शेयर हो जाए).पिक्चरः restaurantgroupieदोनों कैटेगरी के लोगों के लिए एक अच्छी खबर है, लेकिन इसमें ज़यादा भला दूसरीकैटेगरी वालों का हो रहा है. अब किसी डिश के साथ 'हाफ' बोलने पर इनको वेटर के'कोल्ड लुक' का शिकार नहीं बनना पड़ेगा, क्योंकि सरकार ऐसा कानून लाने के बारे मेंसोच रही है, जिसके बाद रेस्टोरेंट्स हाफ प्लेट देने से मना नहीं कर पाएंगे. और सोनेपर सुहागा ये कि रेस्टोरेंट्स हाफ प्लेट ऑर्डर करने पर आपको एक्सट्रा चार्ज नहीं करपाएंगे. माने हाफ प्लेट मंगाएंगे, तो फुल प्लेट से आधे पैसे ही लगेंगे. वरना अभी तोऐसा है कि रेस्टोरेंट्स हाफ प्लेट देकर अहसान भी लादते हैं और हाफ से ज़्यादा पैसेझटक लेते हैं. नवभारत टाइम्स के हवाले से खबर है कि कंज़्यूमर मिनिस्ट्री अभी इसकेलिए राय-मशविरा कर रही है. रेस्टोरेंट असोसिएशन से भी बातचीत होगी. याने कुछ वक्तलग जाएगा, पर अभी से खुश होने में कोई नुकसान नहीं है. खुशी फुल हो या हाफ, फ्रीही होती है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:अब अगर रेस्टोरेंट में सर्विस चार्ज देने का मन नहीं, तो मत दो