क्या डीज़ल को लेकर पुतिन ने फ्रांस में दंगा भड़का दिया है?
सरकार को लोगों के आगे झुककर बढ़ी कीमतें वापस लेने का ऐलान करना पड़ा.
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17 नवंबर को ये 'येलो वेस्ट' प्रोटेस्ट शुरू हुआ. तब सरकार ने इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखाई. डीजल पर टैक्स बढ़ाने के खिलाफ शुरू हुआ ये मूवमेंट सरकार विरोधी प्रदर्शन में तब्दील हो गया है. सोशल सिक्यॉरिटी, वेतन जैसे मुद्दे भी जुड़ गए हैं इसके साथ (फोटो: रॉयटर्स)
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डीज़ल की वजह से फ्रांस में इमरजेंसी जैसी स्थिति पैदा हो गई है. 17 नवंबर को यहां डीज़ल की महंगाई पर एक प्रदर्शन शुरू हुआ. न कोई नेता इसका, न कोई एक चेहरा. ये प्रोटेस्ट सोशल मीडिया के रास्ते देशभर में फैल गया. सबसे ज्यादा असर पड़ा राजधानी पैरिस पर. शुरुआत में लोग डीजल पर टैक्स बढ़ाने के खिलाफ एकजुट हुए. लाखों लोग सड़कों पर उतर आए. उसके बाद से हर वीकेंड पर लोग एकजुट होने लगे. ये पूरा मूवमेंट राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के खिलाफ मुहिम में बदल गया. डीजल की महंगाई पर शुरू हुए मूवमेंट में गिरता जीवन स्तर, आमदनी का अंतर, अमीर-गरीब के बीच बढ़ते फासले जैसे मुद्दे भी मिल गए.

डॉनल्ड ट्रंप पैरिस क्लाइमेट डील के विरोधी रहे हैं. उन्हें क्लाइमेट चेंज से जुड़ी वैज्ञानिकों की चिंताएं भी समझ नहीं आती हैं. फ्रांस में चल रहे मूवमेंट ने उन्हें पैरिस समझौते पर अटैक करने का बहाना दे दिया. ट्रंप के इस ट्वीट पर फ्रांस ने कहा कि वो उनके अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी न करें.
क्लाइमेट डील से महंगाई का क्या रिश्ता है? ईंधनों की वजह से खूब सारा कार्बन एमिशन होता है. प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए फ्रांस कई चीजें कर रहा है. इनमें से ही एक है फ्यूल टैक्स. इसके पीछे आइडिया ये है कि ईंधन महंगा होगा तो लोग गाड़ियों का इस्तेमाल सोच-समझकर करेंगे. पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा इस्तेमाल होगा. पेट्रोल-डीज़ल की जगह वैकल्पिक और साफ ऊर्जा (इलेक्ट्रिक कार,सोलर ऐनर्जी) वगैरह के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा. ऊंचे टैक्स से जो रकम आएगी, उससे सरकार पर्यावरण की बेहतरी के लिए फंड जुटा पाएगी. इको-फ्रेंडली प्रॉजेक्ट्स में ज्यादा खर्च कर पाएगी.
पीली बंडी वाले क्या कह रहे हैं? प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार मिडिल और लोअर क्लास की सोच ही नहीं रही. कि उसे बड़े शहरों से बाहर रहने वालों की दिक्कतें ही नहीं पता. शहरों में फिर भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट अच्छा है. मगर शहर के बाहर रहने वाले लोगों को कहीं आने-जाने के लिए कार का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है. मूवमेंट वाले कह रहे हैं कि पहले से ही देश में इतनी महंगाई है. ईंधन पर टैक्स की ऊंची दरों ने महंगाई को और बढ़ा दिया है. मिडिल क्लास और उससे कम आमदनी वाले परिवार पहले ही किसी तरह से जोड़-तोड़कर महीना चलाते हैं. इस महंगाई ने उनका गुजर-बसर करना बहुत मुश्किल कर दिया है. उनका इल्जाम है कि सरकार की नीतियों से अमीरों और कारोबारियों को फर्क नहीं पड़ता. मगर बाकी लोग बदहाल हो गए हैं.

ये स्टारबक्स का एक कैफे. ऐसे ही कई दुकानें तोड़ी और जला दी गई हैं. दिसंबर महीना यानी क्रिसमस. क्रिसमस यानी लंबी छुट्टियां. पैरिस काफी लोकप्रिय है टूरिस्ट्स के बीच. मगर इस मूवमेंट की वजह से पर्यटन काफी कम हुआ है (फोटो: रॉयटर्स)
सरकार ने कैसे रिऐक्ट किया? फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने शुरू में सख्ती दिखाई. पुलिस के सहारे मूवमेंट दबाने की कोशिश की. कहा, न हिंसा बर्दाश्त करेंगे और न टैक्स वापस लेंगे. मगर फिर सरकार को झुकना पड़ा. जनवरी से जो कीमतें बढ़नी थीं, उसे वापस लेने को राज़ी हो गई सरकार. मगर विरोध खत्म नहीं हुआ. डीजल की महंगाई से शुरू हुआ प्रोटेस्ट वेतन बढ़ाने, टैक्स घटाने, पेंशन में इज़ाफा करने जैसी मांगों तक फैल गया है. हालांकि इन प्रदर्शनों को राइट विंग से भी जोड़कर देखा जा रहा है.

ये तस्वीर काफी शेयर हो रही है. अगर ये मान भी लिया जाए कि रूस सच में ही फ्रांस की स्थितियां भड़का रहा है, तो क्या ये चीज पुतिन का कद और नहीं बढ़ाएगी? कि रूस इतना ताकतवर है कि फ्रांस में इतने बड़े स्तर का मूवमेंट खड़ा कर दे रहा है (फोटो: ट्विटर)
क्या रूस आग में घी डाल रहा है? क्या इस मूवमेंट को भड़काने में रूस की कोई भूमिका है? फ्रांस इसकी जांच कर रहा है. ऐसी रिपोर्ट्स आई हैं कि रूस, खासतौर पर क्रेमलिन से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स इस येलो वेस्ट्स मूवमेंट पर काफी ऐक्टिव हैं. इनसे #giletsjaunes हैशटैग प्रमोट किया जा रहा है. फ्रांस में इस मूवमेंट का यही नाम है. रूस पर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दखलंदाजी करने का इल्जाम लग चुका है. फ्रांस चुनाव के समय भी ऐसी खबरें आई थीं कि रूस फेक न्यूज के सहारे इमैनुअल मैक्रों के इलेक्शन कैंपेन को फ्लॉप करने में जुटा है. अब ये येलो वेस्ट्स वाली बात आई है. वैसे बीते कुछ सालों में यूरोप और अमेरिका अक्सर अपनी दिक्कतों का ठीकरा रूस के सिर फोड़ते आए हैं. कुछ भी गलत हो, रूस पर उंगली उठा दो. अगर ये साबित भी हो जाए कि किसी बाहरी ताकत ने इस मूवमेंट में घी डालने का काम किया है, उस सूरत में भी ये बात पक्की रहेगी कि फ्रांस में लोग खुद पर पड़ रहे आर्थिक बोझ से उबल रहे हैं. वो सिस्टम से, सरकार से नाराज हैं.

फ्रांस की देखादेखी ये 'येलो वेस्ट्स प्रोटेस्ट' बेल्जियम भी पहुंच गया. ये राजधानी ब्रसेल्स में चल रहे मूवमेंट की एक तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)
जिसकी जितनी पॉकेट होगी, उतना ही बोझ डालेंगे उस पर इस मूवमेंट के सहारे लोग अपनी आर्थिक हताशा जाहिर कर रहे हैं. उन्हें राजनैतिक नेतृत्व पर भरोसा नहीं रह गया है. उन्हें लग रहा है कि सड़क पर उतरना और अपने लिए लड़ना ही इकलौता रास्ता बचा है. इस नाराजगी से पार पाना मैक्रों सरकार की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है. हालांकि मूवमेंट थोड़ा कमजोर हुआ है. मगर इसके सहारे जो मेसेज सरकार तक पहुंचाना चाहते थे लोग, वो पहुंचा चुके हैं. 10 दिसंबर को मैक्रों फ्रांस को संबोधित करने वाले हैं. शायद इसमें वो अहम ऐलान करें. शायद इस मूवमेंट की वजह से मैक्रों समेत बाकी सरकारों को एक जरूरी सबक मिले. कि पर्यावरण की हिफाजत बेहद जरूरी है. मगर इसके लिए पहले लोगों को भरोसे में लेना होगा. अपना आज लुटाकर भविष्य सुरक्षित करने के लिए कैसे तैयार करेंगे आप लोगों को? इसीलिए आय के हिसाब से बोझ बांटना जरूरी है. वरना वही होगा, जो फ्रांस में हो रहा है.
पेट्रोल डीजल के दाम इतने बढ़ गए हैं कि फ्रांस की राजधानी पेरिस में दंगे हो रहे हैं
लोग मैक्रों का इस्तीफा मांग रहे हैं लोग कह रहे हैं, मैक्रों को गरीबों की, गांव-कस्बों और छोटे शहरों में रहने वालों की पड़ी ही नहीं है. लोग मैक्रों का इस्तीफा मांग रहे हैं. गुस्साई भीड़ मिलकर हिंसा कर रही है. इमारतों, कारों में आग लगा रही है. पब्लिक प्रॉपर्टी तोड़-फोड़ रही है. पूरा फ्रांस जैसे एड़ियों पर है. इन प्रदर्शनों की वजह से जो हालत बिगड़ी है, उसके कारण फ्रांस को खूब आर्थिक नुकसान हो रहा है. टूरिज़म कम हो गया है. दुकानों और कारोबार को नुकसान हो रहा है. पहले-पहल सरकार के ऊपर इस मूवमेंट से जूं भी नहीं रेंगी. लेकिन फिर ये इतना फैला, इतना फैला कि सरकार पूरी तरह से सकपका गई. अब वो किसी भी तरह से लोगों का गुस्सा शांत करवाना चाहती है.France's 'yellow vests': a movement of many shades https://t.co/FTJZBICrSm
— The Local France (@TheLocalFrance) December 10, 2018
pic.twitter.com/ho5aha0NIO
विरोध प्रदर्शन करने वाले ये लोग हैं कौन? इन्होंने खुद को नाम दिया है- ज़िलै ज़ोन. हिंदी में इसका मतलब पीली बंडी जैसा कुछ होगा. इस मूवमेंट से जुड़े लोग शरीर के ऊपरी हिस्से में ये वेस्ट पहनते हैं. ये एक किस्म का सेफ्टी जैकेट होता है. अपने चमकीले रंग की वजह से दूर से ही दिख जाता है. फ्रांस में ऐसा नियम है कि ये 'येलो वेस्ट' गाड़ियों में रखना ही होगा. ताकि अगर ऐक्सिडेंट हो, तो गाड़ी में बैठा इंसान ये वेस्ट पहन ले. और वो दिख जाए औरों को. उस तक मदद पहुंच जाए. चूंकि प्रोटेस्ट हो रहा है ईंधन की महंगाई पर, इसीलिए लोगों ने खुद को इस 'येलो वेस्ट' से कनेक्ट किया है. कि महंगाई के बोझ तले वो इतने दब गए हैं कि उनको तुरंत हेल्प नहीं मिली तो महंगाई उन्हें पूरी तरह कुचल देगी.Bank of France: Yellow vest violence slashes economic growth https://t.co/fL6JW32ASW
— The Local France (@TheLocalFrance) December 10, 2018
pic.twitter.com/cK3rf8UIz6
पैरिस क्लाइमेट डील दिसंबर 2015 में फ्रांस की राजधानी पैरिस के अंदर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ. इसमें बात हुई दुनिया में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन और कार्बन गैसों के बढ़ते उत्सर्जन पर. इन चीजों की वजह से धरती और इसपर पलने वाले जीवों का अस्तित्व खतरे में है. सम्मेलन में दुनिया के खूब सारे देशों ने तय किया कि तापमान को बढ़ने से रोकना है. इसके लिए सबसे जरूरी था कार्बन उत्सर्जन को कम करना. ये जो समझ बनी देशों के बीच, वो पैरिस क्लाइमेट डील कहलाती है.This image out of France looks like a screenshot from an apocalyptic video game. pic.twitter.com/NyITJkZfxN
— Paul Joseph Watson (@PrisonPlanet) December 9, 2018

डॉनल्ड ट्रंप पैरिस क्लाइमेट डील के विरोधी रहे हैं. उन्हें क्लाइमेट चेंज से जुड़ी वैज्ञानिकों की चिंताएं भी समझ नहीं आती हैं. फ्रांस में चल रहे मूवमेंट ने उन्हें पैरिस समझौते पर अटैक करने का बहाना दे दिया. ट्रंप के इस ट्वीट पर फ्रांस ने कहा कि वो उनके अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी न करें.
क्लाइमेट डील से महंगाई का क्या रिश्ता है? ईंधनों की वजह से खूब सारा कार्बन एमिशन होता है. प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए फ्रांस कई चीजें कर रहा है. इनमें से ही एक है फ्यूल टैक्स. इसके पीछे आइडिया ये है कि ईंधन महंगा होगा तो लोग गाड़ियों का इस्तेमाल सोच-समझकर करेंगे. पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा इस्तेमाल होगा. पेट्रोल-डीज़ल की जगह वैकल्पिक और साफ ऊर्जा (इलेक्ट्रिक कार,सोलर ऐनर्जी) वगैरह के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा. ऊंचे टैक्स से जो रकम आएगी, उससे सरकार पर्यावरण की बेहतरी के लिए फंड जुटा पाएगी. इको-फ्रेंडली प्रॉजेक्ट्स में ज्यादा खर्च कर पाएगी.
फ्रांस में कितना महंगा हैं डीजल? फ्रांस में ज्यादातर लोग डीज़ल वाली कार चलाते हैं. पिछले 12 महीनों में इसकी कीमतें 23 फीसद तक बढ़ गई हैं. इस बीच अगर ग्लोबल कीमतों को ट्रेंड देखें, तो पहले कीमतें बढ़ीं. लेकिन फिर कम भी हुईं. मगर इससे फ्रांस के लोगों को राहत नहीं मिली. बल्कि मैक्रों सरकार ने टैक्स बढ़ा दिया. एक लीटर डीज़ल पर 7.6 सेंट का टैक्स. पेट्रोल पर 3.9 सेंट. जैसे 100 पैसे का एक रुपया होता है. वैसे ही 100 सेंट का एक डॉलर होता है. तो पहले से टैक्स था ही, सरकार ने फिर ऐलान किया कि 1 जनवरी, 2019 से डीज़ल पर लगने वाला हाइड्रोकार्बन टैक्स 6.5 सेंट प्रति लीटर और बढ़ा दिया जाएगा. पेट्रोल पर बढ़ेगा 2.9 सेंट प्रति लीटर. इस ऐलान के बाद लोग बिफर गए.Is it so surprising France in flames after this, Macron's first budget? Top 1% get 6% pay rise. Lowest earners go backwards! Extraordinary. #EnMarche
— Adam Creighton (@Adam_Creighton) December 10, 2018
pic.twitter.com/mJMKGtJtvZ
पीली बंडी वाले क्या कह रहे हैं? प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार मिडिल और लोअर क्लास की सोच ही नहीं रही. कि उसे बड़े शहरों से बाहर रहने वालों की दिक्कतें ही नहीं पता. शहरों में फिर भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट अच्छा है. मगर शहर के बाहर रहने वाले लोगों को कहीं आने-जाने के लिए कार का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है. मूवमेंट वाले कह रहे हैं कि पहले से ही देश में इतनी महंगाई है. ईंधन पर टैक्स की ऊंची दरों ने महंगाई को और बढ़ा दिया है. मिडिल क्लास और उससे कम आमदनी वाले परिवार पहले ही किसी तरह से जोड़-तोड़कर महीना चलाते हैं. इस महंगाई ने उनका गुजर-बसर करना बहुत मुश्किल कर दिया है. उनका इल्जाम है कि सरकार की नीतियों से अमीरों और कारोबारियों को फर्क नहीं पड़ता. मगर बाकी लोग बदहाल हो गए हैं.

ये स्टारबक्स का एक कैफे. ऐसे ही कई दुकानें तोड़ी और जला दी गई हैं. दिसंबर महीना यानी क्रिसमस. क्रिसमस यानी लंबी छुट्टियां. पैरिस काफी लोकप्रिय है टूरिस्ट्स के बीच. मगर इस मूवमेंट की वजह से पर्यटन काफी कम हुआ है (फोटो: रॉयटर्स)
सरकार ने कैसे रिऐक्ट किया? फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने शुरू में सख्ती दिखाई. पुलिस के सहारे मूवमेंट दबाने की कोशिश की. कहा, न हिंसा बर्दाश्त करेंगे और न टैक्स वापस लेंगे. मगर फिर सरकार को झुकना पड़ा. जनवरी से जो कीमतें बढ़नी थीं, उसे वापस लेने को राज़ी हो गई सरकार. मगर विरोध खत्म नहीं हुआ. डीजल की महंगाई से शुरू हुआ प्रोटेस्ट वेतन बढ़ाने, टैक्स घटाने, पेंशन में इज़ाफा करने जैसी मांगों तक फैल गया है. हालांकि इन प्रदर्शनों को राइट विंग से भी जोड़कर देखा जा रहा है.

ये तस्वीर काफी शेयर हो रही है. अगर ये मान भी लिया जाए कि रूस सच में ही फ्रांस की स्थितियां भड़का रहा है, तो क्या ये चीज पुतिन का कद और नहीं बढ़ाएगी? कि रूस इतना ताकतवर है कि फ्रांस में इतने बड़े स्तर का मूवमेंट खड़ा कर दे रहा है (फोटो: ट्विटर)
क्या रूस आग में घी डाल रहा है? क्या इस मूवमेंट को भड़काने में रूस की कोई भूमिका है? फ्रांस इसकी जांच कर रहा है. ऐसी रिपोर्ट्स आई हैं कि रूस, खासतौर पर क्रेमलिन से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स इस येलो वेस्ट्स मूवमेंट पर काफी ऐक्टिव हैं. इनसे #giletsjaunes हैशटैग प्रमोट किया जा रहा है. फ्रांस में इस मूवमेंट का यही नाम है. रूस पर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दखलंदाजी करने का इल्जाम लग चुका है. फ्रांस चुनाव के समय भी ऐसी खबरें आई थीं कि रूस फेक न्यूज के सहारे इमैनुअल मैक्रों के इलेक्शन कैंपेन को फ्लॉप करने में जुटा है. अब ये येलो वेस्ट्स वाली बात आई है. वैसे बीते कुछ सालों में यूरोप और अमेरिका अक्सर अपनी दिक्कतों का ठीकरा रूस के सिर फोड़ते आए हैं. कुछ भी गलत हो, रूस पर उंगली उठा दो. अगर ये साबित भी हो जाए कि किसी बाहरी ताकत ने इस मूवमेंट में घी डालने का काम किया है, उस सूरत में भी ये बात पक्की रहेगी कि फ्रांस में लोग खुद पर पड़ रहे आर्थिक बोझ से उबल रहे हैं. वो सिस्टम से, सरकार से नाराज हैं.

फ्रांस की देखादेखी ये 'येलो वेस्ट्स प्रोटेस्ट' बेल्जियम भी पहुंच गया. ये राजधानी ब्रसेल्स में चल रहे मूवमेंट की एक तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)
जिसकी जितनी पॉकेट होगी, उतना ही बोझ डालेंगे उस पर इस मूवमेंट के सहारे लोग अपनी आर्थिक हताशा जाहिर कर रहे हैं. उन्हें राजनैतिक नेतृत्व पर भरोसा नहीं रह गया है. उन्हें लग रहा है कि सड़क पर उतरना और अपने लिए लड़ना ही इकलौता रास्ता बचा है. इस नाराजगी से पार पाना मैक्रों सरकार की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है. हालांकि मूवमेंट थोड़ा कमजोर हुआ है. मगर इसके सहारे जो मेसेज सरकार तक पहुंचाना चाहते थे लोग, वो पहुंचा चुके हैं. 10 दिसंबर को मैक्रों फ्रांस को संबोधित करने वाले हैं. शायद इसमें वो अहम ऐलान करें. शायद इस मूवमेंट की वजह से मैक्रों समेत बाकी सरकारों को एक जरूरी सबक मिले. कि पर्यावरण की हिफाजत बेहद जरूरी है. मगर इसके लिए पहले लोगों को भरोसे में लेना होगा. अपना आज लुटाकर भविष्य सुरक्षित करने के लिए कैसे तैयार करेंगे आप लोगों को? इसीलिए आय के हिसाब से बोझ बांटना जरूरी है. वरना वही होगा, जो फ्रांस में हो रहा है.
पेट्रोल डीजल के दाम इतने बढ़ गए हैं कि फ्रांस की राजधानी पेरिस में दंगे हो रहे हैं

