रघुराम राजन ने कहा, बिना रोजगार के मोदी के 7% विकास के आंकड़े पर शक
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर ने कहा, एक निष्पक्ष समूह इन आंकड़ों की समीक्षा करे.
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RBI के गवर्नर रहे रघुराम राजन ने कहा है कि जीडीपी के आंकड़ों का संदेह दूर किया जाना चाहिए.
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तारीख- 26 मार्च, 2019. शाम के वक्त अलग-अलग टीवी चैनलों पर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का इंटरव्यू चलता दिखा. इस दौरान उन्होंने इशारे-इशारे में मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की. राजन ने जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल खड़े किए. कहा- 7 फीसदी आर्थिक विकास दर के आंकड़े को लेकर पैदा हुए शक को दूर करना जरूरी है. इसके लिए एक कमेटी का गठन किया जाना चाहिए.
मतलब ये कि एक निष्पक्ष समूह इन आंकड़ों की समीक्षा करे. जीडीपी के आंकड़ों को लेकर मोदी सरकार पर गाहे-बगाहे सवाल उठाए जाते रहे हैं. क्यों? क्योंकि नवंबर, 2018 में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी CSO ने जीडीपी आंकड़ों को संशोधित कर दिया था. और फिर मनमोहन सरकार के दौर में जीडीपी की ग्रोथ कम करके बताई गई थी. इसके बाद से मोदी सरकार के आंकड़ों पर जानकार लोग संदेह जता रहे हैं.
आंकड़ों पर रघुराम राजन ने क्या कहा? रघुराम राजन ने कहा कि जब देश में नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं, तो 7 फीसदी की आर्थिक तरक्की दर का आंकड़ा संदेह के घेरे में आ जाता है. संदेह के इन बादलों को दूर किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्हें ये नहीं पता कि मौजूदा सांख्यिकी आंकड़े किस ओर इशारा कर रहे हैं. देश की सही तरक्की का पता लगाने के लिए इन्हें ठीक किए जाने की जरूरत है.
उन्होंने कहा, 'मैं नरेंद्र मोदी सरकार में एक मंत्री को जानता हूं. उन्होंने कहा था कि नौकरियां नहीं हैं तो हम कैसे 7 फीसदी की आर्थिक विकास दर हासिल कर रहे हैं. इस मामले में एक आशंका तो यही है कि हम 7 प्रतिशत की दर से आगे नहीं बढ़ रहे हैं.' राजन ने मंत्री के नाम का खुलासा नहीं किया.

RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन एक बार फिर सुर्खियों में हैं. फाइल फोटो.
जेटली कह रहे - तरक्की है, तो रोजगार भी हैं वित्तमंत्री अरुण जेटली आर्थिक मामलों के जानकार लोगों के इस तर्क को खारिज करते रहे हैं. उनका तर्क रहता है कि उनकी सरकार के दौरान कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन नहीं हुआ, जिससे ये जाहिर है कि बेरोजगारी नहीं है. वित्तमंत्री की इस बात का मतलब ये है कि देश में बेरोजगारों ने कभी कोई आंदोलन नहीं किया, जिससे इस बात को बल मिलता कि देश में रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं.
फिर आर्थिक जानकार सवाल क्यों खड़े करते हैं सरकार पर? मोदी सरकार पर आंकड़ों को छिपाने का गंभीर आरोप रहा है. NSSO के रोजगार संबंधी आंकड़े अब तक जारी नहीं किए गए हैं. अलग-अलग अखबारों ने इसकी लीक रिपोर्ट प्रकाशित की हैं. आंकड़ों में कहा गया है कि 2017 में बेरोजगारी की दर 45 साल के उच्चस्तर पर पहुंच चुकी है. इसी तरह जीडीपी के आंकड़ों को CSO ने नवंबर, 2018 में संशोधित कर दिया. इसमें CSO ने मनमोहन सरकार के विकास दर के आंकड़ों को घटा दिया गया था. और मोदी सरकार के दौर में विकास दर तेज बताई गई थी. मसलन 2017-18 की विकास दर पहले 6.7 फीसदी थी. बाद में इसे संशोधित करके 7.2 परसेंट बताया गया. इसके बाद से ही आर्थिक मामलों के तमाम जानकार मोदी सरकार के इन आंकड़ों को संदेह की नजर से देख रहे हैं.

cso ने जीडीपी आंकड़ों को संशोधित कर दिया है. सांकेतिक तस्वीर.
पूंजीवाद के खिलाफ क्रांति हो सकती है? इससे पहले बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में रघुराम राजन ने एक और बड़ी बात कही. उन्होंने कहा पूंजीवाद का लाभ आम लोगों को मिलना अब बंद हो रहा है. इससे ये अब खतरे में है. रघुराम राजन ने कहा, 'मेरा मानना है कि पूंजावाद खतरे में है, क्योंकि अब आम लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है. जब कभी ऐसा होता है तो लोग विद्रोह करते हैं. साधारण शिक्षा पाए किसी मध्यवर्गीय युवा का पहले नौकरी ढूंढना आसान था. 2008 के ग्लोबल आर्थिक संकट के बाद हालात बदले हैं. अब ऐसा होना लगभग असंभव है. अब अगर आप सफल होना चाहते हैं तो आपको वाक़ई में बढ़िया शिक्षा चाहिए.'
कौन हैं रघुराम राजन, जिनकी बात को लोग इतनी गंभीरता से लेते हैं? रघुराम राजन भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में प्रमुख अर्थशास्त्री रह चुके हैं. वो बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के गवर्नर मार्क कार्ने के बाद गवर्नर का पदभार संभाल सकते हैं. अभी वो शिकागो विश्वविद्यालय में बतौर प्रोफेसर काम कर रहे हैं. रघुराम राजन का जन्म 3 फरवरी 1964 को मध्यप्रदेश के भोपाल में एक तमिल परिवार में हुआ. 1985 में उन्होंने दिल्ली के आईआईटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी की. उनको आईआईटी दिल्ली के निदेशक ने बेस्ट ऑल राउंड अचीवमेंट का गोल्ड मेडल दिया था.
उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. यहां भी गोल्ड मेडल मिला. राजन ने साल 1991 में मैनेजमेंट में पीएचडी की. वे ग्रेजुएशन के बाद ही शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में बतौर फैकल्टी पढ़ा रहे हैं. 2003 में वे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में सबसे कम उम्र के आर्थिक सलाहकार बनाए गए. साल 2008 के ग्लोबल आर्थिक संकट से उबारने में उन्होंने काफी मदद की. 2008 में वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार नियुक्त हुए. 2012 में वे भारतीय वित्त मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार बनाए गए. सितंबर, 2013 से 2016 तक वे रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे.
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आंकड़ों पर रघुराम राजन ने क्या कहा? रघुराम राजन ने कहा कि जब देश में नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं, तो 7 फीसदी की आर्थिक तरक्की दर का आंकड़ा संदेह के घेरे में आ जाता है. संदेह के इन बादलों को दूर किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्हें ये नहीं पता कि मौजूदा सांख्यिकी आंकड़े किस ओर इशारा कर रहे हैं. देश की सही तरक्की का पता लगाने के लिए इन्हें ठीक किए जाने की जरूरत है.
उन्होंने कहा, 'मैं नरेंद्र मोदी सरकार में एक मंत्री को जानता हूं. उन्होंने कहा था कि नौकरियां नहीं हैं तो हम कैसे 7 फीसदी की आर्थिक विकास दर हासिल कर रहे हैं. इस मामले में एक आशंका तो यही है कि हम 7 प्रतिशत की दर से आगे नहीं बढ़ रहे हैं.' राजन ने मंत्री के नाम का खुलासा नहीं किया.

RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन एक बार फिर सुर्खियों में हैं. फाइल फोटो.
जेटली कह रहे - तरक्की है, तो रोजगार भी हैं वित्तमंत्री अरुण जेटली आर्थिक मामलों के जानकार लोगों के इस तर्क को खारिज करते रहे हैं. उनका तर्क रहता है कि उनकी सरकार के दौरान कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन नहीं हुआ, जिससे ये जाहिर है कि बेरोजगारी नहीं है. वित्तमंत्री की इस बात का मतलब ये है कि देश में बेरोजगारों ने कभी कोई आंदोलन नहीं किया, जिससे इस बात को बल मिलता कि देश में रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं.
फिर आर्थिक जानकार सवाल क्यों खड़े करते हैं सरकार पर? मोदी सरकार पर आंकड़ों को छिपाने का गंभीर आरोप रहा है. NSSO के रोजगार संबंधी आंकड़े अब तक जारी नहीं किए गए हैं. अलग-अलग अखबारों ने इसकी लीक रिपोर्ट प्रकाशित की हैं. आंकड़ों में कहा गया है कि 2017 में बेरोजगारी की दर 45 साल के उच्चस्तर पर पहुंच चुकी है. इसी तरह जीडीपी के आंकड़ों को CSO ने नवंबर, 2018 में संशोधित कर दिया. इसमें CSO ने मनमोहन सरकार के विकास दर के आंकड़ों को घटा दिया गया था. और मोदी सरकार के दौर में विकास दर तेज बताई गई थी. मसलन 2017-18 की विकास दर पहले 6.7 फीसदी थी. बाद में इसे संशोधित करके 7.2 परसेंट बताया गया. इसके बाद से ही आर्थिक मामलों के तमाम जानकार मोदी सरकार के इन आंकड़ों को संदेह की नजर से देख रहे हैं.

cso ने जीडीपी आंकड़ों को संशोधित कर दिया है. सांकेतिक तस्वीर.
पूंजीवाद के खिलाफ क्रांति हो सकती है? इससे पहले बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में रघुराम राजन ने एक और बड़ी बात कही. उन्होंने कहा पूंजीवाद का लाभ आम लोगों को मिलना अब बंद हो रहा है. इससे ये अब खतरे में है. रघुराम राजन ने कहा, 'मेरा मानना है कि पूंजावाद खतरे में है, क्योंकि अब आम लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है. जब कभी ऐसा होता है तो लोग विद्रोह करते हैं. साधारण शिक्षा पाए किसी मध्यवर्गीय युवा का पहले नौकरी ढूंढना आसान था. 2008 के ग्लोबल आर्थिक संकट के बाद हालात बदले हैं. अब ऐसा होना लगभग असंभव है. अब अगर आप सफल होना चाहते हैं तो आपको वाक़ई में बढ़िया शिक्षा चाहिए.'
कौन हैं रघुराम राजन, जिनकी बात को लोग इतनी गंभीरता से लेते हैं? रघुराम राजन भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में प्रमुख अर्थशास्त्री रह चुके हैं. वो बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के गवर्नर मार्क कार्ने के बाद गवर्नर का पदभार संभाल सकते हैं. अभी वो शिकागो विश्वविद्यालय में बतौर प्रोफेसर काम कर रहे हैं. रघुराम राजन का जन्म 3 फरवरी 1964 को मध्यप्रदेश के भोपाल में एक तमिल परिवार में हुआ. 1985 में उन्होंने दिल्ली के आईआईटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी की. उनको आईआईटी दिल्ली के निदेशक ने बेस्ट ऑल राउंड अचीवमेंट का गोल्ड मेडल दिया था.
उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. यहां भी गोल्ड मेडल मिला. राजन ने साल 1991 में मैनेजमेंट में पीएचडी की. वे ग्रेजुएशन के बाद ही शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में बतौर फैकल्टी पढ़ा रहे हैं. 2003 में वे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में सबसे कम उम्र के आर्थिक सलाहकार बनाए गए. साल 2008 के ग्लोबल आर्थिक संकट से उबारने में उन्होंने काफी मदद की. 2008 में वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार नियुक्त हुए. 2012 में वे भारतीय वित्त मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार बनाए गए. सितंबर, 2013 से 2016 तक वे रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे.
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