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ऑस्कर जाने वाली फिल्मों को सरकार 1 करोड़ का खर्चा देगी लेकिन ये चंदा कम पड़ेगा

जानिए क्यों ऑस्कर में अपनी फिल्म ले जाना सब दांतों की रूट केनाल निकलवाने जितना बड़ा दर्द है.

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फिल्म विसारनाय, कोर्ट, अदामिंते माकन अबु और लायर्स डाइस के पोस्टर.
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गजेंद्र
2 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 2 नवंबर 2016, 11:34 AM IST)
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फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (FTII), पुणे के चेयरमैन के तौर पर गजेंद्र चौहान और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के अध्यक्ष के रूप में पहलाज निहलानी की नियुक्तियों से दुखी लोगों के लिए केंद्र सरकार की ओर से आखिर एक खुशखबरी आई है. सरकार ने विदेशी फिल्म महोत्सवों और ऑस्कर में जाने वाली भारतीय फिल्मों के प्रचार खर्च के लिए पैसा देने का ऐलान किया है. केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम. वेंकेया नायडू ने बुधवार को घोषणा की कि उनका मंत्रालय, ऑस्कर पुरस्कारों की विदेशी भाषा श्रेणी में भेजी जाने वाली भारतीय फिल्म को 50 लाख से 1 करोड़ रुपए तक का प्रमोशन फंड देगा. फ्रांस में Cannes फिल्म फेस्टिवल के कंपीटिशन सेक्शन में चुनी गई फिल्मों को 20 लाख रुपए प्रचार खर्च के लिए मिलेंगे. इसी फेस्ट के 'उं सर्तेन रगाद' और 'डायरेक्टर्स फोर्टनाइट' जैसी श्रेणियों में गई फिल्मों को 15 लाख की राशि मिलेगी. ऐसा ही फंड सनडांस, बर्लिन, बूसान, लोकार्नो, टोरंटो, वेनिस, रोटरडैम और अन्य इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में मुकाबला करने वाली भारतीय फिल्मों को भी दिया जाएगा. होता यह है कि इन विदेशी फिल्म महोत्सवों और ऑस्कर में हरेक फिल्म को मुकाबले में घुसने और बाद में वहां ज्यूरी में मौजूद लोगों को वे फिल्में दिखाने के लिए बहुत धन खर्च करना होता है. ये प्रक्रिया बहुत लंबी और कड़ी मेहनत भरी होती है. सरकार की घोषणा का सबसे ज्यादा फायदा स्वतंत्र फिल्मकारों को होगा जो बिना किसी बड़े स्टूडियो और बड़े निर्माता की मदद के अपने पैसों के जुगाड़ से फिल्में बनाते हैं. ऐसी फिल्में जिनसे बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाई भी नहीं होने वाली होती है. वे ऐसी फिल्में होती हैं जो फिल्म आर्ट को आगे ले जाने वाली होती हैं, जो बेहतर समाज के निर्माण वाली चर्चाओं को आगे बढ़ाती हैं या जो स्वतंत्र विचारों को प्रमोट करती हैं. अब तक ऐसी फिल्मों का अस्तित्व बचा रहा है तो सिर्फ इन्हें बनाने वाले फिल्मकारों के कला के प्रति जुनून के कारण. बीते कुछ वर्षों में 'शिप ऑफ थिसीयस', 'कोर्ट', 'तिथि' जैसी कई भारतीय फिल्मों ने दुनिया भर के कलाप्रेमियों को प्रभावित किया है. अब प्रमोशन फंड के ऐलान के बाद ऐसी भारतीय फिल्मों की संख्या बढ़ेगी और इंडिपेंडेंट फिल्ममेकिंग को बल मिलेगा. ऑस्कर जाने वाली फिल्म को 1 करोड़ तक की राशि भी बड़ा ऐलान है. निश्चित तौर पर इससे संबंधित फिल्मों के निर्माता निर्देशकों को अमेरिका में बचे रहने में मदद मिलेगी. लेकिन ये राशि बहुत कम है. क्योंकि वहां पर वोटिंग की पूरी प्रक्रिया प्रमोशन पर निर्भर है. बीते वर्षों में जो फिल्में गई हैं उनमें से ज्यादातर के सामने मोटी दिक्कत यही रही है. इतना पैसा उनके पास नहीं होता है. शुरू से शुरू करते हैं. विदेशी भाषा श्रेणी में भारत की ओर से 49 फिल्में भेजी जा चुकी हैं लेकिन आज तक एक भी फिल्म नहीं जीत पाई. सिर्फ तीन ही नामांकित होकर फाइनल सूची में जगह बना सकीं हैं - 'मदर इंडिया' (1957), 'सलाम बॉम्बे' (1988) और 'लगान' (2001). हर साल इस श्रेणी में आ रही फिल्मों की संख्या बढ़ रही है. 2014 में 83 देशों ने अपनी फिल्में जमा करवाई थीं. इस साल ये संख्या 85 तक पहुंच चुकी हैं. इनमें से अंत में सिर्फ पांच फिल्में फाइनल नॉमिनेशन के लिए जाएंगी. भारत ने 2017 के ऑस्कर आयोजन के लिए तमिल फिल्म 'विसारनाय' को भेजा है. वेत्रीमारन द्वारा निर्देशित इस फिल्म के निर्माता धनुष हैं. 'कोर्ट' (2015), 'लायर्स डाइस' (2014), 'द गुड रोड' (2013), 'अदामिंते माकन अबु' (2011), 'हरिश्चंद्राची फैक्ट्री' (2009) जैसी फिल्में कुछ उदाहरण हैं. जैसे सलीम अहमद की चार नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली मलयालम फिल्म 'अदामिंते माकन अबु' को लीजिए. 2011 में इसे भारत की एंट्री के तौर पर चुने जाने की घोषणा हुई. सलीम खुश थे तो उनके चेहरे पर मायूसी भी थी. बतौर निर्देशक ये उनकी पहली फिल्म थी. निर्माता भी वे ही थे. फिल्म तो कम बजट में बना ली और अब करोड़ों रुपए का प्रमोशन सामने खड़ा इंतजार कर रहा था. उनके साथ 62 अन्य देशों की फिल्में की नामांकित हुई थी. सलीम ने केरल सरकार और केंद्र सरकार से वित्तीय मदद मांगी लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया. सलीम तब बोले थे, "उन्होंने मेरी फिल्म को ऑस्कर के लिए चुन लिया, लेकिन मैं अवॉर्ड पाने के लिए प्रमोशन पर करोड़ों रुपए नहीं खर्च कर सकता." उन्हें न्यूनतम भी मानें तो 2 करोड़ का खर्चा करना था लेकिन वे अपनी सारी ताकत जुटाकर सिर्फ 1 करोड़ ही जमा कर पाए थे. उन्होंने अमेरिका में जाकर संघर्ष किया लेकिन इस करोड़ रुपए की राशि में वहां हवा भी नहीं लगी और अपनी मलयालम फिल्म को किसी ने नहीं देखा. अब सरकार ने भी ज्यादा से ज्यादा 1 करोड़ की राशि की मदद घोषित की है जिससे उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा.
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- दो लोग तय करते हैं कि कौन सी फिल्म नामांकित होगी और जीतेगी. पहले हैं एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज़ के 6028 सदस्य जो वोटिंग करके नतीजे देते हैं. दूसरी है अकाउंटिंग कंपनी प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स जो 80 साल से ऑस्कर की चुनाव प्रक्रिया देख रही है. सब इनके हाथ में होता है. - दिसंबर में तमाम एकेडमी वोटर्स को सब फिल्मों के नाम वाला मतपत्र भेजा जाता है. जिनमें से वोटर्स अपनी पसंद की फिल्म पर ठप्पा लगाते हैं. - अब कल्पना कीजिए कि विदेशी भाषा श्रेणी की 85 फिल्में एक वोटर को हम भेजते हैं. क्या उस आदमी या औरत ने ये सब 80 फिल्में देखी होंगी? यहीं आपको जवाब मिल जाता है कि आपकी फिल्म नामांकित होगी कि नहीं? - यहीं से लड़ाई शुरू होती है. लड़ाई अपनी फिल्म ज्यादा से ज्यादा वोटर्स को दिखाने और इसकी कुछ बातें उनके दिमाग में दर्ज करवाने की. यहीं से जेब खाली होनी शुरू हो जाती है. - निर्माता लोगों को इन छह हजार से ज्यादा वोटर्स के लिए फिल्मों के शो रखने होते हैं. इनमें थियेटर, स्क्रीनिंग, नाश्ते व अन्य प्रकार के खर्च होते हैं. विदेशी भाषा श्रेणी में एक फिल्म के अमेरिका में अधिकतम छह शो कर सकते हैं. - फिर इन स्क्रीनिंग पर वोटर्स को बुलाने की जद्दोजहद होती है. भई कौन भले दिमाग का आदमी 80 से ज्यादा फिल्में देखेगा? और यहां बात सिर्फ एक श्रेणी की हो रही है. बाकी सब श्रेणियों को मिलाकर फिल्मों की संख्या सैकड़ों में जाती है. तो होता यह है कि हरेक श्रेणी में जिन पांच-दस फिल्मों का इंद्रधनुष लहरा दिया जाता है वो उसी में से एक को वोट कर देते हैं. - ज्यादातर मौकों पर घिसे-पिटे टोटकों के आधार पर वोटिंग की जाती है. पूर्वाग्रह, दोस्तियां और बड़े स्टूडियो से अच्छे-बुरे संबंध भी अन्य कारण होते हैं क्योंकि सब वोटर फिल्म उद्योग के ही लोग होते हैं और सक्रिय रूप से फिल्में बना रहे होते हैं. एक-दूसरे की जरूरत पड़ती रहती है. उसी मुताबिक वोटिंग होती है. इसमें भी ये बड़ा पूर्वाग्रह होता है कि 77 परसेंट वोटर मर्द होते हैं. 94 परसेंट वाइट होते हैं. - वोटर्स के घर निर्माता को अपनी फिल्मों की हार्ड कॉपी और उससे जुड़ी सामग्री कूरियर करनी होती है. इसमें बड़ा खर्च आता है. 2004 में एक फिल्म आई थी 'क्रैश'. उसे छह ऑस्कर नामांकन मिले थे. उस फिल्म के निर्माता ने सिर्फ डीवीडी स्क्रीनर्स पर ही 2,50,000 डॉलर खर्च कर दिए थे जो भारतीय रुपए के हिसाब से एक करोड़ से ज्यादा पड़ता था. - निर्माता आईट्यून्स के जरिए सॉफ्ट कॉपी भी भेजते हैं. ये जानते हुए कि यहीं से उनकी फिल्में पाइरेट हो जाने वाली हैं. लेकिन कोई उपाय नहीं. - ऑस्कर सीज़न के दौरान अमेरिका की प्रमुख फिल्म मैगजीन और अखबारों में विज्ञापन लगाने होते हैं. ये एक महत्वपूर्ण तरीका है जिससे वोटर्स की नजरों में कोई फिल्म आती है. लेकिन यहां दो दिक्कतें आती हैं. एक तो इस दौरान विज्ञापन बहुत महंगे होते हैं, दूसरा इतनी फिल्में कतार में होती हैं कि हर फिल्म को विज्ञापन के लिए जगह भी नहीं मिल पाती. जैसे इस दौरान द हॉलीवुड रिपोर्टर मैगजीन में आपको पेज 1 पर छोटा विज्ञापन देना है तो वो 4.5 लाख रुपये से ज्यादा का पड़ेगा. - फिल्म इंडस्ट्री की वेबसाइट पर विज्ञापन का खर्च और बिलबोर्ड पर विज्ञापन जैसे प्रमोशनल खर्चे भी होते हैं. हर फिल्म के प्रचार के लिए एक एजेंट हायर करना पड़ता है. इन्हें ऑस्कर विशेषज्ञ या एकेडमी कंसल्टेंट भी कहते हैं. ये भी मोटी फीस लेता है. अगर आपकी फिल्म जीत जाए तो उसे बधाई में भी तय कमीशन देना होता है. इसके अलावा फिल्मों की लॉबीइंग की जाती है. अमेरिका में ये बहुत ही सामान्य चलन है. इसमें सारा खेल रोकड़े का होता है. इस बार की अपनी ऑस्कर संभावित 'विसारनाय' के निर्माता धनुष हैं और उनके पास काफी पैसे हैं इसलिए प्रमोशन में लगने वाला कितना भी धन उनके लिए चुनौती नहीं है. लेकिन ज्यादातर मौकों पर ऐसा नहीं होता. ज्यादातर ऐसी फिल्में ही लायक होती हैं जो स्वतंत्र रूप से बनी होती है. और ऐसी फिल्म के लिए ऑस्कर के आखिरी पांच में जगह बना पाना पहाड़ खोदने जैसा है. इस पहाड़ खोदने में सरकार की 1 करोड़ (या 50 लाख) की मदद छोटा-मोटा चंदा है जिससे थोड़ा सहारा जरूर लग जाएगा लेकिन वो पर्याप्त नहीं होगा.
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