गंधाते रिक्शे वाले को चूमता गे प्रोफेसर! इस सीन में खुशबू नहीं, प्यार है
Film Review: मनोज बाजपई की 'अलीगढ़ देख आओ. फिल्म बनाने वालों को थैंक यू कहोगे.'
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फोटो - thelallantop
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फिल्म रिव्यू: अलीगढ़
डायरेक्टर: हंसल मेहता
स्टोरी: अपूर्व असरानी
प्रड्यूसर: इरोस/कर्मा पिक्चर्स
रन टाइम: 2 घंटे
दो सीन हैं. पहला. एक बड़ा शहर है. एक बड़ी कंपनी के दफ्तर की छत पर एक खूबसूरत सी साड़ी में एक लड़की एक लड़के को चूम रही है. दूसरा. उसी समय एक छोटे शहर के एक छोटे से कमरे में एक आदमी दूसरे आदमी को चूम रहा है. कान पर, होठों पर, सीने पर. पहला आदमी दुबला-पतला मटमैली सी बंडी पहने है. बाल खिचड़ी हो रहे हैं. शरीर बुढ़ा रहा है. और दूसरा आदमी एक रिक्शा वाला है. रिक्शा चला कर आया था. जाने कब नहाया होगा. शरीर गंधा रहा होगा. दोनों ही सीनों में सेक्स करने की एक स्ट्रॉन्ग इच्छा है. दोनों ही सीनों में प्यार है. दोनों मर्दों का प्रेम उतना ही सच्चा है जितना एक मर्द और औरत का. पहला सीन आपको इरॉटिक लगेगा. लेकिन दूसरे में आप सीट पर हिले-डुलेंगे. क्योंकि उसमें खुशबू नहीं है. 'इश्क' शब्द को आप जिस तरह इमैजिन करते हैं, ये उससे कोसों दूर है. आप इसमें बॉलीवुड की किसी रोमैंटिक फिल्म का कोई गाना नहीं फिट कर सकेंगे. आपकी इसी इमैजिनेशन को अलीगढ़ तोड़ देती है. 'इश्क' की नई परिभाषा लिखती है. प्रोफेसर सिरास एक सीधा-साधा आदमी है. भगवान की पूजा करता है. दरवाजे पर देवी लक्ष्मी की फोटो लगाता है. गोश्त वाले हाथों से कोई दाल वाला बर्तन छू ले तो पूरी दाल छोड़ देता है. शादी भी करता है. लता मंगेशकर को सुनता है. प्रेम कविताएं लिखता है. लेकिन किसी औरत के लिए नहीं. सिरास गे है. पर उसे पता नहीं है कि वो गे है. उसे बस इतना पता है कि पत्नी से प्रेम नहीं कर पाया. और जिससे प्यार करता है वो एक मर्द है. वो कोई एक्टिविस्ट नहीं है. उसकी चाल जनाना नहीं है. उसकी आवाज लड़कियों जैसी नहीं. वो दूसरे मर्दों से फ़्लर्ट नहीं करता. उसमें एक भी ऐसी चीज नहीं है जो उसे दुनिया कि निगाहों में 'गे' बनाती हो. अलीगढ़ 'गे' शब्द से जुड़ा हर स्टीरियोटाइप तोड़ती है. सिरास के जीवन में 'कम आउट' का कॉन्सेप्ट नहीं है. क्योंकि वो सोच ही नहीं सकता कि अपने बेडरूम को उसे मीडिया में ले जाने और टीवी पर दिखाने के भी कुछ मायने हो सकते हैं. उसे पता ही नहीं है कि उसके लिए लोग लड़ रहे हैं. जो उसके लिए नॉर्मल है वो देश और कानून के लिए इतनी बड़ी बात क्यों है? और बात बड़ी है क्योंकि सिरास मिडिल क्लास है. उसका 'फ्रेंड' इरफान तो रिक्शे वाला था. ऐसा गायब हुआ कि वापस नहीं आया. जाने जिंदा भी था या मर गया. सिरास भी मरता है. लेकिन उसे सिर्फ उन लोगों ने नहीं मारा जो उसके खिलाफ थे, जो उसके जलते थे, नफरत करते थे. उन्होंने ने भी मारा जो उसके साथ खड़े होने का दावा करते थे. जब यूनिवर्सिटी से मारने की कोशिश की तो सिरास को लगा कि क्लॉक टावर से कूद कर अपनी जान दे दे. पर फिर शराब पीने घर पर वापस आ गया. उसे यूनिवर्सिटी ने नहीं मारा. कोर्ट की सुनवाइयों ने और अखबार की सुर्खियों ने मारा. फिल्म जरूर देखिए. ये जानने के लिए समलैंगिकता जैसी टीवी और अखबारों में दिखती है वैसी नहीं होती. जितना आसान गे राइट्स के बारे में अखबारों में पढ़ना होता है, उतना ही कठिन उसे जीना होता है. मनोज बाजपई और राजकुमार राव. दोनों ही कमाल हैं. हंसल मेहता और अपूर्व असरानी को थैंक यू है. बड़ा वाला थैंक यू.
दो सीन हैं. पहला. एक बड़ा शहर है. एक बड़ी कंपनी के दफ्तर की छत पर एक खूबसूरत सी साड़ी में एक लड़की एक लड़के को चूम रही है. दूसरा. उसी समय एक छोटे शहर के एक छोटे से कमरे में एक आदमी दूसरे आदमी को चूम रहा है. कान पर, होठों पर, सीने पर. पहला आदमी दुबला-पतला मटमैली सी बंडी पहने है. बाल खिचड़ी हो रहे हैं. शरीर बुढ़ा रहा है. और दूसरा आदमी एक रिक्शा वाला है. रिक्शा चला कर आया था. जाने कब नहाया होगा. शरीर गंधा रहा होगा. दोनों ही सीनों में सेक्स करने की एक स्ट्रॉन्ग इच्छा है. दोनों ही सीनों में प्यार है. दोनों मर्दों का प्रेम उतना ही सच्चा है जितना एक मर्द और औरत का. पहला सीन आपको इरॉटिक लगेगा. लेकिन दूसरे में आप सीट पर हिले-डुलेंगे. क्योंकि उसमें खुशबू नहीं है. 'इश्क' शब्द को आप जिस तरह इमैजिन करते हैं, ये उससे कोसों दूर है. आप इसमें बॉलीवुड की किसी रोमैंटिक फिल्म का कोई गाना नहीं फिट कर सकेंगे. आपकी इसी इमैजिनेशन को अलीगढ़ तोड़ देती है. 'इश्क' की नई परिभाषा लिखती है. प्रोफेसर सिरास एक सीधा-साधा आदमी है. भगवान की पूजा करता है. दरवाजे पर देवी लक्ष्मी की फोटो लगाता है. गोश्त वाले हाथों से कोई दाल वाला बर्तन छू ले तो पूरी दाल छोड़ देता है. शादी भी करता है. लता मंगेशकर को सुनता है. प्रेम कविताएं लिखता है. लेकिन किसी औरत के लिए नहीं. सिरास गे है. पर उसे पता नहीं है कि वो गे है. उसे बस इतना पता है कि पत्नी से प्रेम नहीं कर पाया. और जिससे प्यार करता है वो एक मर्द है. वो कोई एक्टिविस्ट नहीं है. उसकी चाल जनाना नहीं है. उसकी आवाज लड़कियों जैसी नहीं. वो दूसरे मर्दों से फ़्लर्ट नहीं करता. उसमें एक भी ऐसी चीज नहीं है जो उसे दुनिया कि निगाहों में 'गे' बनाती हो. अलीगढ़ 'गे' शब्द से जुड़ा हर स्टीरियोटाइप तोड़ती है. सिरास के जीवन में 'कम आउट' का कॉन्सेप्ट नहीं है. क्योंकि वो सोच ही नहीं सकता कि अपने बेडरूम को उसे मीडिया में ले जाने और टीवी पर दिखाने के भी कुछ मायने हो सकते हैं. उसे पता ही नहीं है कि उसके लिए लोग लड़ रहे हैं. जो उसके लिए नॉर्मल है वो देश और कानून के लिए इतनी बड़ी बात क्यों है? और बात बड़ी है क्योंकि सिरास मिडिल क्लास है. उसका 'फ्रेंड' इरफान तो रिक्शे वाला था. ऐसा गायब हुआ कि वापस नहीं आया. जाने जिंदा भी था या मर गया. सिरास भी मरता है. लेकिन उसे सिर्फ उन लोगों ने नहीं मारा जो उसके खिलाफ थे, जो उसके जलते थे, नफरत करते थे. उन्होंने ने भी मारा जो उसके साथ खड़े होने का दावा करते थे. जब यूनिवर्सिटी से मारने की कोशिश की तो सिरास को लगा कि क्लॉक टावर से कूद कर अपनी जान दे दे. पर फिर शराब पीने घर पर वापस आ गया. उसे यूनिवर्सिटी ने नहीं मारा. कोर्ट की सुनवाइयों ने और अखबार की सुर्खियों ने मारा. फिल्म जरूर देखिए. ये जानने के लिए समलैंगिकता जैसी टीवी और अखबारों में दिखती है वैसी नहीं होती. जितना आसान गे राइट्स के बारे में अखबारों में पढ़ना होता है, उतना ही कठिन उसे जीना होता है. मनोज बाजपई और राजकुमार राव. दोनों ही कमाल हैं. हंसल मेहता और अपूर्व असरानी को थैंक यू है. बड़ा वाला थैंक यू.

