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PPE किट पहनकर कोविड ड्यूटी करने वाली डॉक्टर्स डायपर पहनने पर मजबूर हैं

पीरियड्स के दौरान किसी ने डबल पैड इस्तेमाल किया, किसी ने डायपर के ऊपर सैनिटरी नैपकिन लगाई.

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कोरोना की जांच के लिए सैंपल लेते हेल्थ वर्कर्स. (फोटो- PTI)
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लालिमा
23 अप्रैल 2021 (अपडेटेड: 22 अप्रैल 2021, 03:09 AM IST)
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हमारी टीम में से ज्यादातर लोग इस वक्त घर से काम कर रहे हैं. हमारे कुछ साथी फील्ड पर भी हैं, जो लगातार इस कोशिश में हैं कि कोरोना की वजह से मचे हाहाकार की असल तस्वीर सरकार तक पहुंच सके. फील्ड पर मौजूद दोस्तों से जब भी हमारी बात होती है, हम एक बात ज़रूर कहते हैं- दोस्त खुद को सुरक्षित रखना, अपना ख्याल रखना. ऐसे ही जब घरवालों से बात होती है, तो भी लगातार हम यही बात उनसे कहते हैं और वो हमसे. इस वक्त हर किसी को अगर सबसे ज्यादा उम्मीद किसी से है, तो वो हैं डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स. ये हमारी सोसायटी का वो सेक्शन है, जिसके ऊपर इस वक्त सबसे ज्यादा भार है. आम जनता के साथ होने वाली त्रासदी की हर खबर हम आप तक पहुंचा रहे हैं, लेकिन डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स क्या महसूस कर रहे हैं, उसके बारे में कहीं कोई बात नहीं हो रही. जो डॉक्टर्स कोविड की ड्यूटी में लगे हुए हैं, उनके एक्सपीरियंस के बारे में कम ही लोग जानते हैं. तो आज की बड़ी खबर में कोविड ड्यूटी में लगे डॉक्टर्स, खासकर महिला डॉक्टर्स के अनुभव के बारे में बताएंगे. जानेंगे कि कैसे वो PPE किट पहनकर घंटों-घंटों काम कर रही हैं.

PPE क्या है?

हम लोग अगर दो घंटे भी लगातार मास्क लगा लें, तो दस बार कहते हैं कि यार घुटन सी महसूस हो रही है. अब ज़रा सोचिए, वो डॉक्टर्स जो दिन के आठ-आठ घंटे, कई बार तो इससे भी ज्यादा देर के लिए PPE पहनकर रहते हैं, उन्हें क्या महसूस होता होगा. PPE यानी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट. ये हर उस डॉक्टर और हेल्थ वर्कर के लिए पहनना ज़रूरी है, जो कोविड वार्ड में ड्यूटी करता है. इस किट में शरीर को कवर करने के लिए एक सूट होता है, हेड कवर, चश्मा, मास्क, फेस शील्ड सब शामिल होता है, जूते भी.

इस किट को पहनने का नियम ये है कि पूरी ड्यूटी के दौरान डॉक्टर इसे नहीं उतारेंगे. यानी कई-कई घंटों तक इसे पहनना होगा. इसे पहनकर टॉयलेट भी नहीं जा सकते, यानी डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स को कई-कई घंटों तक बिना पानी पीए या कम पानी पीकर रहना होता है. हमने कुछ फीमेल डॉक्टर्स से इस बारे में बात की. उन्होंने बताया कि उनकी कई साथी डॉक्टर्स PPE किट पहनने के दौरान डाइपर भी इस्तेमाल करती हैं, ताकि अगर बीच में टॉयलेट इस्तेमाल करने की ज़रूरत महसूस हो, तो डाइपर काम आए. फीमेल डॉक्टर्स को पीरियड्स के दौरान भी काफी दिक्कत होती है. कुछ एक साथ दो-दो पैड्स इस्तेमाल करती हैं, तो कुछ डाइपर के साथ पैड्स इस्तेमाल करती हैं. PPE किट के साथ किस तरह से डॉक्टर्स काम करते हैं, ये जानने के लिए हमने बात की डॉक्टर अर्चना भारती से. ये यूपी के बांदा सिटी में मेडिकल ऑफिसर की पोस्ट पर तैनात हैं. उन्होंने कहा-

"आप एक सिंगल मास्क लगाते हो तो घुटन जैसी लगती है, PPE किट में मास्क के मुकाबले कई गुना ज्यादा घुटन होती है. ग्लव्स लगातार पहनने से दाने निकल आते हैं, खुजली होती है. किट उतारने के बाद डिहाइड्रेशन जैसी फीलिंग होती है. लेकिन हमारी ड्यूटी से किसी की जान बच रही है, इसलिए हम इसे करते हैं. फीमेल्स के साथ PPE किट में ज्यादा दिक्कत होती है. खासतौर पर पीरियड्स के टाइम पर, क्योंकि उसको एक बार पहनने के बाद उतार नहीं सकते. किट को बार-बार टच भी नहीं कर सकते, नहीं तो कोई मतलब नहीं है उसको पहनने का. हम PPE किट उतारने के बाद ही वॉशरूम जा सकते हैं."


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डॉक्टर अर्चना भारती, मेडिकल ऑफिसर, बांदा

कोरोना के खिलाफ चल रही इस जंग में डॉक्टर्स के साथ-साथ हमारी नर्सेस भी लगातार काम कर रही हैं. इसलिए उनका एक्सपीरियंस जानना भी बेहद ज़रूरी था. हमने बात की रायपुर के डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अस्पताल की नर्स नीलिमा शर्मा से. वो कहती हैं-

"औरत होने के कारण तकलीफ थोड़ी ज्यादा होती है. हम डाइपर इस्तेमाल करते हैं. पीरियड्स के दौरान हम डाइपर में ही सैनिटरी नैपकिन लगाते हैं. तकलीफ होती है, लेकिन मरीज़ों की सेवा के दौरान वो याद नहीं रहती."


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स्टाफ नर्स नीलिमा शर्मा, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अस्पताल, रायपुर

इसी मुद्दे पर हमने NSCB मेडिकल कॉलेज जबलपुर की जनरल सर्जरी रेसिडेंट डॉक्टर प्रेरणा डेहरिया से भी बात की. वो कहती हैं-

"PPE किट पहनने पर घुटन सी तो महसूस होती ही है, गर्मी, पसीना सबकी दिक्कत होती है. कई बार चक्कर जैसा भी महसूस होता है. हमारे साथ के कुछ लोगों को अस्थमा की दिक्कत है, उन्हें ज्यादा परेशानी होती है. कभी-कभी ऐसा हुआ है कि वो बेहोश भी हो गए हैं. रही बात टॉयलेट जाने की, तो हम कोशिश करते हैं कि ज्यादा पानी न पिएं. लेकिन फिर भी अगर टॉयलेट जाने की ज़रूरत महसूस होती है, तो हम कंट्रोल करते हैं. जिनसे कंट्रोल नहीं हो पाता, वो डाइपर इस्तेमाल करते हैं.. हालांकि मेरे साथ अभी तक ये नहीं हुआ है कि पीरियड के वक्त मेरी कोविड ड्यूटी लगी हो, लेकिन मेरी जिन साथियों की लगी, उनका एक्सपीरियंस ये रहा कि एक बार एक को स्टेन लग गया था. दूसरी ने बताया कि उसे ड्यूटी के दौरान महसूस हो रहा था कि ज्यादा फ्लो हो रहा है, और स्टेन लग सकता है लेकिन वो कुछ नहीं कर सकती थी."


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डॉक्टर प्रेरणा डेहरिया, जनरल सर्जरी रेसिडेंट, NSCB मेडिकल कॉलेज, जबलपुर

इसी मुद्दे पर हमने डॉक्टर आकांक्षा कनौजिया से बात की, ये नोएडा कोविड कंट्रोल रूम में पोस्टेड हैं. उन्होंने बताया कि जब कोविड वार्ड में उनकी ड्यूटी थी, तो दो-तीन बार ऐसे मौके आए जब उन्हें डाइपर इस्तेमाल करना पड़ा था. खासतौर पर पीरियड के दौरान डाइपर और पैड दोनों एकसाथ यूज़ करना पड़ा था. संजय गांधी अस्पताल दिल्ली की एक गायनेकोलॉजिस्ट से भी हमने बात की. उनका कहना है कि PPE किट पहनने से घुटन सी तो महसूस होती ही है, लेकिन ये उनका काम है और ये करना ज़रूरी है. पेशेंट को देखना ज़रूरी है, साथ ही साथ खुद को सुरक्षित रखना भी एक अहम मुद्दा है.

ज्यादातर डॉक्टर्स ने यही कहा कि PPE पहनकर काम करना उतना आसान नहीं है, लेकिन ये उनकी ज़िम्मेदारी है. कोविड पेशेंट को देखना और उसी दौरान खुद को सुरक्षित रखना. इसलिए ये ज़रूरी है.

घर से दूर रहते वक्त क्या महसूस करते हैं?

डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स लगातार काम कर रहे हैं. कई बार ऐसा होता है कि उन्हें लगातार अस्पताल में रहना पड़ता है. घर नहीं जा पाते हैं. और घर जाते भी हैं तो परिवार वालों से दूर रहना पड़ता है. ताकि फैमिली वाले भी सुरक्षित रहें. कुछ डॉक्टर्स का कहना है कि ऐसे मौकों पर वो अस्पताल के साथियों को ही अपना परिवार समझते हैं. कुछ फीमेल डॉक्टर्स के पास एक और बड़ी ज़िम्मेदारी है, ये कि वो मां हैं. वो घर पर अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर जाती हैं, कई बार कई-कई दिनों तक वो अपने बच्चों को नहीं देख पातीं. इसी मुद्दे पर हमने छिंदवाड़ा के सौंसर टाउन के सिविल अस्पताल में पोस्टेड डॉक्टर मीना ठाकरे से बात की. वो कहती हैं-

"मेरी बेटी साढ़े तीन साल की है. पिछले एक साल से जब से कोविड आया है, मैं अपनी बेटी के साथ ठीक से वक्त नहीं बिता पाई हूं. वो ज्यादातर वक्त या तो अपने नाना-नानी के साथ रहती है. या दादा-दादी के साथ. जब मेरे पास होती है, तब भी मैं काम से इतना थक जाती हूं कि उसके साथ खेल नहीं पाती. तब मन में विचार आता है कि सामने होते हुए भी मैं जब उसे वक्त नहीं दे पा रही हूं तो अस्पताल में ही क्यों न रहूं. मैं कई बार बहुत इमोशनल हो जाती हूं. मैं चाहती हूं कि मेरी बेटी मेरे सामने नखरे दिखाए, लेकिन मुझे मौका ही नहीं मिल पाता. अब तो एक साल से मेरा रूटीन देख-देखकर वो इतनी समझदार तो हो गई है कि जैसे ही मैं घर जाती हूं वो तुरंत आकर मुझसे लिपटती नहीं है, तब तक मेरे पास नहीं आती जब तक मैं नहा-धोकर फ्रेश न हो जाऊं."

डॉक्टर अर्चना भारती बताती हैं कि पिछले साल मार्च के पहले तक वो मैटरनिटी लीव पर थीं. मार्च 2020 में उन्होंने जॉइन किया. कोविड में ड्यूटी लगी. बच्चा छह महीने का था. उसे सुबह दूध पिलाकर केयर टेकर को सौंपकर वो काम पर जाती थीं, और जब लौटती थीं, तब दोबारा नहा-धोकर, खुद को अच्छे से सैनिटाइज़ करके फिर अपने बच्चे को अपना दूध पिलाती थीं. वो भी पूरी सावधानी बरतते हुए. डॉक्टर अर्चना कहती हैं-

"बहुत मुश्किल है. बच्चे छोटे-छोटे हैं. पूरा साल हो गया है. आप लॉकडाउन में घरों के अंदर लॉक रहे, लेकिन हम अपने छोटे-छोटे बच्चों को घरों में बंद करके जाते थे ड्यूटी पर. अभी भी जाते हैं, बस यही है कि हां ड्यूटी करनी है."

आगरा सरकारी अस्पताल में पोस्टेड डॉक्टर सुच्ची कहती हैं-

"कोविड ड्यूटी करने के कारण हम फैमिली को भी बहुत मिस करते हैं, क्योंकि हम बहुत दिनों तक फैमिली से नहीं मिल पाते. इस बीच हम अपने हॉस्पिटल के स्टाफ को ही फैमिली की तरह ट्रीट करते हैं. पेशेंट्स को ही बच्चे मानकर उनकी केयर करते हैं. विश्वास रहता है कि एक दिन हमारी ड्यूटी जब खत्म होगी, फैमिली से मिल पाएंगे."


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डॉक्टर सुच्ची गुप्ता, आगरा सरकारी अस्पताल

स्टाफ नर्स नीलिमा शर्मा कहती हैं-

"घर परिवार, घर में बुज़ुर्गों को छोड़कर हम ड्यूटी कर रहे हैं. लेकिन अच्छी बात ये है कि अभी सभी को वैक्सीन लग गई है, तो अब हमें घर से दूर नहीं रहना है. हम अपने घर में ही एक अलग कमरे में रहते हैं. परिवार के साथ रहें, ताकि मानसिक स्थिति मजबूत रहे. हम कम से कम अपने लोगों को देख सकते हैं, भले उनके पास नहीं जा सकते."

21 अप्रैल, यानी कल के दिन कोरोना के तीन लाख से भी ज्यादा मामले पूरे देश में सामने आए थे. करीब दो हज़ार लोगों ने दम तोड़ दिया. मरने वालों की संख्या में हर दिन इज़ाफा हो रहा है. आप अंदाज़ा लगा लीजिए कितने परिवार तबाह हो रहे हैं. दुर्भाग्यवश हममें से कुछ लोग अपनों के जाने का गम खुद भी डील कर रहे हैं, ज़ाहिर है उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता है. लेकिन डॉक्टर्स बताते हैं कि उनके लिए भी किसी मरीज़ को मृत घोषित करना आसान काम नहीं होता है. और आए दिन हो रही मौतें उन्हें भी परेशान कर रही हैं. डॉक्टर्स इससे कैसे डील करते हैं, इसका जवाब में डॉक्टर सुच्ची ने कहा-

"कई बार अस्पताल में हमारे पेशेंट्स की डेथ हो जाती है. काफी मेंटल ट्रॉमा होता है. लेकिन हमें इनसे निकलना है. क्योंकि और भी पेशेंट्स को देखना है. इसके लिए मैं भगवान से प्रार्थना करती हूं और आध्यात्म का सहारा लेती हूं. फिर वापस से काम पर लग जाती हूं."

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर प्रेरणा ने हमें बताया कि मरीज़ों को मरता देख उन्हें भी दुख होता है. और जब वो उनके परिवार वालों को इसकी जानकारी देते हैं, तो परिवार वाले सवाल खड़ा करते हैं कि ऐसा कैसे हुआ? इस पर डॉक्टर्स के सामने काफी गंभीर समस्या ये आ जाती है कि कैसे वो उन्हें समझाएं. डॉक्टर प्रेरणा कहती हैं-

"हम हर घंटे पेशेंट के परिवार वालों की उसकी कंडिशन की जानकारी नहीं दे सकते. हमें अभी बहुत सारे पेशेंट देखने पड़ रहे हैं. ऐसे में होता ये है कि अगर आठ घंटे पहले हमने पेशेंट के स्टेटस की जानकारी उन्हें दी, और अगली बार उसे चेक किया और तब तक अगर उसने दम तोड़ दिया हो, और फिर हम इस बात की जानकारी परिवार वालों को देते हैं तो उनका यही सवाल होता है कि आठ घंटे पहले तो ठीक था, फिर ऐसा कैसे हो गया. वो रोने लगते हैं. उन्हें संभालना भी मुश्किल होता है. क्योंकि हम जानते हैं कि वो न तो अब उस मरीज़ को देख सकते हैं और न खुद से उसका अंतिम संस्कार कर सकते हैं."

कोरोना की इस जंग में शामिल एक और डॉक्टर से हमने बात की. नाम है डॉक्टर अमित अग्रवाल. ये आगरा के सरकारी अस्पताल में पोस्टेड हैं. उन्होंने भी अपना एक्सपीरियंस हमें बताया. वो कहते हैं-

"कोविड वार्ड में एक बार PPE किट पहनकर जब जाते हैं तो गर्मी तो लगती है, लेकन जैसे-जैसे काम करते जाते हैं, गर्मी और असहजता की आदत हमें हो जाती है. फिर वो हमें कम परेशान करती है. साथ ही दूसरे डॉक्टर, स्टाफ नर्स सभी PPE किट में होते हैं, तो एक-दूसरे को देखकर हमारी हिम्मत भी बढ़ती है. फील होता है कि जब दूसरों को गर्मी नहीं लग रही, तो हमें भी नहीं लगनी चाहिए. हम PPE पहनने के दौरान वॉशरूम नहीं जा सकते, तो ऐसे में हम थोड़ा कम पानी पीते हैं. जब मरीज़ों की मौत होती है, तब दुख होता है. हम सोचते हैं कि इलाज में कहां कमी रह गई थी. ऐसा नहीं होना चाहिए था. लेकिन हम फिर इससे बाहर निकलते हैं और फिर नई ऊर्जा शक्ति के साथ आगे बढ़ते हैं."


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डॉक्टर अमित अग्रवाल, आगरा सरकारी अस्पताल

ज्यादातर डॉक्टर्स ने हमारे ज़रिए आप लोगों से ये अपील की है कि इस वायरस को गंभीरता से लें. बिना किसी काम के घर से न निकलें. बाहर जाएं भी तो दो गज की दूरी रखें. मास्क लगाकर रखें. वैक्सीन लगवाएं. अच्छा हेल्दी खाना खाएं, ताकि इम्युनिटी बनी रहे. ये जान लीजिए कि जितने डॉक्टर्स के एक्सपीरियंस हमने आपको बताएं हैं, उनमें से तीन डॉक्टर्स अभी इस वक्त कोरोना पॉज़िटिव हैं.


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