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उस रोज फिल्मसिटी में 29 साल पहले मरे किसान का भूत मिला

एक फ्रीडम फाइटर 33 साल एक कागज को भटके, एक आदमी ने तो अपने नाम में 'मृतक' जोड़ लिया.

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28 मई 2016 (अपडेटेड: 28 मई 2016, 12:27 PM IST)
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फोटो - thelallantop
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जुकाम था इसलिए मैं ऑफिस से जल्दी छूटकर भाग रहा था. ऑफिस के पीछे वाला वो छोटा रास्ता मुझे पता है. जहां से आप कुछ बाउण्ड्रीवाल कूदिए और सीधे रोड पर पहुंच जाएं. उस रास्ते पर सिर्फ पार्क की हुई गाड़ियां, ताश पीटते ड्राइवर और गाड़ियां ताकते गार्ड मिलते हैं. उस दिन मुझे कई ड्राइवर और गार्ड झुंड लगाए दिखे. बीच में किसी सयाने आदमी को बैठा रखा था. उससे बतिया रहे थे.
यहां ऐसे झुंड देखने की आदत नहीं थी, ये कुछ अजीब लगा. जाकर देखा तो एक आदमी नजर आया, सिर पर गमछा, मैला सा धोती- कुर्ता, उसके पैरों के नाख़ून में दुनिया भर की धूल भरी थी. पता लगा ये आदमी मर चुका है. आज, अभी नहीं 29 साल पहले. एमपी में राजगढ़ जिले के ब्यावरा तहसील में एक जगह है सुठालिया ठप्पा. ये आदमी वहीं के एक गांव बोरदा का था. नाम था, नाम है हीरालाल कुम्हार. ये आदमी 29 साल पहले मर गया है, कागजों में. 1983-84 में इस आदमी ने जमीन खरीदी 25 बीघे. तब ये जमीन इसी के नाम हुआ करती थी. 1987 में बड़े भाई जगन्नाथ ने ये जमीन इनकी बजाय अपने नाम करा ली. तब हीरालाल अपने गांव से बाहर गए थे.
https://www.youtube.com/watch?v=SWI4t-VBgx4
जगन्नाथ ने पटवारी के साथ मिलकर 6 जुलाई 1987 को हीरालाल का नाम कागजों से कटवा दिया. उन्हें मरा बता दिया. उस रोज से हीरालाल का भटकना शुरू हुआ. नायब तहसीलदार, तहसीलदार, एसडीओ और कलेक्टर से कहा. कुछ नहीं हुआ. हीरालाल मुख्यमंत्री तक गए. मध्यप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष हुआ करतीं थीं, जमुना देवी. बुआ जी कहते थे सब उनको, उनके पास भी गए. उनसे भी शिकायत की. जमुना देवी 2010 में चल बसीं. हीरालाल को जमीन न मिली. हीरालाल भोपाल पहुंचे, भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी है. वहां सारे नेता बैठते हैं, भोपाल पहुंचे तो तो भोपाल संभाग के अपर आयुक्त के पास भी गए. उनने पूरे मामले की जांच करने को कहा. कलेक्टर को लिखा, कुछ न हुआ. ये अभी की नहीं 2005 की बात है.
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जमुनादेवी ने बाद के सालों में भी दो बार मुख्यमंत्री को लिखा. मध्यप्रदेश के तब के धार्मिक न्याय मंत्री कमल पटेल ने भी कलेक्टर को लिखा, कुछ न होना था. कुछ न हुआ. तब राजगढ़ के कलेक्टर शिवानंद दुबे हुआ करते थे. वो कहते थे प्रकरण बहुत पुराना है, रिकॉर्ड न मिलने की वजह से कुछ नहीं हो पा रहा.
कुछ नहीं हो पाया, सच में. हीरालाल अब भी भटक रहे हैं. मेहनत मजदूरी कर पेट भरते हैं. फिल्मसिटी आए थे. न्यूज 24 करके कोई चैनल है. वहां के किसी पत्रकार 'दिपक चौरसिया' ने उन्हें बुलाया था. नाश्ते वाली कागज की प्लेट के पीछे जो नाम उनने दिखाया वो यही था. प्लेट के पीछे किसी पत्रकार ने उन्हें पता लिखकर दे दिया था, हीरालाल को लगा यहां मदद मिल सकती है. इसलिए वो चले आए. गेट से अंदर घुसने नहीं दिया गया, तो बाहर सड़क पर घूमते हुए हर आने-जाने वाले को अपना किस्सा सुना रहे थे. हाथ में मोबाइल भी नहीं था, मैंने किसी जान-पहचान वाले का नंबर मांगा तो कोई नंबर भी न दे सके. आगे क्या करेंगे ?पूछने पर कहा कि जिससे मिलने आए हैं, मिलकर जाएंगे.


देश की आजादी के लिए पांच साल लड़े, खुद को जिंदा बताने को 33 साल

2015 में एक फिल्म आई थी. 'गौर हरी दास्तान- द फ्रीडम फाइल'. गौर हरी दास फ्रीडम फाइटर थे लेकिन कागजों पर यही बात  साबित करने में उन्हें 33 साल लग गए. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए उनने 1976 में आवेदन दिया था. जो उनको 33 साल बाद 2009 में मिल पाया था. दरअसल वो अपने बेटे का इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन कराना चाहते थे, इसके लिए अगर उनके फ्रीडम फाइटर होने का प्रमाण मिल जाता तो आसानी हो जाती. बस इत्ती सी बात साबित करने में इत्ते साल लग गए.
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Source- Rediff

आजादी के पहले वो स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा लिटरेचर और संदेश इधर-उधर पहुंचाते थे. साल 1945 में उनने अंग्रेजों के खिलाफ भारत का झंडा लहराया था जिसके लिए उन्हें दो महीने की जेल हुई. उनने पांच साल अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी, लेकिन देश आजाद होने पर एक कागज के टुकड़े के लिए उन्हें 33 साल जूझना पड़ गया था. हालांकि उस कागज के बिना भी टैलेंट के बेस पर उनके बेटे को आईआईटी मुंबई में एडमिशन मिल गया था. फिल्म 'गौर हरी दास्तान- द फ्रीडम फाइल' में लीड रोल में विनय पाठक थे. फिल्म पिछले साल अगस्त में रिलीज हुई थी और गौर हरी दास का संघर्ष दिखाती थी कि कैसे वो ऑफिस-ऑफिस और मंत्रालयों में भटकते रहे.
https://www.youtube.com/watch?v=wwApLckfQu8


दो प्रधानमंत्रियों के खिलाफ लड़ गया खुद को जिंदा साबित करने के लिए 

ऐसे ही एक आदमी को खुद को जिंदा साबित करने के लिए राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ना पड़ गया था. लाल बिहारी जो अब लाल बिहारी 'मृतक' कहलाते हैं, उनको 1975 में राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में मरा बता दिया गया था. और उनकी सारी प्रॉपर्टी उनके रिश्तेदारों के नाम कर दी गई थी. उनने हर किसी से कहा कि वो जिंदा हैं पर उनकी बात नहीं मानी गई. 19 साल तक वो ये साबित करने को भटकते रहे कि वो जिंदा हैं.
उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के खलीलाबाद में रहने वाले लाल बिहारी ने 1975 में जब एक बैंक लोन के लिए अप्लाई किया तो राजस्व विभाग से आइडेंटिटी प्रूफ की जरुरत पड़ी. लेने पहुंचे तो उन्हें बताया गया वो मर चुके हैं. उनके एक रिश्तेदार ने अफसरों को घूस खिलाकर उन्हें मरा साबित कर दिया था. ताकि लाल बिहारी की जमीन हथिया सकें, जमीन भी कितनी. एक एकड़ भी न थी.
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लाल बिहारी के न्याय पाने के अपने तरीके थे, वो तो मर ही चुके थे तो उनने अपनी बीवी को विधवा बताकर उसके लिए विधवा पेंशन की मांग की. सरकारी अफसरों को जान से मारने की धमकी दी, उनकी बेइज्जती की और उनके बच्चों को किडनैप करने की धमकी दी, ऐसा वो खुद को जिंदा साबित करने के लिए कर रहे थे. मरा आदमी थोड़े इतने अपराध कर सकता है.
9 सितंबर 1986 को उनने विधानसभा में पर्चे फेंके और गिरफ्तारी दी. इसके बाद दिल्ली पहुंचे वहां वोट क्लब पर 56 घंटे तक अनशन किया. 1988 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ लिए. इलाहबाद से. फिर अमेठी जा पहुंचे. वहां 1989 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा. इलाहाबाद में उनका केस चलता तो उन्हें 'मृतक लाल बिहारी हाजिर हों' कहकर बुलाया जाता था तो अपने नाम में 'मृतक' जोड़ लिया.
https://www.youtube.com/watch?v=-msm4t7Zq0M
बाद में 30 जून 1994 को ये मान लिया गया कि वो मरे नहीं हैं. अपने जैसे ही कई और लोग भी उन्हें मिले तो एक मृतक संघ बना लिया. जिसके जरिए चार और 'मरे' हुओं को जिंदा कराया. बाद के दिनों में सतीश कौशिक ने उन पर एक फिल्म बनाने की बात भी कही.
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Source- Facebook

पर सवाल ये उठता है कि ऐसा होता क्यों है? कैसे एक आदमी को सालों-साल भटकना पड़ता है खुद की पहचान या खुद को जिंदा साबित करने के लिए. कोर्ट में भी ऐसे केसेज सालों-साल अटके रहते हैं. ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं और अब मजाक का विषय बन गईं हैं. हम तमाम तकनीकों की बात करते हैं. ऊपर दिए गए दो उदाहरणों को लीजिए, आप उन्हें पुरानी बता सकते हैं लेकिन जो अब भी जूझ रहे हैं. जब ट्विटर पर मंत्रालयों को ट्वीट करो तो मदद मिल जाती है, जब सड़क पर गलत वक़्त पर पट्टी क्रॉस कीजिए और चालान घर पहुंच जाता है तब वो क्यों जूझ रहे हैं? हजार आईडी प्रूफ हैं, वोटर आईडी और आधार कार्ड हैं. जो किसी के नाम पर भी बन जाते हैं. फिर इनके सामने पहचान का संकट क्यों होता है?  आजकल तो बायोमैट्रिक पहचान की बात होती है. फिर ऐसा क्यों होता है कि एक जीते जागते आदमी को अपनी पहचान के लिए सालों-साल भटकना पड़ जाए?

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