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'मुनाफ़ा चौगुना हुआ, पर कर्मचारियों की सैलरी नहीं बढ़ रही'- सरकार ने कॉर्पोरेट सेक्टर को खींचा

सरकार ने Economic Survey 2023-24 में रेखांकित किया है कि आज की तारीख़ में सबसे ज़्यादा रोज़गार प्राइवेट सेक्टर में पैदा होता है. कंपनियों का मुनाफ़ा तो चार-गुना हुआ, लेकिन काम करने वालों की सैलरी नहीं.

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22 जुलाई 2024 (अपडेटेड: 22 जुलाई 2024, 11:27 PM IST)
economic survey income inequality
बजट से पहल आर्थिक सर्वे 2024 जारी हुआ.
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मंगलवार, 23 जुलाई को नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे टर्म का पहला बजट पेश किया जाएगा. रवायतन इससे पहले 22 जुलाई को देश का सालाना आर्थिक सर्वे जारी किया गया. इसमें सरकार ने कहा है कि भारत में कॉरपोरेट क्षेत्र तो ग़ज़ब का प्रदर्शन कर रहा है. लेकिन कर्मचारियों की भर्ती और वेतन बढ़ोत्तरी कंपनियों के प्रदर्शन के आस-पास भी नहीं है.

सरकार ने माना है कि रोज़गार पैदा करने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार और प्राइवेट सेक्टर को मिलकर काम करना होगा. मगर साथ ही इस बात को भी रेखांकित किया गया कि आज की तारीख़ में सबसे ज़्यादा रोज़गार प्राइवेट सेक्टर में पैदा हो रहा है.

कॉर्पोरेट क्षेत्र का प्रदर्शन कभी इतना अच्छा नहीं रहा, जितना इस बार है. 33,000 से ज़्यादा कंपनियों के सैंपल नतीजे बताते हैं कि वित्त वर्ष 2020 और वित्त वर्ष 23 के बीच भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र का कर-पूर्व लाभ (PBT) लगभग चौगुना हो गया... लेकिन भर्ती और वेतन में बढ़ोतरी इसके अनुरूप नहीं है.

यहां कर-पूर्व लाभ या प्रॉफ़िट बिफ़ोर टैक्स (PBT) को समझने की जरूरत है. फ़र्ज़ कीजिए कि आपकी शिकंजी की दुकान है. आप नींबू, चीनी, पानी ख़रीदते हैं. इसकी लागत जोड़-घटाकर एक ग्लास का दाम तय करते हैं. बेचते हैं, पैसे कमाते हैं. अच्छे नागरिक की तरह नियमित टैक्स भरते हैं. और महीने के आख़िर में जो मुनाफ़ा आपके हाथ आया, वो हुआ PBT. वो मुनाफ़ा, जो टैक्स कटने के बाद बचता है.

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सर्वे में बताया गया कि PBT तो चौगुना हो गया है और लेकिन PBT के P (प्रॉफ़िट) में जिन कर्मचारियों का समय और पसीना लगा है, उनका वेतन में वृद्धि उस अनुपात में नहीं हुई है. सरकार का कहना है कि भर्ती और वेतन बढ़ाने में कंपनियों का ही फ़ायदा है.

दार्शनिक पॉलिटिकल थियरिस्ट और अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स ने अपनी किताब ‘दास कैपिटल’ में लिखा है कि किसी कारोबार/फ़ैक्ट्री को मुनाफ़े में जो भी सरपल्स हो रहा है, असल में वो मज़दूरों के शोषण का सटीक माप है. जितना मुनाफ़ा, उतना शोषण.

खैर, ये तो थी दर्शनशास्त्र की बात, अब आते हैं यथार्थवाद पर, जिसका सीधा संबंध आर्थिक सर्वे से हैं.

इकॉनमिक सर्वे 2024 में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि आर्थिक विकास, रोज़गार पैदा करने और उत्पादकता बढ़ाने में राज्य और प्राइवेट सेक्टर को एक साथ मिलकर काम करना होगा. तभी ‘2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य प्राप्त होगा’.

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महामारी जैसी अप्रत्याशित घटनाओं की वजह से भारत में रोज़गार की स्थिति बदतर हुई है. सर्वे के मुताबिक़, 2015 से छोटे व्यवसायों में नौकरियों में गिरावट आई है. सर्विस सेक्टर में कुछ नई नौकरियां निकली हैं, लेकिन मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर को सबसे बड़ा झटका लगा है.

मगर जिनकी नौकरियां बची हुई हैं, उनका हाल भी बहुत संतोषजनक नहीं है. इकोनॉमिक टाइम्स ने सेक्टर या मार्केट लिहाज़ से टॉप 35 कंपनियों की स्टडी पब्लिश की थी. इसके मुताबिक़, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और ऊंचे पदों पर पदस्थ अधिकारियों के बनाम औसत कर्मचारियों को जो सैलरी मिलती है, उसका अंतर बढ़ता जा रहा है. अधिकतर कंपनियों में इस अनुपात में 20-60% की वृद्धि देखी गई है.

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