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डव के जिस ऐड पर पूरी दुनिया में बवाल मचा, उस पर कंपनी भारत में अरबों रुपए कमा ले

टी-शर्ट उठाते ही लड़की बदल जाती है.

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9 अक्तूबर 2017 (अपडेटेड: 9 अक्तूबर 2017, 10:59 AM IST)
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यूनिलीवर एक ग्लोबल कंपनी है. इस तरह की नस्लीय असंवेदनशीलता एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी की नस्लीय और ओछी मानसिकता दिखाती हैं. ऐसा करने वाली कंपनियों में यूनिलीवर अकेली नहीं है.
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भारत के लोग भूरी चमड़ी वाले होते हैं. जो लोग गोरेपन को ही खूबसूरती मानते हैं, उनके हिसाब से शायद भारत बदसूरत लोगों का सबसे बड़ा देश होगा. हम गोरा बनाने वाले उत्पादों का जमकर इस्तेमाल करते हैं. क्रीम के अलावा और भी कई प्रॉडक्ट गोरेपन का सपना बेचते हैं. एक बार BBC ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. दक्षिण एशिया में कोका कोला से ज्यादा गोरा करने वाली क्रीम बिकती हैं. कोका कोला से तुलना इसलिए कि ये बहुत आम प्रॉडक्ट है. बहुत बिकता है. कई जगहों पर लोग पानी से ज्यादा कोक वगैरह पीते हैं.


 
डव के इस विज्ञापन पर आपत्ति जताई जा रही है. आलोचनाओं के बाद कंपनी ने अपनी सफाई देते हुए माफी मांगी.
डव के इस विज्ञापन पर आपत्ति जताई जा रही है. आलोचनाओं के बाद कंपनी ने अपनी सफाई देते हुए माफी मांगी.

बहुत टुच्चा है डव का ऐड एक कंपनी है. यूनिलीवर. मूल रूप से ब्रिटेन और नीदरलैंड्स की कंपनी है. दुनियाभर में फैली हुई है. 40 खरब से ज्यादा का सालाना टर्नओवर है इसका. यूनिलीवर का एक प्रॉडक्ट है- डव. साबुन की टिकिया. वही साबुन, जिसको कंपनी साबुन से ज्यादा क्रीम बताती है. इतना पैसा है कंपनी के पास. तमीज एक कौड़ी की नहीं है मगर. इन्होंने एक टुच्चा सा विज्ञापन बनाया. इसमें एक गहरे रंग वाली लड़की होती है. भूरे रंग की टी-शर्ट पहने हुए. वो डव की क्रीम लगाती है. फिर अपनी टी शर्ट उतार देती है. टी-शर्ट उतारने की देर थी कि अंदर से निकलती है एक गोरी लड़की. हल्के गुलाबी रंग के टी-शर्ट में. भूरे रंग के बाल. एकदम झक्क सफेद. ऐड जो कहता है, वो मैसेज साफ है. आपका रंग काला या भूरा है, तो डव क्रीम लगाइए. रंगत निखर जाएगी. सफेद हो जाएंगे. गोरा मतलब खूबसूरत! काला या भूरा, माने बदसूरत!

हंगामा होने के बाद डव ने माफी मांगी इस विज्ञापन पर खूब हंगामा हुआ. होना भी चाहिए. लोगों ने डव के ऐड को नस्लीय बताया है. इसमें कोई शक भी नहीं है. नाराज लोगों ने डव के प्रॉडक्ट्स का बहिष्कार करने की बात कही. खूब आलोचना हुई, तो डव ने माफी मांग ली. माफी ऐसी कि कोई पहले थप्पड़ मार दे. फिर माफी मांगते हुए चिकोटी काट ले. कंपनी ने कहा:
हमने हाल ही में फेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की. ये ऐड अश्वेत महिलाओं का सही प्रतिनिधित्व करने में नाकाम रहा. इसके कारण लोगों को जो तकलीफ हुई है, उसके लिए हम माफी मांगते हैं.
एक महिला ने डव के इस ऐड पर पोस्ट लिखा. उस पर जवाब देते हुए डव ने लिखा:
जिन तस्वीरों के बारे में आप बात कर रही हैं, वो उनमें डव बॉडी वॉश के फायदे बताए गए हैं. ये 100 फीसद सौम्य है. सल्फेट मुक्त है. सबसे ज्यादा डर्मटॉलजिस्ट ये ही इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं. हम हर उम्र, हर समुदाय और हर नस्ल की महिलाओं की सुंदरता का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. हम अच्छे उत्पाद बनाने के लिए सभी महिलाओं की जरूरतों का ध्यान रखते हैं.
फेयरनेस प्रॉडक्ट्स के विज्ञापनों की भाषा मनोवैज्ञानिक तौर पर भी काफी अपमानजनक होती हैं. ऐसा दिखाया जाता है कि अगर आप गोरे नहीं हैं, तो कुछ बेहतर नहीं कर सकते. फेयरनेस प्रॉडक्ट्स के विज्ञापनों की भाषा मनोवैज्ञानिक तौर पर भी काफी अपमानजनक होती हैं. ऐसा दिखाया जाता है कि अगर आप गोरे नहीं हैं, तो कुछ बेहतर नहीं कर सकते.
स्वस्थ और सुंदर त्वचा का रंग गोरा ही क्यों दिखाते हैं? ये सफाई एकदम बेकार है. प्रॉडक्ट के फायदे जो बताए गए हैं और जो दिखाए गए हैं, उनमें जमीन-आसमान का अंतर है. बताने को कंपनी ने सौम्य, सल्फेट फ्री जैसे फीचर्स गिनाए. दिखाते हुए, काले और गोरे का अंतर दिखाया. प्रॉडक्ट इस्तेमाल करने से पहले लड़की अश्वेत थी. प्रॉडक्ट यूज करने के बाद एकदम गोरी-गुलाबी हो गई. ऐसा क्यों? अगर नस्लीय मानसिकता नहीं है, तो आफ्टर इफेक्ट हमेशा गोरा ही क्यों रहता है? स्वस्थ और सुंदर त्वचा गोरी ही क्यों पेश की जाती है?

डव ने असली गुनाह की तो माफी ही नहीं मांगी डव ने जो माफी मांगी है, वो भी सही नहीं है. डव को ये विज्ञापन बनाने के लिए माफी मांगनी चाहिए थी. उनको कहना चाहिए था कि फलां ऐड बनाकर हमने गलती की. मानसिक दिवालियेपन की निशानी है ऐसे ऐड बनाना. कहना क्या चाहते हैं ऐसे विज्ञापन? पैसा देकर प्रॉडक्ट खरीदें. प्रॉडक्ट के साथ उनकी मानसिकता भी खरीदें. अपनी स्वाभाविक पहचान को रगड़कर मिटाने की कोशिश करते रहें. किसी और जैसा दिखने का सपना पालें! क्यों? क्योंकि उन्होंने बताया है कि उनके जैसा होना ही अच्छा है! गोरा होना अच्छा है! गोरा होना बेहतर है! क्या गोरा होना ही सुंदरता है? क्या अश्वेत होना शर्मिंदगी की बात है?
सवाल तो ये भी है कि अगर कंपनियां नस्लीय भेदभाव में यकीन नहीं करती हैं, तो फिर इस तरह के प्रॉडक्ट ही क्यों बनाती हैं.
सवाल तो ये भी है कि अगर कंपनियां नस्लीय भेदभाव में यकीन नहीं करती हैं, तो फिर इस तरह के प्रॉडक्ट ही क्यों बनाती हैं.

पहले भी ऐसा कर चुका है डव ये पहली बार नहीं है, जब डव ने ऐसा किया हो. इससे पहले 2011 में भी कंपनी को सफाई देनी पड़ी थी. एक ऐड था इनका. इसमें तीन युवतियां होती हैं. तौलिया लपेटे. ये डव बॉडी वॉश का ऐड था. उनके पीछे दो बोर्ड्स थे- बिफोर और ऑफ्टर लिखे हुए. ऐड के मुताबिक, डव बॉडी वॉश इस्तेमाल करने पर आपकी त्वचा का रंग निखरता है. इंसान खुद को साफ और तरोताजा रखने के लिए नहाता है. इसीलिए साबुन और बॉडी वॉश भी लगाता है. डव ने नहाने को साफ होने से नहीं, गोरे होने से जोड़ा था. उसका कहना था कि वो बॉडी वॉश लगाने से आप काले से गोरे हो जाएंगे. तब भी काफी लोगों ने इस पर आपत्ति जताई थी. उस समय भी डव ने माफी मांगी थी. उसकी रणनीति नहीं बदली मगर. जिस मानसिकता पर आपका मार्केट टिका हो, उससे आजाद कैसे होंगे? उसे और मजबूत करना ही तो रणनीति होती है.
2011 में भी डव पर नस्लीय भेदभाव का आरोप लग चुका है. कंपनी ने कहा था कि वो किसी भी ऐसी गतिविधि का समर्थन नहीं करते, जिससे लोगों की भावनाएं आहत हों. 2011 में भी डव पर नस्लीय भेदभाव का आरोप लग चुका है. कंपनी ने कहा था कि वो किसी भी ऐसी गतिविधि का समर्थन नहीं करते, जिससे लोगों की भावनाएं आहत हों.

भारत बदसूरत लोगों का देश है! भारत के लोग भूरी चमड़ी वाले होते हैं. अगर गोरा होना ही खूबसूरती है, तो भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बदसूरत लोगों का देश है. अगर आपको ये लाइन बुरी लगी है, तो मेरा मकसद सार्थक हुआ. मैं चाहती थी कि आपको बहुत बुरा लगे. आप कितनी भी कोशिश कर लें, अपनी अश्वेत चमड़ी को उतारकर नहीं फेंक सकते. त्वचा है, कपड़ा नहीं. हम अपना भूगोल नहीं बदल सकते. किसी ऊष्ण कटिबंधीय प्रदेश को उठाकर ध्रुवीय क्षेत्र में नहीं रख सकते. हर जगह की अपनी प्रकृति होती है. त्वचा का रंग स्वाभाविकता है. त्वचा का काला, भूरा या गोरा रंग उस जगह की आबोहवा पर निर्भर करता है. इसमें कम सुंदर और ज्यादा सुंदर जैसा कुछ नहीं होता.
अभिनेत्री नंदिता दास ने 'डार्क इज ब्यूटिफुल' नाम का एक अभियान चलाया था. इसमें महिलाओं से फेयरनेस प्रॉडक्ट का इस्तेमाल छोड़ने की अपील की गई थी.
अभिनेत्री नंदिता दास ने 'डार्क इज ब्यूटिफुल' नाम का एक अभियान चलाया था. इसमें महिलाओं से फेयरनेस प्रॉडक्ट का इस्तेमाल छोड़ने की अपील की गई थी.

कारोबार करना कंपनी का अधिकार है, बदतमीजी करना नहीं एक ग्लोबल कंपनी का इतना नस्लीय होना अखरता है. वैसे तो किसी का भी नस्लीय सोच रखना बुरा है, लेकिन ग्लोबल कंपनियों की मौजूदगी ज्यादा होती है. ऐसा नहीं कि यूनिलीवर बस पश्चिमी देशों में ही हो. अफ्रीका और एशियाई देशों में भी इसकी तगड़ी मौजूदगी है. पश्चिमी देशों में भी अश्वेत रहते हैं. इतना ग्लोबल होने के कारण तो उसे विविधता को प्रमोट करना चाहिए. वो ऐसा नहीं कर रही है मगर. पैसा कमाना और कारोबार करना कंपनी का वाजिब हक है. सामाजिक रूढ़ियों और इस तरह के नस्लीय अपमान को बढ़ावा देना गलत है मगर. आजादी होनी चाहिए, लेकिन आजादी के साथ जो जिम्मेदारियां निभानी होती हैं, उनका क्या?


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