मेघालय के गारो-खासी हिल्स पर रहने वाला एक आदिवासी समुदाय 'खासी', इन दिनों चर्चामें है. चर्चा की वजह ये है कि इस समुदाय की एक प्राचीन परंपरा जल्द ही बदल दी जासकती है . परंपरा पुश्तैनी संपत्ति के विभाजन का है . पुश्तैनी संपत्ति का मतलब वहसंपत्ति जो पिछली पीढ़ी से नई पीढ़ी को मिलती है. पुश्तैनी हार, पुश्तैनी ज़मीन,पुश्तैनी घर, ये सब आपने सुना होगा. देश के अधिकतर हिस्सों में पुश्तैनी संपत्ति कामतलब पैतृक संपत्ति समझ जाता है, इसकी वजह ये है कि एक लंबे समय तक पुश्तैनीसंपत्ति पर पिताओं के बाद सिर्फ़ बेटों का हक माना गया है .इसके ठीक विपरीत खासी समुदाय में पुश्तैनी संपत्ति घर की सबसे छोटी बेटी को मिलतीहै . खासी भाषा में इन बेटियों को 'खड्डूह ' कहते हैं . सिर्फ़ संपत्ति ही नहीं इनपरमाता - पिता और घर के बाकी सदस्यों का ख्याल रखने की भी ज़िम्मेदारी होती है | लोगोंका मानना है कि ये परंपरा भेदभाव को बढ़ावा देता है और संपत्ति सभी भाई-बहनों मेंबराबर बांटी जानी चाहिए.खासी हिल्स ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (KHADC) में 8 नवंबर को 'खासी इन्हेरिटेंसऑफ प्रॉपर्टी बिल 2021' पेश किए जाने का प्रस्ताव दिया गया है. इस बिल का मकसद हैकि प्रॉपर्टी का बंटवारा सभी भाई - बहनों में बराबर हो. क्या परंपरा को बदल देनाचाहता है डिस्ट्रिक्ट काउंसिल? खासी समुदाय मातृवंशी यानी मैट्रिलीनियल व्यवस्था परचलता है. यानी यहां पर वंश बेटियों से आगे बढ़ता है. लड़कियों की बजाय लड़के शादीकरके लड़की के परिवार के साथ रहते हैं | ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या संपत्ति केबराबर बंटवारे पर ज़ोर देकर जिला परिषद समुदाय की इस परंपरा को बदल देना चाहता है?ये जानने के लिए हमने खासी समुदाय से जुड़े कुछ लोगों से बात की.खासी समुदाय में मैट्रिलीनियल व्यवस्था चलती है. फोटो- विकिमीडिया कॉमन्सफ़ेसबुक पेज 'खासी पीपल' के ऐडमिन राउल शदाप मान्नेर का कहना है, "मातृसत्ता के कारणपुरुषों पर अत्याचार नहीं होते, लेकिन घर पर कोई बेटी नहीं होने पर प्रॉपर्टी मौसीकी बेटी को दे दी जाती है." इस प्रथा के इतिहास पर उन्होंने बताया, "प्राचीन समयमें आदिवासी पुरुष शिकार पर जाते थे और अक्सर जंगली जानवर उन्हें मार देते थे . ऐसेमें उन्होनें स्त्री को घर और संपत्ति की मालकिन बनाया ताकि पुरुषों के न होने परभी परिवार चल सके. पर अब समय बदल गया है इसलिए संपत्ति पर पुरुषों को भी बराबर हकमिलना चाहिए." स्त्री पक्ष को समझने के लिए हमने शिलॉन्ग की एक खासी महिला प्लेसिलीन खरकोंगोर से बात की. उनका कहना है, "यहां ऐसा जरूरी नहीं कि संपत्तिछोटी बेटी को ही दी जाती है. माता-पिता अपनी इच्छा से सभी बच्चों को संपत्ति काहिस्सेदार बनाते हैं. बहुत सी परम्पराएं पुरानी हैं लेकिन नए समय की नई मांगें हैं.एक मां होने के नाते मैं भी चाहती हूं कि अपने सभी बच्चों में संपत्ति को समान रूपसे बांट सकूं.” क्या है विशेषज्ञ का मानना फोटो- विकिमीडिया कॉमन्सक्या यह केवल प्रॉपर्टी डिस्ट्रीब्यूशन का मामला है? ये समझने के लिए हमने कवि ,लेखक डॉ अनुज लुगुन से बात की. अनुज लुगुन खुद एक आदिवासी हैं और आदिवासी अस्तित्वको लेकर काफी सक्रिय हैं . उन्होंने कहा, “क्या खासी हिल्स काउंसिल में महिलाओं कीसमान भागीदारी है जो यह कानून बनाना चाहती है कि महिलाओं के उत्तराधिकार संबंधीपारंपरिक नियम को बदल दिया जाए | यह भी देखना चाहिए कि क्या समुदाय में महिलाओं काव्यवहार पुरुष विरोधी है? कहीं हम समानता के कथित मेनस्ट्रीम नरेटिव को उनके ऊपरथोप तो नहीं रहे? उनके अंदर जो पहले से समानता की अवधारणा रही है, कहीं हम उसेखंडित तो नहीं कर रहे? " डिस्ट्रिक्ट काउंसिल की दलील बिल के पीछे अपने एजेंडा कोस्पष्ट करते हुए डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के चीफ़ का कहना है, “सिर्फ छोटी बेटी केसंपत्ति का उत्तराधिकारी होने से बाकी भाई-बहनों को उनका हिस्सा नहीं मिलता है. कईबार पुरुष कर्ज़ नहीं ले पाते हैं, क्योंकि उनके पास दिखाने के लिए कोई ज़मानत नहींहोती है. जब किसी कपल की कोई संतान नहीं होती है और संपत्ति का कोई वास्तविकउत्तराधिकारी नहीं होता है तो प्रथा के अनुसार कबीले वाले संपत्ति पर कब्जा कर लेतेहैं. इस प्रथा के कारण बच्चे कई बार अपने माता–पिता को कोर्ट तक भी ले जाते हैं.”डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के इस फैसले को सपोर्ट करने वाले लोगों का तर्क है कि ये बिलस्त्री - पुरुष अधिकारों के बराबरी के लिए ज़रूरी है. वहीं बिल के विरोधी लोगों कामानना है कि यह पुरानी परंपरा इस आदिवासी समुदाय की पहचान है और विमेन एम्पावरमेंटके लिए एक ज़रूरी व्यवस्था है. इस बिल का वहां के मातृसत्तात्मक इतिहास और परंपरापर कितना असर होगा ये तो बिल पेश होने के बाद ही पता चलेगा |