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नोट बैन करने से पहले भारत को इन देशों से बात कर लेनी चाहिए थी क्या?

यूरोप में भी बड़े नोट बैन हुए हैं.

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ऋषभ
25 नवंबर 2016 (Updated: 25 नवंबर 2016, 09:12 AM IST)
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मनी-लांडरिंग, टेररिज्म, ब्लैक मनी ये सारी चीजें पूरी दुनिया की परेशानी हैं. बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा देश सब इससे ग्रसित हैं. पर हर जगह तरीके अलग-अलग लगाये जाते हैं इससे निपटने के. भारत ने जो कदम लिया है, इसके प्रभाव देखने अभी बाकी हैं. पर ये कदम थोड़ा बेचैनी पैदा करने वाला है. क्योंकि कैश से बहुत सारी चीजें जुड़ी हुई हैं. और एक झटके में इसका खत्म होना निस्संदेह घबराहट पैदा कर देगा. यूरोपियन यूनियन में भी इस चीज से निपटने के लिये एक्शन लिया गया. यही वाला. बड़े नोट बैन कर के. पर इसका तरीका अलग था. मई 2016 में यूरोपियन सेंट्रल बैंक ने 500 यूरो को नोट को बैन कर दिया. पर ये उसी दिन लागू नहीं होना था. दिसंबर 2018 तक की डेट रखी गई. इसका मतलब यही था कि ये नोट चलेगा, पर 2018 के बाद इश्यू नहीं होगा. नोट चलता रहेगा. हमारे यहां 8 नवंबर को ही 500 और 1000 के नोट का लीगल टेंडर खत्म कर दिया गया. वहां ऐसा नहीं हुआ. आइए देखते हैं, दोनों जगहों के प्रोसेस में कितना अंतर रहा है-1. यूरोप में 500 यूरो का नोट कुल नोटों का 30% है सर्कुलेशन में. मतलब ये भी अच्छी-खासी संख्या में है. इंडिया में 500 और 1000 के नोट कुल नोटों का 86% थे. फिर भी हमने कड़ा कदम उठाया है. 2. यूरोपियन यूनियन में 50 करोड़ लोग रहते हैं. इंडिया में 125 करोड़ लोग रहते हैं. हमारे लोग टेक्नॉल्जी के मामले में वहां के लोगों से बहुत पीछे हैं. तो कैशलेस होने में भी वक्त लगेगा. क्योंकि सबके पास स्मार्टफोन नहीं है. और मोबाइल पेमेंट सीखने में वक्त लगेगा. 3. वहां की तुलना में प्रति व्यक्ति बैंक और एटीएम भी हमारे यहां कम हैं. तो सबको अचानक बैंक में पहुंचाना मुश्किल काम है. फिर हमारे यहां बहुत सारे लोगों को कैश में पेमेंट होता है. इनका बैंक अकाउंट नहीं होता. ऐसे लोगों के लिये कैश का बंद होना बड़ा मुश्किल हो जाता है. 4. यूरोप में फैसला लेने से पहले स्टडी की गई. कि इसका लोगों के मानसिक हेल्थ पर क्या प्रभाव पड़ेगा. सामाजिक और इकॉनमिक रिजल्ट क्या होंगे. कितना फायदा होगा और कितना घाटा होगा. पर हमारे यहां इसकी कमी दिखाई पड़ रही है. बहुत सारे लोग एंग्जायटी में जी रहे हैं. कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा. जिनके पास कैशलेस होने का ऑप्शन है, वो तो रास्ता निकाल चुके हैं. 5. इससे यही पता चलता है कि हमारे यहां डिसीजन जनता के हेल्थ को ध्यान में रखकर नहीं लिये जाते हैं. मेंटल हेल्थ हमारे यहां ऐसे ही नेग्लेक्ट की हुई चीज है. जनता में इसको लेकर अज्ञानता है. डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में अचानक से हुई समस्या के चलते नई समस्याएं पैदा हो जाएंगी जिनका कोई हिसाब नहीं है. यूरोप में इस चीज का कल्चर है. वहां तुरंत लोग डॉक्टर से कंसल्ट करते हैं. 6. पर ये है कि इंडिया में बहुत सारा पेमेंट कैश में होने से बहुत कैश अनएकाउंटेड है. 86 प्रतिशत नोट बैन होने से वो सारा पैसा बैंक में वापस आएगा. कम से कम एक बार बैंक की नजर से गुजरेगा. अब देखना ये है कि बैंक का इंफ्रास्ट्रक्चर कितना मजबूत है जो हर आने-जाने वाले पैसे का हिसाब रखेगा. ये इंफ्रा तो पहले भी मौजूद होगा. उस समय भी आने-जाने वाले पैसों का हिसाब होगा. पर फिर भी ब्लैक मनी का ट्रांन्जैक्शन तो हो ही जाता था. पर अब अगर बैंक सचेत हैं तो शायद ज्यादा चैतन्यता से इस चीज को मॉनीटर किया जायेगा.

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