The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • News
  • Did the Supreme Court consider all three farm laws wrong?

क्या सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों को ग़लत माना?

क्या सुप्रीम कोर्ट कृषि कानूनों को होल्ड पर रखने जा रही है?

Advertisement
pic
11 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 11 जनवरी 2021, 05:26 PM IST)
Img The Lallantop
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि अंग्रेजों के जमाने के इस कानून को खत्म क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
Quick AI Highlights
Click here to view more
आज सुप्रीम कोर्ट को गुस्सा आया. सरकार पर. किसान कानूनों के मामले की सुनवाई के दौरान. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सरकार को लेकर जो बात कही वो सरकार के वकील को 'हार्श' लगी. हार्श अंग्रेज़ी भाषा का शब्द है. डिक्शनरी में मतलब खोजेंगे तो मिलेगा - बहुत कठोर और निर्मम. सरकार के वकील ने जब कोर्ट में कहा कि आप फैसला देने की जल्दी कर रहे हैं, कुछ टाइम और दीजिए तो कार्ट ने यहां तक कह दिया कि आप हमें ना बताइए कि सुप्रीम कोर्ट को कब ऑर्डर निकालना है. सुप्रीम कोर्ट ने आज जो बातें कही उस पर सरकार के विरोधी ताली पीटकर कह रहे हैं कि अब तो मोदी सरकार किसानों से माफी मांग ले. तो क्या हुआ आज सुप्रीम कोर्ट में. क्या सुप्रीम कोर्ट ने तीन किसान कानूनों को ग़लत माना? या सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनों को रद्द करने की बात कही. और किसानों के प्रदर्शन करने या रिपब्लिक डे पर ट्रैक्टर रैली करने की बात पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट में आज जो सुनवाई हुई उसका पूरा सार समझने की कोशिश करते हैं.
सबसे पहले तो ये समझिए कि जब झगड़ा किसानों और सरकार के बीच चल रहा था तो बात सुप्रीम कोर्ट में कैसे पहुंच गई? सुप्रीम कोर्ट में करीब 6 याचिकाएं दायर की गई थी जिनमें तीन में कृषि कानूनों को असंवैधानिक और कानूनी तौर पर गलत बताया गया था. यानी याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि ना तो ये कानून संविधान के मुताबिक हैं और ना ही कानून संगत हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट इन्हें रद्द करे. इनके अतिरिक्त दिल्ली के बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों को हटाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दो PIL यानी जनहित याचिकाएं दायर की गई थी. इनके अलावा भी प्रदर्शन कर रहे किसानों के मूल अधिकारों के हनन को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में फाइल की गई थी.
इन याचिकाओं पर यानी किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट में आखिरी सुनवाई 6 जनवरी को हुई थी. तब देश के अटॉर्नी जनरल यानी केंद्र सरकार के सबसे बड़ी वकील केके वेनुगोपाल ने कोर्ट में कहा था कि 8 जनवरी को किसानों की सरकार के साथ बैठक है जिसमें कुछ नतीजा निकल सकता है. इसलिए कोर्ट भी थोड़ा वक्त दे. सरकार और किसानों के बीच अच्छे माहौल में सुनवाई चल रही है जिसका बने रहना ज़रूरी है. कोर्ट ने भी तब माना था कि वो बातचीत के पक्ष में है और 11 जनवरी तारीख दे दी. माने किसानों और सरकार की बातचीत के बाद की तारीख. सो आज सुप्रीम कोर्ट में इस कानून पर जमकर बहस हुई.
सुनवाई करने वाली बेंच में कौन कौन जज थे और वकील किस किस का पक्ष रख रहे थे?
तीन जजों की बेंच थी. बेंच में भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम. जिरह करने वाले पक्षों पर आते हैं और इनको मोटा-मोटी दो हिस्सों में बांट लेते हैं. एक वो पक्ष जो कानून के समर्थन में हैं और दूसरा वो जो कानून खत्म करना चाहते हैं. पहले वालों में सबसे बड़ा पक्ष खुद मोदी सरकार. कोर्ट में मोदी सरकार का पक्ष रखा अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता. मोदी सरकार की लाइन पर ही कुछ और किसान संगठन थे - जैसे इंडियन किसान यूनियन जिनकी तरफ से सीनियर एडवोकेट नरसिम्हन ने कानूनों को किसानों के हित में बताया. इसके अलावा Confederation of All India Traders और Consortium of South India consumer associations जैसे संगठनों के वकीलों ने भी कृषि कानूनों की हिमायत कोर्ट में की. फिर आता है भारतीय किसान संघ, शॉर्ट बीकेएस. इसे किसानों का देश में सबसे बड़ा संगठन माना जाता है. बीकेएस की तरफ से एडवोकेट आशीष ने कानूनी की कुछ संशोधनों के साथ तरफदारी की.
Tushar Mehta
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता. (तस्वीर: पीटीआई)

अब आते हैं दूसरे पक्ष पर.
यानी कानूनों को खत्म करने की मांग वाले पक्ष. पहला- दिल्ली सरकार. इसके वकील राहुल मेहरा. प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों का पक्ष रखने के लिए कई नामी वकील बहस में शामिल थे- जैसे प्रशांत भूषण, एचएस फूल्का, कोलिन गोंजाल्वेस, दुष्यंत दवे. और भी कई वकील.
अब सवाल आता है कि क्या आज की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने तीन कानूनों को रद्द करने या उनको अच्छा या बुरा बताने के एंगल से की, तो जवाब है बिल्कुल नहीं. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि ना तो हम इन कानूनों की मेरिट पर कोई सुनवाई कर रहे हैं और ना ही इसे वापस लेने या रद्द करने की याचिका पर. तो फिर किस बात पर पर सुनवाई हुई? कोर्ट ने कहा- हमारा सवाल सरकार से बिल्कुल साफ है कि सरकार क्या कर रही है? यानी प्रदर्शनों को खत्म करने के लिए या ये डेडलॉक खत्म करने के लिए सरकार क्या कर रही है. सरकार के वकील ने कहा कि आखिर बैठक में बातचीत जारी रखने पर सहमति हुई थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम कोई बहस को भटकाने वाली टिप्पणी तो नहीं करना चाहते पर सरकार ने बहुत निराश किया है. कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से कहा है कि आपने पिछली बार भी कहा था कि बातचीत चल रही है पर हो क्या रहा है, ये किस तरह का नेगोसिएशन है. कोर्ट ने इन टिप्पणियों को सुप्रीम कोर्ट की सरकार को फटकार में गिना गया.
कानून को होल्ड पर क्यों नही रख देते?
बहस के दौरान चीफ जस्टीस बोबडे ने सरकार से कहा कि हम ये नही कह रहे है कि आप कानून को रद्द करें, हमारा उद्देश्य सीधा है कि समस्या का समाधान निकले. चीफ जस्टिस ने कहा कि हमने मीडिया और दूसरी जगहों से जाना है कि असली समस्या कानून हैं. हमने आपसे पूछा था कि आप कानून को होल्ड पर क्यों नही रख देते? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर कुछ बोलना चाहा लेकिन चीफ जस्टिस ने टोका और कहा कि हम समझ ही नही पा रहे है कि आप समस्या का हिस्सा हैं या समाधान का? सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि देश के दूसरे राज्यो में कानून को लागू किया जा रहा है किसानों को समस्या नही है केवल प्रदर्शन करने वालों को है. चीफ जस्टिन ने कहा है कि अगर देश के दूसरे किसानों को समस्या नहीं है तो वो कमेटी को कहें, हम कानून विशेषज्ञ नहीं हैं. कमेटी कौन सी - वो कमेटी, जिसे बनाने के बारे में सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है. जिसमें विशेषज्ञ हों और दोनों पक्षों के लोग. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीधे सीधे केंद्र से पूछा कि आप कानून को होल्ड पर रख रहे हैं या नहीं? अगर आप नहीं रख रहे तो हम कर देंगे.
Sa Bobde
चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया शरद अरविंद बोबडे. (तस्वीर: पीटीआई)

बात किसानों के प्रदर्शन पर भी आई. इस पर चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा कि कोर्ट किसी भी नागरिक या संगठन को ये आदेश नहीं दे सकता कि आप प्रदर्शन न करें. हां ये जरूर कह सकता है कि आप अमुक जगह पर प्रदर्शन ना करें. कोर्ट ने ये भी टिप्पणी की कि हम ये आलोचना अपने सिर नहीं ले सकते कि कोर्ट किसानों के पक्ष में है या किसी और के पक्ष में. जस्टिस बोबडे ने कहा कि अगर कुछ घटित होता है उसके जिम्मेदार हम सब होंगे, हम नहीं चाहते कि हमारे हाथ रक्त रंजित हों. चीफ जस्टिन ने कहा कि स्थिति खराब हो रही है, किसान आत्महत्या कर रहे है, पानी की सुविधा नही है, बेसिक सुविधा नही है, देह से दूरी के नियम का पालन नहीं किया जा रहा है. और किसान संगठनों के वकीलों से ये सवाल भी पूछा कि आखिर इस ठंड में महिलाएं और बूढ़े लोग क्यों है प्रदर्शन में? वकील एचएस फूल्का ने कहा कि वो अपनी मर्जी से बैठे हैं. इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि मैं रिस्क लेकर एक बात कह रहा हूं. उन्हें जाकर कहिए कि देश के चीफ जस्टिस चाहते हैं कि वो प्रदर्शनों से घर लौट जाएं.
बात रिपब्लिक डे के दिन ट्रैक्टर रैली होने की भी आई
अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को बताया कि देखिए ये किसान संगठन रिपब्लिक डे के दिन राजपथ पर ट्रैक्टर रैली करना चाहते हैं. इस पर किसानों के वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि ऐसा नहीं होगा, राजपथ पर कोई ट्रैक्टर नहीं चलाएगा. दवे ने ये भी कहा कि हम तो रामलीला मैदान में जाकर आंदोलन करना चाहते थे लेकिन सरकार ने 3 महीने से इजाज़त ही नहीं दी. CJI ने कहा कि दिल्ली में कौन इंट्री लेगा कौन नही ये देखना पुलिस का काम है कोर्ट का नही.
अब बात उन किसान संगठनों की जो कानून के पक्ष में हैं. इंडियन किसान यूनियन की तरफ से सीनियर एडवोकेट पीएस नरसिम्हा ने कोर्ट में कहा कि आप एक ही पहलू पर विचार कर रहे हैं. ज्यादातर किसान संगठन कानून के पक्ष में हैं, सिर्फ कुछ ही खिलाफ हैं. इस पर चीफ जस्टिस ने कहा है कि मान लो आपकी बात सही है तो भी इससे अभी के जमीनी हालात नहीं बदलेंगे. वकील नरसिम्हा ने कहा कि कम से कम कानून पर आप स्टे मत लाइए. चीफ जस्टिस ने कहा है कि क्यों ना लाएं, कई दिन पहले हमने सरकार के वकीलों से पूछा था कि आप समस्या को हल करने के लिए अपने कानूनों को थोड़ा सा रोक क्यों नहीं लेते, इस पर आज तक कोई जवाब नहीं आया. चीफ जस्टिस ने कहा कि हम जिम्मेदार कोर्ट हैं और हालात बिगड़ने नहीं देना चाहते, कल को हिंसा हो गई तो कौन जिम्मेदार होगा, हम सिर्फ ऐसा माहौल देना चाहते हैं जिसमें समाधान निकल सके.
Farmers Protest
किसान नए कृषि नियमों का लगातार विरोध कर रहे हैं. (तस्वीर: पीटीआई)

तो सुप्रीम कोर्ट क्या समाधान दे रहा है?
आज की बहस का लब्बोलुआब ये है कि सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि सरकार अभी के लिए तीनों कानूनों को होल्ड पर रख दे, यानी लागू ना करें. और फिर कोर्ट की तरफ से एक कमेटी बनाई जाए जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस करें और इस कमेटी को दिए सुझावों के आधार पर फिर आगे फैसला लिया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और किसान संगठनों से पूछा है कि वो कमेटी की अध्यक्षता के लिए किसी पूर्व जस्टिस के नाम का सुझाव दें. हालांकि कमेटी वाली बात पर ही किसान संगठनों के वकीलों ने कहा है कि उन्हें वापस जाकर पूछना पड़ेगा कि किसान नेता कमेटी से बात करेंगे या नहीं. इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या आप कोर्ट से गठित कमेटी के समक्ष नही जाएंगे? इस तरह का व्यवहार नही चलेगा कि आप सरकार के पास जाएंगे लेकिन हमारे द्वारा गठित कमिटी के पास नहीं जाएं. अब कमेटी और कानूनों पर कोर्ट के स्टे के बारे में सरकार के वकीलों की आपत्ति के बारे में बताते हैं.
अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट में कह दिया कि कानूनों या सरकार के पॉलिसी डिसीज़न पर कोर्ट रोक नहीं लगा सकता है, और ऐसी बातें कई पुराने फैसलों में भी कही गई हैं. उन्होंने 2019 का मराठा आरक्षण केस और 2011 और 1984 के फैसलों का उदाहरण दिया. कोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट हमेशा सरकार के फैसलों पर कानूनी तरीके से रोक लगा सकता है. सरकार के वकील ने कोर्ट से कहा है आपको आदेश देने की इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए. इस पर कोर्ट ने कहा कि हमने बहुत इंतजार कर लिया है. और आप हमें ना बताएं कि हमें कितना धैर्य रखना चाहिए.
इतनी बहस के बाद कोर्ट ने कहा कि वो आज या कल इस मामले पर अपना आदेश निकालेगा. यानी कानून पर स्टे और कमेटी बनाने को लेकर अब कुछ ही घंटों में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोई कदम उठाया जा सकता है. अगर ऐसा हुआ तो
कृषि कानूनों वाले झगड़े पर किसानों और सरकार के बीच रेफरी की भूमिका में सुप्रीम कोर्ट आ जाएगा. हमारे सामने अनुच्छे 370, अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम मंदिर भूमि विवाद, और नागरिकता संशोधन कानून - ये तीन बड़ी मिसालें हैं जब सबकी नज़र सुप्रीम कोर्ट की तरफ गई. इन तीनों मामलों में जो हुआ, उन बातों के आलोक में सुप्रीम कोर्ट के रेफरी बनने को लेकर किसान कितने सहज होंगे? और जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सरकार को फटकार लगाई है, क्या उसकी मध्यस्थता केंद्र को असहज करेगी? ऐसे ढेर सारे प्रश्न हैं, जिनके जवाब अब बस मिलने ही वाले हैं.

Advertisement

Advertisement

()