क्या चुनाव आयोग ने सच में BJP के साथ मिलकर उद्धव ठाकरे के साथ 'धोखा' किया?
बीते दिनों चुनाव आयोग ने उद्धव गुट को झटका देते हुए, शिंदे गुट को असली शिवसेना मान लिया.

जब से महाराष्ट्र की सरकार बदली है, तब से असली शिवसेना को लेकर विवाद चला आ रहा है. बीते दिनों चुनाव आयोग ने उद्धव गुट को झटका देते हुए, शिंदे गुट को असली शिवसेना मान लिया. पार्टी का चुनाव निशान धनुष बाण भी उन्हें ही दे दिया. पार्टी का सिबंल सबसे बड़ी पहचान होती है. बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर दावा करने वाले उद्धव ठाकरे के लिए लिए ये बहुत बड़ा सेट बैक था. चुनाव आयोग के फैसले को उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. आज सुनवाई के दौरान क्या-क्या हुआ? क्या उद्धव को कोई राहत मिली या यहां भी निराशा हाथ लगी. शो में आज बात इसी पर.
सोमवार यानी 20 फरवरी को उद्धव गुट ने सुप्रीम कोर्ट याचिका लगाकर तुंरत सुनवाई की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उस वक्त नकार दिया था. सुनवाई की मुकर्रर तारीख 22 फरवरी यानी आज थी. तो तय वक्त पर दोपहर 3.30 बजे सुनवाई शुरू हुई. उद्धव ठाकरे की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और देवदत्त कामत पेश हुए, जबकि कोर्ट में शिंदे गुट का पक्ष सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह और नीरज किशन कौल ने रखा. सुनवाई शुरू होते ही.
>>शिंदे के वकील नीरज किशन कौल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाए बगैर, चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट आने पर आपत्ति जताई.
>>जवाब में उद्धव के वकील कपिल सिब्बल ने कहा, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही लंबित है तो हम हाईकोर्ट जाकर क्या करेंगे? कहा कि सुप्रीम कोर्ट में विवाद के बाकी मामले लंबित हैं.
>>चुनाव आयोग कह रहा है कि शिवसेना का 2018 का संविधान रिकॉर्ड पर नहीं है. इसलिए विधायक दल में बहुमत के हिसाब से सुनवाई करेंगे. यह गलत है और अगर यही आधार है तो विधान परिषद और राज्यसभा में हमारे पास बहुमत है.
इस पर नीरज कौल ने जवाब दिया कि
>>2018 में एक पार्टी संविधान बना दिया गया कि सारे अधिकार अध्यक्ष के पास ही रहेंगे. इस तानाशाही भरे संविधान की जानकारी चुनाव आयोग को तक नहीं दी गई.
इस बीच शिंदे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने कहा सुप्रीम कोर्ट सितंबर 2022 में इस तर्क को पहले ही खारिज कर चुका है कि चुनाव आयोग की कार्यवाही संविधान पीठ से जुड़ी हुई है. आगे उन्होंने इस ऑर्डर को आधार बनाकर कहा कि यह फैसला चुनाव आयोग को यह शक्ति देता है कि दोनों गुटों में असली पार्टी कौन है?
सुनवाई के बीच चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने कहा कि
>> हम याचिका को सुनेंगे और नोटिस जारी कर रहे हैं.
इस पर उद्धव के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले पर रोक लगनी चाहिए. यहां एक के बाद एक पार्टी दफ्तर पर कब्जा किया जा रहा है.
उद्धव की तरफ से ही पेश हुए दूसरे वकील डॉ अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि
>> अगर उद्धव गुट शिंदे गुट द्वारा जारी व्हिप या नोटिस का पालन नहीं करता है, तो उन्हें अयोग्य करार दिया जाएगा क्योंकि चुनाव आयोग ने मान्यता दे दी है. इसलिए इसको रोकना चाहिए.
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि
>>शिंदे गुट की तरफ से मौखिक आश्वासन दिया गया है कि वे फिलहाल ऐसा कुछ नहीं करेंगे.
दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद बेंच ने चुनाव आयोग के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.
चुनाव आयोग के फैसले पर स्टे ना लगने से फिलहाल शिंदे गुट के पास ही शिवसेना का नाम और सिंबल रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने शिंदे गुट और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब मांगा है. वहीं उद्धव गुट को जवाबी हलफनामा देने के लिए कहा गया है. तब तक उद्धव ठाकरे के पास मशाल चुनाव चिन्ह होगा. फैसले में कोर्ट ने और क्या कहा? फैसले का फलसफा क्या निकाला जा रहा है?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से इतर भी कुछ स्वतंत्र आवाजें हैं जो चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठा रही हैं. लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी ने इस मसले में कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं. कानूनी मामले कवर करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ के मनू सैबेस्टियन से बात से करते हुए पीडीटी आचारी ने कहा-
उन्होंने चुनाव आयोग के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि ओरिजनल पार्टी का फैसला लेते वक्त सिर्फ विधायकों की संख्या को देखा गया है, संगठन को जहन में नहीं रखा गया.भारतीय चुनाव आयोग को शिंदे के दावे का फैसला करने की अनुमति देने के औचित्य पर सवाल उठाया, उन्होंने कहा-
PDT आचारी ने यहां सादिक अली केस का हवाला भी दिया. उन्होंने 1972 के सादिक अली केस का हवाला भी देते हुए कहा-
थोड़ा इसमें और जानकारी ऐड कर देते हैं. इतिहास के विद्यार्थी हैं या पॉलिटिकल हिस्ट्री में दिलचस्पी रखते हैं तो जानते होंगे 1969 के साल कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई थी. एक का नेतृत्व खुद इंदिरा गांधी कर रहीं थी, दूसरे का नेतृत्व के कामराज, मोरारजी देसाई सरीखे ओल्ड गार्ड्स कर रहे थे.
इंदिरा चाहती वीवी गिरि को राष्ट्रपति बनना चाहती थीं, लेकिन दूसरे धड़े ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था. इंदिरा ने बगावत की और रेड्डी चुनाव हार गए. पार्टी दो टुकड़ों में बंट गई. इंदिरा की पार्टी का नाम कांग्रेस (आर) और दूसरी पार्टी कांग्रस (ओ) हो गई. चुनाव ने इंदिरा की सदारत में बनी पार्टी को असली कांग्रेस माना. गाय-बछड़े की जोड़ी वाला निशान भी इंदिरा गुट को मिला. मामला उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट में गया. चुंकि याचिकाकर्ता सादिक अली थे, तो केस को उन्हीं के नाम से जाना गया. तो क्या शिंदे और उद्धव गुट के बीच असली शिवसेना का फैसला करते हुए चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के उस वर्डिक्ट के तमाम मापदंडों का पालन किया?
विराग गुप्ता और PDT आचारी जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि फैसले में सिर्फ विधायकी ताकत को देखा गया, संगठन को नहीं. इसकी वो आलोचना भी कर रहे हैं. लेकिन इस मामले में और भी विचार हैं. हमने पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत से भी बात की. वो अपने कार्यकाल में ऐसे विवादों का निपटारा कर चुके हैं.
जाहिर है यहां भी मतों की भिन्नता है, ओपी रावत मानते हैं कि चुनाव आयोग का फैसला सही है, पहले जिन विशेषज्ञों के बयान दिखाए और बताए, वो मानते हैं फैसला सही ना होकर एकतरफा है. हम तो पत्रकार हैं, हमारा काम विद्वानों की राय को आप तक पहुंचा देना है. बाकी रही बात ये कि असली शिवसेना कौन है, धनुष बाण वाला सिंबल शिंदे गुट को देने का चुनाव आयोग का फैसला सही है या गलत. इस पर हम-आप चर्चा बस कर सकते हैं. तय तो सुप्रीम कोर्ट को करना है, अंतिम फैसला भी वहीं से होगा. अब अगली तारीख का इंतजार कीजिए, हमने आपको पहले भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और शिंदे गुट से लिखित में जवाब मांगा है.
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