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मैं एक मशीन हूं और 'नोटबंदी' के बाद मेरे अच्छे दिन आ गए हैं

ऑनलाइन पेमेंट करवाने वाली वेबसाइट्स और ऐप्लीकेशन की बात नहीं कर रहे

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कुलदीप
18 नवंबर 2016 (Updated: 17 नवंबर 2016, 04:33 AM IST)
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कैसा भी समय आए, किसी ना किसी के अच्छे दिन आते ही हैं. आपदाएं भी नए किस्म के व्यापार लेकर आती हैं. जंग के समय हथियार बनाने वालों की चांदी होती है. महामारी के समय डॉक्टरों की. कहीं बड़ी दुर्घटना में बहुत सारे लोगों की मौत हो जाए तो आस-पास के श्मशान घाट वालों में पहले ही होड़ शुरू हो जाती है. ऐसे ही नोटबंदी से भी कुछ लोगों के अच्छे दिन आए हैं. ऑनलाइन पेमेंट करवाने वाली वेबसाइट्स और ऐप्लीकेशन की बात नहीं कर रहे. एक मशीन की बात कर रहे हैं, जिससे आपका वास्ता पहले भी पड़ता था. पर अब और ज्यादा पड़ेगा. वो मशीन होती है ना. जो मॉल में शॉपिंग करने जाओ तो दिखती है. जिसमें अपना डेबिट कार्ड सरकाओ, पिन नंबर डालो तो पेमेंट हो जाता है. ना कैश लगे, ना फिटकरी. पेंमेंट पूरा होय.  नोटबंदी से छोटे कारोबार मंद पड़े हैं. कारोबार चलता रहे, इसके लिए बहुत सारे व्यापारी ऐसी कार्ड-स्वाइप मशीनें खरीद रहे हैं. इन मशीनों के जरिये कस्टमर अपना डेबिट, क्रेडिट या प्रीपेड कार्ड स्वाइप करके पेमेंट कर सकता है. सीधे अकाउंट से पैसा कट जाता है. कैश की जरूरत नहीं है. कम से कम इसी तरह दुकानदारी चले.

इन मशीनों को कार्ड स्वाइप मशीनें या पॉइंट-ऑफ-सेल (POS) मशीनें कहते हैं. शहरी और अर्धशहरी इलाकों के कई इलाकों में इनकी डिमांड कई गुना बढ़ गई है. छोटे कारोबारी भी मंगवा रहे हैं ताकि तकनीकी तौर पर सक्षम कंपटीटर्स के आगे उनका बिजनेस ना बूड़ जाए.

इंडियन एक्सप्रेस ने एक HDFC बैंककर्मी के हवाले से छापा है, 'पहले हमें महीने में ऐसी 5 हजार मशीनों की रिक्वेस्ट मिलती थी. लेकिन कुछ दिनों से हर रोज 5 हजार मशीनों की डिमांड आ रही है.' एक्सिस बैंक के एक कर्मचारी ने अखबार को बताया कि उनके पास POS मशीनों की तीन गुना डिमांड आ रही है. ICICI बैंक ने डिमांड में बढ़ोतरी के आंकड़े नहीं बताए, लेकिन ये जरूर कहा, 'पिछले कुछ दिनों में हमारे आउटलेट्स पर पेमेंट वाली मशीनों की डिमांड बहुत तेजी से बढ़ी है. रोज की डिमांड इससे पहले हफ्ते भर में आने वाली औसत डिमांड से भी ज्यादा है.'

बैंक के प्रवक्ता ने बताया कि इस मांग को पूरा करने के लिए अतिरिक्त लोगों को काम पर लगाया गया है. तीनों बैंकों ने बताया कि इन मशीनों की डिमांड नई कैटेगरी के व्यापारियों की तरफ से आ रही हैं, जिनमें ब्यूटी सैलन, छोटी किराना दुकानें और सब्जी बेचने वाले भी शामिल हैं.

सितंबर 2012 में भारत में 7.41 लाख POS मशीनें थीं. जबकि सितंबर 2016 तक इनकी संख्या 14.96 लाख हो गई थी. बैंक वालों का कहना है कि इन मशीनों की संख्या अब महानगरों के अलावा, दूसरी श्रेणी के शहरों में भी तेजी से बढ़ रही है. POS मशीनों की संख्या में बढ़ोतरी 155 बैंकिंग के जानकार मानते हैं कि POS मशीनों की मांग बढ़ने को अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा कहा जा सकता है. अगर ज्यादा से ज्यादा लोग कैश के बजाय, कार्ड से पेमेंट करने लगें तो यह आदत में शुमार हो सकता है. एक बैंकर ने कहा, 'पहले ज्यादातर व्यापारी खुद कार्ड से पेमेंट करने को पसंद नहीं करते थे. अब वे खुद मशीनों की मांग कर रहे हैं. इससे ई-ट्रांजेक्शन बढ़ेंगे जो कि अच्छी बात है.'
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