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माओवादियों का रिकॉर्डतोड़ सरेंडर, क्या ये नोट बैन का असर है?

एक महीने में इससे पहले कभी इतनी बड़ी संख्या में माओवादियों ने सरेंडर नहीं किया.

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कुलदीप
29 नवंबर 2016 (Updated: 28 नवंबर 2016, 05:05 AM IST)
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पिछले 28 दिनों में देश भर से 564 माओवादियों और उनसे सहानुभूति रखने वालों ने सरेंडर किया है. एक महीने में इससे पहले कभी इतनी बड़ी संख्या में माओवादियों ने सरेंडर नहीं किया. इसकी कई वजहें हो सकती हैं, लेकिन सरकार की बांछें इससे खिली हुई हैं. उसके पास बड़ा मौका है जब सरेंडर के आंकड़ों के आधार पर वो नोटबंदी के फायदे प्रचारित कर सकती है. हालांकि इसके पीछे माओवाद प्रभावित इलाकों में अपनाई जा रही सख्त नीतियों और सुरक्षा बलों के बनाए प्रेशर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने अधिकारियों के हवाले से खबर दी है. इसमें बड़ा हाथ छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में CRPF और लोकल पुलिस की लगातार कार्रवाई का भी है. लेकिन इसमें नोटबंदी का असर भी हो सकता है. कम से कम, सरकार तो चाहेगी कि इसे नोटबंदी से जोड़कर देखा जाए. सरेंडर करने वाले 564 लोगों में से 469 माओवादी हैं और बाकी उनसे सहानुभूति रखने वाले. 70 परसेंट से ज्यादा सरेंडर ओडिशा के मलकानगिरी जिले से हुए हैं. इसी जिले में पिछले महीने माओवादियों से निपटने के लिए बनाए गई स्पेशल फोर्स 'ग्रेहाउंड्स' ने 23 माओवादियों को मार गिराया था.

अखबार ने अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि अगर पिछले सालों से तुलना करें तो इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में कभी माओवादियों और उनके समर्थकों ने हथियार नहीं डाले. होम मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, 2011 से लेकर इस साल 15 नवंबर तक कुल 3766 माओवादियों ने समर्पण किया था. इनमें 1399 ने सिर्फ 2016 में सरेंडर किया. जो पिछले 6 सालों में सबसे ज्यादा है.

CRPF ऑफिशियल्स के मुताबिक, बड़े पैमाने पर सरेंडर के पीछे कई फैक्टर हो सकते हैं. जिसमें सरकार की तरफ से माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास कार्य भी शामिल हैं. हालिया नोटबंदी से माओवादियों को नुकसान पहुंचा है, उसका पैमाना कितना है, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन नुकसान हुआ है. CRPF और लोकल पुलिस के लोगों के मुताबिक, इससे माओवादियों के गोला-बारूद, दवाइयां, रोजमर्रा की जरूरत के सामान की सप्लाई और काडर को कैश देने में दिक्कत हो रही है. राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को इशारा किया था कि नोट बैन के बाद माओवादी सर्वाइव करने की कोशिशें कर रहे हैं. DGs और IGs की कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था, 'वे पुराने नोटों को लोकल ठेकेदारों, व्यापारियों और सहानुभूति रखने वाले लोगों की मदद से एक्सचेंज करने की कोशिश कर रहे हैं.'

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