ये प्राइड है, यहां लड़कों का लिपस्टिक लगाना 'शर्मनाक' नहीं होता
प्रेम और गर्व का ये उत्सव, लल्लनटॉप की आंखों से.
Advertisement

फोटो - thelallantop
नवंबर की सुबहें खूबसूरत होती हैं. और वो सुबहें जब तारीखें धीरे, धीरे दिसंबर की ओर सरक रही हों, ऐसा लगता है एक लंबी अंगड़ाई लेकर उठें और सड़कों पर निकल जाएं. ऐसी ही सुबह थी पिछले संडे जब लोग उठे और दोपहर से होने वाली नौवीं 'प्राइड' वॉक के लिए निकल गए. लोग रंग-बिरंगे गुब्बारे लेकर सड़कों पर उतर पड़े. वो न औरत थे, न पुरुष थे. वो बस इंसान थे. वो आत्मा थे. खुश और मुक्त.
परेड बाराखंबा रोड क्रॉसिंग से शुरू होकर जंतर मंतर तक जाने वाले थी. और रास्ते में था संगीत. लाउडस्पीकर पर बजने वाला नहीं. लगातार ढोल पीटने से निकला हुआ संगीत जिसमें कोई अधनंगे, कोई गहने लादे हुए, कोई उगी हुई दाढ़ी के साथ होठों पर लिपस्टिक लगाए हुए लोग मस्त होकर नाच रहे थे. सड़क पर चलते हुए लोग एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले, गले मिलते, एक दूसरे को चूमते चलते थे. ऐसा लग रहा था ये कोई अलग दुनिया है. इस दुनिया में सरकार नहीं है, कोई शासक नहीं है, कोई रंग या लिंग भेद नहीं है, यहां लोगों की मोहब्बत में रिश्तों का बोझ नहीं है.
मैंने कई लोगों से पूछा उनके दिमाग में इस समय पहली चीज क्या आती है. किसी ने कहा उन्माद, किसी ने कहा नाच, किसी ने कहा प्रेम, किसी ने कहा सेक्स.
लोगों के हाथ में 'समानता' और 'वन इंडिया' के बोर्ड थे. परेड के आगे गुब्बारों से बना एक सेमीसर्कल चल रहा था. परेड के साथ था एक किंग साइज झंडा, जिसमें सातों रंग थे. रेनबो यानी इन्द्रधनुष दुनिया भर में होने वाली प्राइड का सिंबल हैं. ये LGBT राइट्स का सिंबल हैं. क्योंकि एक इन्द्रधनुष में सातों रंग बराबर होते हैं. कोई छोटा, कोई बड़ा नहीं होता. कोई कम, कोई ज्यादा नहीं होता.
लोग नारे लगा रहे थे. कह रहे थे सरकार भाड़ में जाए, जो सेक्शन 377 अब तक लागू कर रखा है. लोग कह रहे थे वो सरकार की परवाह नहीं करते. वो इस बात की परवाह नहीं करते कि उनका प्रेम कानूनन गुनाह है या नहीं. वो प्रेम में हैं.
प्राइड यानी गर्व, 'शर्म' का उल्टा है. वो लोग जिनके अस्तित्व को आप समाज पर धब्बा समझते हैं, वो जिनके बारे में आप जानना भी पसंद नहीं करते क्योंकि वो समाज के कायदे नहीं मानते, वो इस दिन सज-धज कर नाचते हुए निकलते हैं, खुद से जुड़ी शर्म को गर्व में तब्दील करते हुए.
प्राइड का आयोजन दिल्ली में 9 सालों से हो रहा है. और इसे शुरू किया गया था सेक्शन 377 के खिलाफ, सो समलैंगिक सेक्स को 'अननेचुरल' मानता है. और तमाम गे, लेस्बियन, बायसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर को गुनहगार साबित कर देता है. LGBTQ लोगों को जीने, पढ़ने, प्रेम करने का अधिकार मिले, इसलिए ये लड़ाई होती है. ये जुलूस हर साल इसलिए भी निकलता है ताकि हिजड़ा समुदाय की तकलीफों को सामने लाया जा सके.
लेकिन इस बार की परेड के रंग ज्यादा विविध थे. क्योंकि परेड में दलितों, मुसलामानों, औरतों, डिफरेंटली एबल्ड लोगों, कश्मीरियों, नॉर्थ ईस्ट के लोगों, आदिवासियों और हर वो व्यक्ति जिसे ये समाज छोटा और पराया महसूस काराता है के हक में थी.
परेड जंतर मंतर पर ख़त्म हुई. जहां बने स्टेज पर पहले तो लोग जमकर थिरके. फिर अपनी स्पीच और कविताएं पढ़ीं.
जिस समानता को करोड़ों लोग बचपन से जी रहे हैं अपना संवैधानिक अधिकार मानकर, वही समानता पाने के लिए आज भी लोग लड़ रहे हैं. लल्लनटॉप ऐसे सभी लोगों के साथ खड़ा है, खड़ा रहेगा.


.webp?width=60)

