इंडिया में अब जाति को लेकर लोग कह देते हैं कि कहां है जाति. हमें तो दिखती नहीं.खत्म हो गई है. पर जब ऊना में दलितों को मारने-पीटने जैसा घटनाएं होती हैं तब पताचलता है कि जाति कहीं गई नहीं है. अभी ताजा मामला दिल्ली से आया है. दिल्ली केकरावल नगर पुलिस थाने को एक दलित लड़के की गवाही में यकीन नहीं है. इसलिए थाने नेबाकायदा नोटिस देकर उस लड़के से कह दिया कि 'ऊंची जाति' वाले दो 'स्वतंत्र' गवाहलाएं तभी SC/ST (प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रॉसिटीज़) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया जा सकेगा.दो जनवरी को जतिन नाम के दलित लड़के ने पुलिस थाने में एक शिकायत दर्ज करवाई थी. इसशिकायत में दो लोगों पर ये इल्ज़ाम था कि उन्होंने जतिन से मारपीट की और जातिसूचकगालियां दीं. चूंकि जतिन दलित हैं, उनकी शिकायत पर कार्रवाई SC/ST के तहत होनी है.लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज करने से पहले ये बेहूदा शर्त रख दी.मामला क्या है:जतिन सेंट स्टीफेंस में पढ़ता है. उस दिन करावल नगर में जतिन का एक एक्सीडेंट होगया. उस के बाद उसकी कुछ लोगों से बहस हो गई. बकौल जतिन, इसी दौरान उन्हें जातिसूचकगालियां दी गईं. 'श्रीमानजी आपको इस नोटिस के माध्यम से सूचित किया जाता है...आपकोअपने पूर्व दिए बयान के सत्यापन के लिए किसी दो अन्य स्वतंत्र गवाह, जो हाई कास्टहों, दो दिन के अंदर थाने में पेश करें. और अपना SC का सर्टिफिकेट पेश करें.'- जतिन को CrPC की धारा 91 के तहत ये नोटिस मिला. ASI हरबीर सिंह की ओर से भेजागया.मामले को लेकर DCP का बयान इंडियन एक्सप्रेस के हवाले सेहरबीर सिंह ही जतिन के मामले की जांच कर रहे हैं. उन का कहना है कि उन्होंने जतिनको नोटिस भेजने से पहले अपने सीनियर अधिकारियों को सूचित किया था. लेकिन वो येपक्के तौर पर नहीं बता पाए कि ऐसे मामलों में क्या यही तरीका अपनाया जाता है. उनकेसीनियर अधिकारी ऐसे किसी भी नियम के होने से इनकार कर रहे हैं. दिल्ली पुलिस केप्रवक्ता JCP दीपेन्द्र पाठक ने भी यही कहा कि दो स्वतंत्र गवाह लाने की कोई बंदिशनहीं है.मामले को लेकर पीएल पुनिया का बयान इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से मामला जो भी हो, और यहां से आगे जहां भी जाए, पुलिस के एक अधिकारी का बाकायदासरकारी नोटिस में इस तरह की बात करना बेहद गैरज़िम्मेदाराना है. लगभग फूहड़ होने कीहद तक.यहां ऐतराज़ दर्ज कराना बेहद ज़रूरी है:'ये मतलब नहीं था' के तर्क से भी ये नहीं समझा जा सकता कि पुलिस कैसे 'ऊंची-जाति'शब्द का इस्तेमाल कर रही है. क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि पुलिस के लिए कुछजातियां ऊंची और कुछ नीची हैं? अगर हां, तो इसका हिसाब पुलिस कैसे लगाती है? पुलिसये कैसे तय करती है कि कोई दलित पुलिस को ठीक-ठाक जानकारी नहीं दे सकता, जिसके लिएसवर्ण गवाहों की ज़रुरत पड़ती है. ऐसा कर के पुलिस क्या देश के कानून नहीं तोड़ रहीहै?न्याय व्यवस्था का उसूल है कि किसी बेगुनाह को सजा न हो. और ये भी समझने वाली बातहै कि पुलिस आरोप लगाने से पहले पूरी तस्दीक करना चाहती है, कि सच्चाई क्या है.लेकिन इस मामले में पुलिस को जो संवेदनशीलता दिखानी थी, उसने नहीं दिखाई.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें :डियर नेता जी, क्रिकेट के इस मामले में जाति को बीच में मत लाइएजाति पर वोट बटोरने के चक्कर में AAP ने निहायत घिनौना काम किया है