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लेबनान में हुए पेजर विस्फोट में इजरायल का हाथ? अब तक क्या-क्या पता चला है?

Pager Blasts in Lebanon: लेबनान के सुरक्षा सूत्रों का कहना है कि इजरायल की जासूसी एजेंसी मोसाद ने हिजबुल्लाह के मंगाए पेजरों के अंदर विस्फोटक प्लांट किए.

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सुरभि गुप्ता
| अंकित कुमार
18 सितंबर 2024 (अपडेटेड: 18 सितंबर 2024, 04:35 PM IST)
Pager Blasts in Lebanon
इन धमाकों में 9 लोगों की मौत हुई है. लगभग 3 हजार लोग घायल हुए हैं. (फोटो: AFP)
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पश्चिम एशियाई देश लेबनान की राजधानी बेरुत (Beirut) में 17 सितंबर को एक साथ हजारों पेजर में विस्फोट हुए. Pager एक वायरलेस टेली कम्युनिकेशन डिवाइस होता है. इससे वॉइस मैसेज और लिखित मैसेज भेजे जा सकते हैं. 17 सितंबर को स्थानीय समयानुसार दोपहर करीब 3:30 बजे पेजर में धमाके शुरू हुए. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ये धमाके बेरुत के दक्षिणी उपनगरों दहियाह और पूर्वी बेका घाटी में शुरू हुए, जो हिजबुल्लाह का गढ़ हैं. इन धमाकों में 9 लोगों की मौत हुई है. लगभग 3 हजार लोग घायल हुए हैं. इनमें हिजबुल्लाह के लड़ाकों सहित ईरान के राजदूत भी शामिल हैं.

लेबनान में पेजर धमाकों के लिए कौन जिम्मेदार?

रिपोर्ट्स के मुताबिक लेबनान के सुरक्षा सूत्रों ने इन धमाकों में इजरायल का हाथ बताया है. हिजबुल्लाह ने महीनों पहले विदेश से 5 हजार पेजर मंगाए थे. लेबनान के सुरक्षा सूत्रों का कहना है कि इजरायल की जासूसी एजेंसी मोसाद ने हिजबुल्लाह के मंगाए पेजरों के अंदर विस्फोटक प्लांट किए. हालांकि, इजरायल की ओर से फिलहाल इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

लेबनान में फटने वाले पेजर्स को किसने बनाया था?

जो पेजर्स फटे, उन पर ताइवान की कंपनी गोल्ड अपोलो के कमर्शियल ट्रेडमार्क थे. हालांकि, कंपनी ने कहा कि उसने इन पेजर्स को नहीं बनाया था. ताइवानी कंपनी गोल्ड अपोलो का कहना है कि विस्फोट होने वाले पेजर बुडापेस्ट की एक कंपनी द्वारा बनाए गए थे. ताइवानी कंपनी के मुताबिक, इन पेजर्स का उत्पादन BAC नाम की कंपनी ने किया था, जिसके पास गोल्ड अपोलो के ब्रांड का इस्तेमाल करने का लाइसेंस है.

ये भी पढ़ें- पेजर को हैक करना कितना आसान है? और इतने बड़े विस्फोट करना कितना मुश्किल?

क्या ये इजरायल का मास साइबर अटैक था?

एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि ऐसा संभव नहीं है कि पेजर को हैक करके उसमें रिमोटली विस्फोट कराया जा सके. लेबनान में जिन पेजर में विस्फोट हुए, वो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस थे न कि डिजिटल डिवाइस. इसलिए ज्यादा संभावना इस बात की जताई जा रही है कि हमलावरों को कहीं से पेजर्स का फिजिकल एक्सेस मिला हो.

अगर ये साइबर-हैक नहीं था, तो ये कैसे हुआ?

कुछ एक्सपर्ट्स के मुताबिक हो सकता है कि जब हिजबुल्लाह को पेजर सप्लाई किए गए हों, उसी दौरान उनमें किसी तरह की सेंध लगाई गई हो. इसके तहत पेजर में कुछ गड़बड़ी की गई हो. हिजबुल्लाह ने इन पेजर्स को विदेशी चैनलों के जरिए खरीदा था. हो सकता है कि इन डिवाइसेज़ के एक नए बैच की शिपमेंट की खुफिया जानकारी ली गई हो. फिर ग्राउंड के एजेंटों के साथ मिलकर हमलावरों ने पेजर के हार्डवेयर में कुछ बदलाव किए हों. काफी संभावना है कि पेजरों में विस्फोटक सामग्री या उपकरण फिट किए गए हों.

हिजबुल्लाह पेजर जैसी पुरानी तकनीक क्यों यूज कर रहा था?

आधुनिक डिजिटल कम्युनिकेशन (जैसे इंटरनेट और स्मार्टफोन एक्टिविटी) की निगरानी करने में इजरायल माहिर है. इसलिए हिजबुल्ला अपने लड़ाकों को सुरक्षा कारणों से पेजर्स का इस्तेमाल करने के लिए कहता रहा है. ताकि उनकी लोकेशन का पता नहीं लगाया जा सके. लैंडलाइन फोन और पेजर जैसी पुरानी तकनीकों का इस्तेमाल डिजिटल निगरानी से बचने के लिए एक अच्छी रणनीति की तरह लग रहा था, जो उल्टा पड़ गया. आधुनिक सेटिंग में, पेजर के सीमित इस्तेमाल ने विदेशी एजेंसियों के लिए हिजबुल्लाह से जुड़े लोगों की पहचान करना भी आसान बना दिया.

भारत इससे क्या सबक ले सकता है?

भारत ने इसी तरह के जोखिमों को कम करने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन देश को अपने पब्लिक कम्युनिकेशन हार्डवेयर की समीक्षा जारी रखनी चाहिए. उदाहरण के लिए, अपने 5G रोलआउट में विदेशी (विशेष रूप से चीनी) तकनीक को शामिल न करने का भारत का फैसला अहम है. जैसा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस महीने की शुरुआत में कहा था, स्वदेशी 5G स्टैक विकसित करना भले ही शुरू में महंगा लग सकता है, लेकिन ये लंबे समय में देश की सुरक्षा के लिए फायदेमंद होगा.

वीडियो: हिजबुल्लाह के ताबड़तोड़ हमले के बाद इजरायल में लगी इमरजेंसी, लेबनानी सीमा के समुद्री तट पूरी तरह से सील

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