आजमगढ़ का गांव नदवां सराय. गांव का माहौल इस वक्त गमज़दा है. एक बेटा सरहद कीहिफाजत में देश के काम आया. लेकिन अफसोस है तो बस इतना कि इनके जनाजे में न कोईनेता पहुंचा, न मंत्री, न अफसर. कोई नहीं पहुंचा. न सेना और शहीदों के नाम परराजनीति करने वाले. न ही राजनीति न करने को कहने वाले.रजीजुद्दीन उर्फ दानिश खान घर के बड़े बेटे थे. कश्मीर में इनकी तैनाती थी. इनके दोछोटे भाई हैं. एक यूपी पुलिस में. दूसरा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है. बहन कीशादी इसी साल 24 फरवरी को की थी. और दो दिन बाद यानी 26 फरवरी को दानिश का निकाहहुआ था. महज 9 महीने हुए थे शादी को. और अभी ये खबर आ गई.Image: Facebookशहादत से ज्यादा इस बात पर अफसोस पूरा परिवार बेबस है. लाचार और आंसुओं में डूबाहै. मां बाप को अपने बेटे पर गर्व जरूर होगा. लेकिन इस बात का अफसोस भी होगा कि DM,SSP तक उसके जनाजे में नहीं पहुंचे. सिर्फ SDM ने वहां जाने की जहमत उठाई. DM सेहमने फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन फोन नहीं उठा. इसके लिए क्या कर सकते हैं.क्या है इस अनदेखी की वजह? क्या इसलिए कि ये आजमगढ़ था, जिसे बहुत सारे लोग 'आतंककी नर्सरी' मानते हैं. या इसलिए कि मरने वाला दानिश था और उसके नाम के आगे 'ख़ान'था?रामकिशन ग्रेवाल ने सुसाइड कर लिया. इस घटना को अगर भूल गए हो तो याददाश्त वालीदवाएं खाओ. अभी तो उस घर की दीवारों से भी सिसकियों की आवाज आती होगी. अरविंदकेजरीवाल ने रामकिशन को शहीद कह एक करोड़ रुपए देने का ऐलान कर दिया. हरियाणा सरकारने भी 10 लाख रुपये का ऐलान किया. बड़ी भद्द पिटी. सवाल उठे कि अब क्या वो हर शहीदके परिवार को एक करोड़ रुपए देंगे?इसके पहले अरविंद की रैली के सामने खुदकुशी करने वाले किसान को भी अरविंद ने शहीदकहा था. दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर खिंचाई भी की थी. क्या दानिश की शहादत इन तमामदायरों में फिट नहीं बैठती?कुछ दिन पहले सेना को बधाई पेश की जा रही थी. काम ही ऐसा किया था. सर्जिकलस्ट्राइक. पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया. उस पर जिसने भी मुंह खोला उसको ठीक सेसमझा दिया गया. कि सेना और शहीदों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. सर्जिकल स्ट्राइक परसवाल उठाने वाले देशद्रोही हैं. सारा माहौल सेना के प्रेम में बावला हो गया. तमामजगह ऐसे पोस्टर छप गए.माननीय मुलायम सिंह यादव की सलाह पर सरकार ने सेना से सलाह की. और काम हो गया. इसकीजानकारी भी हमें पोस्टर्स से मिली.इन पोस्टर्स और तमाम मुआवजे का मतलब तो यही हुआ न कि ये शहीद बहुत मायने रखते हैंनेताओं, मंत्रियों के लिए. लेकिन कौन से सैनिक और कौन से शहीद. ये क्लियर नहीं होरहा. क्या शहीदों में खास तरह के शहीदों को कम सम्मान दिया जा सकता है?क्या दानिश उस कैटेगरी में फिट नहीं बैठते? दिन भर शहीद के गांव के बच्चे-बच्चे काइंटरव्यू चलाने वाले चैनल भी वहां नहीं पहुंच पाए. लीडरी और अफसरी को इस शहीद सेपरहेज क्यों रहा? आपको समझ आए तो बताइएगा.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:शहीद के शहद से रामकिशन को बरी करो, तमाम फौजियों को भीदुश्मन के लिए तलवार हैं हम: BSF की लेडी सोल्जर्स