'ऊंची' जाति वालों ने किया कमाल, दलितों के न काटने दे रहे बाल
फिर बता रहे हैं. मत कहो कि जाति पांति का भेद खतम हो गया. मुजफ्फरनगर के इस गांव में दलितों के बाल नहीं काटने देते 'ऊंची' जाति वाले.
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फोटो - thelallantop
मुजफ्फरनगर तो याद ही होगा. वहां का एक गांव वहां रहने वालों की भकुवापनी की वजह से चर्चा में है. वहां के हेयर कटिंग सैलून जो हैं. वो दलितों के बाल नहीं काट रहे. दाढ़ी नहीं बनाते. बताते हैं कि ये यहां की सदियों पुरानी परंपरा है.
एक पुरानी कचरा छाप परंपरा को ढोते हुए आगे न बढ़ने की कसम खा चुके हैं लोग. दुकानें चलाने वाले नाई खुद को मजबूर बताते हैं. अपना पुश्तैनी धंधा पकड़े हैं. कहते हैं गांव के ठाकुर मना करते हैं दलितों के बाल काटने से. हम क्या करें? क्या अपने हाथ पैर तोड़वाएं.
देखो ये हैं दलित राम भोले. बताते हैं कि न हमारे बड़े बुजुर्गों के बाल काटे जाते. न हमारे बच्चों के. सालों से यह सिलसिला चल रहा है.
Image: ANI
लेकिन आदमी कब तक बर्दाश्त करे. आखिर इन गांव वालों के सब्र का प्याला छलका और अपने हक का एहसास हुआ. अब ये इकट्ठा होकर आंदोलन करने की ठान चुके हैं. नीचे कुछ तस्वीरें हैं. उन गांव वालों की, जिन्होंने इस ढपोरसंखी परंपरा से लड़ने का मन बनाया है.
Image: ANI
हरीश कहते हैं "अब हम विरोध करने के लिए एकजुट हो गए हैं. हमें संविधान के अनुसार हर नागरिक के बराबर अधिकार चाहिए."
'शहीद को चिता की जमीन नहीं देंगे, क्योंकि 'नीची' जाति का था'
एक पुरानी कचरा छाप परंपरा को ढोते हुए आगे न बढ़ने की कसम खा चुके हैं लोग. दुकानें चलाने वाले नाई खुद को मजबूर बताते हैं. अपना पुश्तैनी धंधा पकड़े हैं. कहते हैं गांव के ठाकुर मना करते हैं दलितों के बाल काटने से. हम क्या करें? क्या अपने हाथ पैर तोड़वाएं.
देखो ये हैं दलित राम भोले. बताते हैं कि न हमारे बड़े बुजुर्गों के बाल काटे जाते. न हमारे बच्चों के. सालों से यह सिलसिला चल रहा है.
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लेकिन आदमी कब तक बर्दाश्त करे. आखिर इन गांव वालों के सब्र का प्याला छलका और अपने हक का एहसास हुआ. अब ये इकट्ठा होकर आंदोलन करने की ठान चुके हैं. नीचे कुछ तस्वीरें हैं. उन गांव वालों की, जिन्होंने इस ढपोरसंखी परंपरा से लड़ने का मन बनाया है.
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हरीश कहते हैं "अब हम विरोध करने के लिए एकजुट हो गए हैं. हमें संविधान के अनुसार हर नागरिक के बराबर अधिकार चाहिए."
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