झारखंड के जामती गांव में 14 मार्च को कुछ माओवादी वहां आ धमके. बंदूक से पूरी तरहलैश. अक्सर आते रहते हैं. बाल दस्ता करके उनकी एक टीम हैं. जिसमें सिर्फ बच्चे होतेहै. उसी के लिए बच्चों का सेलेक्शन करने. वो भी लॉटरी से. खानदानी तरीका है उनकाबच्चों को बाल दस्ता में भर्ती करने का. आते ही गांव के चौराहे पर पड़े ब्रास केभगोने में पेपर चिट्स डाले. दो लड़कियों का नाम आया. उनमें से एक थी 38 साल के पारूमांझी की बेटी शीला. और दूसरी 10 साल की मीरा. नाम सुनने के बाद पारू तो सन्न रहगया. वो माओवादियों के पैरों में गिर गया और मिन्नत करने लगा कि उसकी बेटी को छोड़दे. दरअसल पारू अपनी शीला को टीचर बनाना चाहता है. लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ.ले गए दोनों बच्चियों को. माओवादी गोरिल्ला का कहना है कि बच्चों को निष्पक्ष तरहसे भर्ती करने का ये तरीका हमें अपनाना पड़ा क्योंकि लोग अपने बच्चों को देने केलिए तैयार नहीं थे. अब ये लोग बच्चों को लेने के लिए पब्लिक लॉटरी निकालते हैं.ताकि स्टेट के सिक्युरिटी फोर्स के खिलाफ एक सेना तैयार कर सकें. ये गांव के लोगोंको मीटिंग में बुलाते हैं. उन लोगों के नाम का चिट बनाते हैं जिनके एक से ज्यादाबच्चे हैं. और इस तरह वो बच्चों का चुनाव करते हैं. इन माओवादियों पर आरोप है कि येहर साल बच्चों को भर्ती करते हैं. लेकिन इनसे कम रिस्क वाले काम कराते हैं.टेक्नोलॉजी और कंप्यूटर में ट्रेन्ड करते है. जब से इन लोगों ने बच्चों को लड़ाईयोंमें और लड़कियों का सेक्सुअली शोषण करने लगे, कोई पेरेंट्स अपने बच्चों को इन्हेंदेना नहीं चाहता. लॉटरी के तरीके से गांव वाले अब खौफ खाने लगे हैं. इसलिए अपनेबच्चों को रिश्तेदार के पास दूसरे शहर में भेज दिया है. गुमला में रहने वाले फांडूमुंडा ने बताया कि स्लेन माओवादी ने उसकी बेटी को 11 साल की उम्र में ले गए थे. औरगोरिल्ला फाइटर बना दिए. 6 साल बाद जब उसने उन लोगों का विरोध किया तो उसे पुलिस काइंफार्मर बताकर मार डाला. गांव के लोगों के अंदर माओवादियों का इतना खौफ है कि वोउनकी शिकायत लेकर पुलिस के पास कभी नहीं गए. पुलिस के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं हैजो ये बता सके कि कितने बच्चों को माओवादियों ने भर्ती किया है. रेबल ग्रुप केस्पोक्सपर्सन दीनबंधु ने एक इंटरव्यू में कहा था कि इन लोगों ने 16 साल से कम उम्रवाले बच्चों को कभी भर्ती नहीं किया. पर गांव वालों का कहना है कि माओवादी लीडर हरपरिवार को धमकी देता है कि अगर उनके दो बच्चे हैं तो एक को उनके साथ भेजो. वरनालॉटरी के जरिए बच्चों को ले जाएंगे. इन्होंने डर से गांव में पुलिस की तैनाती 24घंटे मांगा है. सरकारी स्कूल की एक टीचर का कहना है कि पुलिस गेस्ट की तरह आती हैऔर जाती है. हम माओवादियों की दया के भरोसे हैं. उनके फैसले को हम नकार नहीं सकते.इसलिए मैंने अपने पति और बच्चों को पास के शहर में भेज दिया है और खुद यहां अकेलेरहती हूं.