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रेमडेसिविर कोरोना की दवाई नहीं है, फिर मरीज़ों पर क्यों हो रहा इसका इस्तेमाल?

रेमडेसिविर पर हजारों रुपये खर्च करने से पहले ये बातें जानना जरूरी है.

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Corona Virus की दूसरी लहर ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया है. ऐसे में कुछ दवाइयों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है. इन दवाइयों में Remdesivir का नाम प्रमुख है. दोनों तस्वारें प्रतीकात्मक हैं और पीटीआई से ली गई हैं.
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मुरारी
19 अप्रैल 2021 (अपडेटेड: 20 अप्रैल 2021, 07:22 AM IST)
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हमारा देश इस समय हेल्थ इमरजेंसी से जूझ रहा है. कोरोना वायरस (Coronavirus) संक्रमण की दूसरी लहर ने पूरे देश को अपनी जद में ले लिया है. बहुत से राज्यों और शहरों में हालात बद से बदतर हो गए हैं. पूरे देश में हर दिन लाखों मामले सामने आ रहे हैं. वहीं हजारों लोगों की मौत हो रही है. अस्पतालों से लेकर श्मशानों और कब्रिस्तानों तक लाइन लगी हुई है. इस बीच एक तरफ हजार जहां वेंटिलेटर्स वाले बेड और ऑक्सीजन (Oxygen) की मांग बढ़ गई है, तो वहीं दूसरी तरफ कुछ दवाइयों को लेकर माहौल ये है कि इनके नाम भी अब आम लोगों को रट गए हैं. जैसे- रेमडेसिविर(Remdesivir), फैबीफ्लू (Fabiflu) और डेक्सामेथासोन (Dexamethasone).
कोरोना वायरस मरीजों के इलाज के लिए जिन दवाइयों का प्रयोग किया जा रहा है, उनमें से कुछ एंटी वायरल दवाइयां हैं. और कुछ स्टेरॉइड्स. इन दोनों ही तरह की दवाइयों का यूज अलग-अलग तरीके से अलग-अलग स्टेज पर होता है. रेमेडेसिविर और फैबी फ्लू जैसी एंटी वायरल दवाइयां जहां महंगी हैं, वहीं दूसरे स्टेरॉइड्स सस्ते हैं. इसके साथ ही इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी का भी यूज हो रहा है. Remdesivir और FabiFlu सबसे पहले हम एंटी वायरल दवाओं की बात कर लेते हैं. यानी रेमडेसिविर और फैबी फ्लू की. जैसा कि ऊपर बताया कि इन दवाइयों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है. मेरे खुद के पास पिछले दिनों रेमडेसिविर की मांग करने वाले ढेर सारे मेसेज आ चुके हैं. वहीं हाल ही में केंद्र सरकार ने बढ़ती हुई मांग को देखते हुए रेमडेसिविर की कीमतें फिक्स की हैं. दूसरी तरफ इनकी कालाबाजारी भी बहुत बढ़ गई है. अलग-अलग राज्यों में इन दवाइयों की जमाखोरी करने वाले पकड़े जा रहे हैं.
रेमडेसिविर और फैबी फ्लू का प्रयोग कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों पर किस तरह से किया जा रहा है. इसे समझने के लिए हमने हरियाणा सरकार के साथ काम कर रहे कम्युनिटी मेडिसिन के एमडी से बात की. एक्सपर्ट ने हमें बताया कि इन दवाओं का यूज वायरस संक्रमण के शुरुआती दस दिनों के भीतर किया जाता है. उन्होंने बताया-
"रेमडेसिविर और फैबी फ्लू एंटी वायरल दवाइयां हैं. इन्हें इंजेक्शन के तौर पर दिया जाता है. रेमडेसिविर अच्छे रिजल्ट दे रही है. फैबी फ्लू के बारे में ज्यादा डेटा उपलब्ध नहीं है. लेकिन ये दवाइयां कोविड इन्फेक्शन के फर्स्ट फेज में काम आती हैं. मतलब संक्रमण होने के दस दिनों के भीतर. जो मरीज ठीक हो रहे हैं, ज्यादातर की बॉडी में वायरस दस दिन से ज्यादा नहीं रहता. लेकिन शुरुआती दस दिनों में यह खुद को बहुत तेजी से बॉडी में फैलाने की कोशिश करता है. ऐसे में ये दवाइयां शरीर के उन एंजाइम को ब्लॉक कर देती हैं, जिनके जरिए ये वायरस खुद को शरीर में फैलाता है. वायरल लोड कम होने से मरीज के मरने के चांस भी कम हो जाते हैं. क्योंकि जितना कम वायरस, उतना कम इन्फेक्शन."
साल 2009 में रेमडेसिविर को मुख्य तौर पर हेपेटाइटिस सी के इलाज के लिए बनाया गया था. लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली. साल 2015 में इसे बनाने वाली कंपनी ने कुछ परीक्षण किए और पाया कि यह दवा खतरनाक इबोला वायरस को ब्लॉक करने में कामयाब है. कुछ और परीक्षण हुए तो पता चला कि रेमडेसिविर दवा कोरोना वायरस फैमिली के अलग-अलग वायरस को रोकने में भी कामयाब हो सकती है.
बढ़ी हुई मांग के बाच इंदौर में एक हेलीकॉप्टर में Remdesivir के वायल्स को लोड करते अधिकारी. इन्हें भोपाल पहुंचाया जाना है. फोटो पीटाआई की है.
बढ़ी हुई मांग के बाच इंदौर में एक हेलीकॉप्टर में Remdesivir को लोड करते अधिकारी. इन्हें भोपाल पहुंचाया जाना है. फोटो पीटाआई की है.

पिछले साल जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस संक्रमण फैलना शुरू हुआ था, तो डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने पहले से मौजूद दवाइयों और वैक्सीन का इस्तेमाल करना शुरू किया. यह जानने के लिए क्या कोई पुरानी दवाई और वैक्सीन इस नए वायरस को रोक सकती है? पता चला कि रेमडेसिविर और फैबी फ्लू ऐसा कर सकती हैं. हालांकि, इसके बाद कई रिसर्च हुईं. जिनमें पाया गया कि ये एंटी वायरल दवाइयां कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों को फायदा नहीं पहुंचा रही हैं. इन दवाइयों को असुरक्षित और खतरनाक भी बताया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा कि इन एंटी वायरल दवाइयों के प्रयोग से कोविड-19 मृत्यु दर पर कोई असर नहीं पड़ रहा है.
महाराष्ट्र में कोविड टास्क फोर्स मेंबर डॉक्टर शशांक जोशी ने इंडिया टुडे को बताया-
"रेमडेसिविर जान बचाने वाली दवाई नहीं हैं. इससे बस ये होता है कि मरीज जल्दी ठीक हो जाता है. वो दो-तीन पहले डिस्चार्ज हो जाता है. ऐसे में इसका यूज एक स्ट्रेटजी के तहत किया जा रहा है. क्योंकि बेड्स कम हैं. ऑक्सीजन की कमी है. ऐसे में पहले से भर्ती मरीजों को ये दवाई दी जा रही है. वो जल्दी डिस्चार्ज हो रहे हैं. इससे दूसरे मरीजों को जल्दी से बेड्स उपलब्ध कराने में सहायता मिल रही है."
दूसरी तरफ पिछले साल नवंबर में दुनिया के जाने-माने मेडिकल जर्नल न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन ने एक रिसर्च पब्लिश की. इसमें बताया था गया कि रेमेडेसिविर के यूज से कोरोना के गंभीर मरीजों की हालत में सुधार हो सकता है. बताया गया कि गंभीर मरीजों को वेंटिलेटर पर ले जाने की जरूरत भी 68 फीसदी तक कम हो सकती है. इसके बाद अमेरिका की ड्रग रेगुलेटर एजेंसी FDA ने रेमडेसिविर को कोविड-19 के इलाज में इस्तेमाल की इजाजत दी थी.
दूसरी तरफ एम्स के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने कहा-
रेमडेसिविर कोई मैजिक बुलेट नहीं है. चीन में हुई पहली स्टडी में इससे कोई फायदा नजर नहीं आया. हम इसका यूज कर रहे हैं क्योंकि हमें अभी तक कोई ढंग की एंटी वायरल दवाई नहीं मिली है. वहीं फैबी फ्लू का मुख्य प्रयोग इनफ्लुएंजा के इलाज में किया जाता है. इबोला के लिए भी इसका प्रयोग किया गया था. कोविड 19 को लेकर इसका डेटा स्ट्रांग नहीं है. ज्यादातर देशों में इसका यूज नहीं होता है. हम कर रहे हैं क्योंकि हमारे पास एंटी वायरल ड्रग नहीं है. लेकिन ना तो ये रेकमेंडेड है और ना ही इलाज के लिए इसको अप्रूवल मिला हुआ है.
स्टेरॉइड्स एंटी वायरल दवाओं के बाद अब हम स्टेरॉइड्स पर आते हैं. कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज के लिए जिन स्टेरॉइड्स का भी प्रयोग किया जा रहा है, उनमें डेक्सामेथासोन, हाइड्रोकॉर्टीसोन, मिथाइलप्रेड़नीसोलोन और टोसिलिजुमैब का नाम प्रमुख है. इनका प्रयोग संक्रमण के दूसरे स्टेज में होता है. इसके बारे में हरियाणा सरकार के साथ काम कर रहे कम्युनिटी मेडिसिन के एमडी ने हमें बताया,
"स्टेरॉइड्स का काम शरीर की हाइपर इम्युनिटी को दबाना है. दरअसल, कोरोना वायरस के मामलों में ये देखा जा रहा है कि इम्यून सिस्टम इस वायरस से लड़ते-लड़ते बेकाबू हुआ जा रहा है. इसे साइटोकाइन स्टॉर्म कहते हैं. इम्यून सिस्टम के बेकाबू होने पर ये शरीर को ही नुकसान पहुंचने लगता है. स्वस्थ कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं. कोविड में जो कॉम्प्लिकेशन हो रहे हैं, वो इम्यून सिस्टम के बेकाबू होने के कारण हो रहे हैं. ऐसे में स्टेरॉइड्स इस हाइपर इम्युनिटी को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं. लेकिन ये इलाज के शुरुआती दिनों में नहीं दिए जाते. एक्टिव इन्फेक्शन के दौरान ये स्टेरॉइड्स नुकसान करते हैं. इन्फेक्शन के बाद डॉक्टर इन्हें मरीजों को दे रहे हैं. स्टेरॉइड्स काफी सस्ते हैं. आसानी से उपलब्ध हैं. इसलिए इन्हें लेकर मारामारी भी नहीं है. लेकिन इन्हें केवल गंभीर और मॉडरेट तौर पर बीमार मरीजों को ही दिया जा रहा है. नॉर्मल और एसिम्प्टोमैटिक मरीजों को ये नहीं दिए जाते."
जाने माने मेडिकल जर्नल लैंसेट में पिछली साल छपी स्टडी के मुताबिक डेक्सामेथासोन नाम का स्टेरॉयड काफी कारगर है. स्टडी बताती है कि वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहे कोविड मरीजों को डेक्सॉमेथासोन देने से मृत्यु दर एक तिहाई कम हो जाती है. प्लाज्मा थेरेपी एंटी वायरल ड्रग और स्टेरॉइड्स के अलावा कोविड 19 के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी का भी यूज किया जा रहा है. इस थेरेपी में कोविड 19 से उबर चुके मरीज का प्लाज्मा किसी दूसरे मरीज को दिया जाता है. माना जाता है कि ठीक हो चुके मरीज के शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ एंटी बॉडीज बन चुकी होती हैं, ऐसे में ये एंटी बॉडीज दूसरे मरीज के बॉडी में जाकर फायदा पहुंचा सकती हैं. हालांकि, जिस मरीज का प्लाज्मा दिया जा रहा है, उसे कोरोना से उबरे हुए दो या तीन महीने से ज्यादा समय नहीं होना चाहिए.
कोविड 19 से बीमार मरीजों के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी का भी यूज हो रहा है. फोटो प्रतीकात्मक है और पीटीआई से ली गई है.
कोविड 19 से बीमार मरीजों के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी का भी यूज हो रहा है. फोटो प्रतीकात्मक है और पीटीआई से ली गई है.

इस बारे में भी एम्स के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने बताया,
"शुरुआत में इस थेरेपी को लेकर कॉफी पाजिटिव संकेत मिले थे. लेकिन बाद की स्टडी में सामने आया कि ये थेरेपी भी ज्यादा काम की नहीं है. प्लाज्मा थेरेपी का बहुत लिमिटेड यूज है."
वहीं एक्सपर्ट के मुताबिक कोविड मरीज को कौन सी दवा या थेरेपी कब देनी है, इसका फैसला डॉक्टर तमाम स्टडी, अपने अनुभव और विवेक से करता है. दवाओं को देने के साथ इनके प्रभावों और दुष्प्रभावों को देखने के लिए नियमित तौर पर मॉनीटरिंग और दूसरी जांचों की जरूरत पड़ती है. कुछ बुरा असर होने पर दूसरी दवाएं दी जाती हैं. इसलिए ये दवाएं स्पेशलिस्ट डॉक्टर की देखरेख में ही ली जानी चाहिएं और सेल्फ मेडिकेशन से बचना चाहिए.

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