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भगत सिंह की किताब रखना गुनाह नहीं, ये कह कोर्ट ने आदिवासी बाप-बेटे को छोड़ा

नक्सलियों से संबंध के आरोप में पुलिस ने 12 साल पहले पकड़ा था, UAPA लगाया था.

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(दाएं) कोर्ट के बाहर बरी हुए विट्ठल मालेकुड़िया और उनके पिता. तस्वीर, विट्ठल मालेकुड़िया के फेसबुक एकाउंट से ली गई है.
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सोम शेखर
23 अक्तूबर 2021 (Updated: 23 अक्तूबर 2021, 01:40 PM IST)
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कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के एक दूरदराज के गांव से साल 2012 में पुलिस ने एक युवक को उसके पिता सहित नक्सलियों से लिंक के आरोप में गिरफ्तार किया था. जिस वक्त लड़के की गिरफ्तारी हुई थी वह 23 साल का था. पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. अब लगभग 9 साल बाद जिला अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है. पुलिस दोनों का कोई भी नक्सल लिंक साबित नहीं कर पाई.

क्या है पूरा मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़,  3 मार्च 2012 को कर्नाटक पुलिस की नक्सल विरोधी यूनिट ने 23 साल के विट्ठल मालेकुड़िया और उनके पिता लिंगप्पा मालेकुड़िया को गिरफ़्तार किया था. पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को यह ख़बर मिली कि बाप-बेटे उन पांच नक्सलियों के साथ मिले हुए हैं, जिनकी पुलिस खोजबीन कर रही थी. विट्ठल और लिंगप्पा पर IPC के तहत आपराधिक साजिश रचने के अलावा राजद्रोह और UAPA के तहत आतंकवाद के आरोप लगे थे. पांचों कथित नक्सलियों के नाम भी FIR में थे, लेकिन मिली जानकारी के मुताबिक़, उन्हें अभी तक गिरफ़्तार नहीं किया गया है.

9 साल बाद बरी

कोर्ट ने पाया कि छापे में मिली ज़्यादातर सामग्री लेख और किताबें थीं, जो कोर्ट के मुताबिक़, 'प्रतिदिन की आजीविका के लिए आवश्यक' हैं. छापे में विट्ठल मालेकुड़िया के हॉस्टल से भगत सिंह पर लिखी गई किताब, क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलने तक संसदीय चुनावों के बहिष्कार का पत्र और अख़बार की कुछ कटिंग्स बरामद हुई थीं. कोर्ट ने सबूत देखकर कहा,
"क़ानून के तहत भगत सिंह की किताबें रखना अपराध नहीं है.. ऐसे अख़बार पढ़ना भी क़ानून के तहत प्रतिबंधित नहीं है."
कोर्ट ने विट्ठल और उनके पिता को बरी कर दिया. गिरफ़्तारी के वक़्त, विट्ठल 23 साल के थे और मेंगलुरु विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे. अब 32 साल के हैं और एक कन्नड़ भाषी एक अख़बार में पत्रकार हैं. विट्ठल ने कहा,
"इस मामले में बरी होकर मैं बहुत ख़ुश हूं. हमने 9 साल तक संघर्ष किया. हमें नक्सली चरमपंथियों के रूप में फंसाया गया, लेकिन चार्जशीट में यह कहीं नहीं लिखा था. हमारी बेगुनाही साबित हो गई है."
गिरफ़्तारी के वक़्त विट्ठल को अपनी परीक्षा देने के लिए अदालत के कई चक्कर काटने पड़े थे. अदालती कार्यवाही में पर उन्होंने कहा,
"हम हर सुनवाई में शामिल थे. कोविड के दौरान भी हम कुछ दिन कोर्ट के बाहर खड़े रहते थे. सुनवाई के लिए अपने गांव से मेंगलुरु जाना, हमारे लिए बहुत मुश्किल था. 11 बजे से पहले अदालत पहुंचना होता था और हमारे पास कोई साधन नहीं था."
इस मामले में पिता-पुत्र को साल 2012 में गिरफ़्तारी के 4 महीने बाद तकनीकी ज़मानत मिल गई थी. उस दौरान भी पुलिस न्यायिक हिरासत के 90 दिन पूरे होने के बाद चार्जशीट दाख़िल नहीं कर पाई थी. विट्ठल ने इस साल 19 अप्रैल को केएएस की परीक्षा दी थी, लेकिन जब उन्हें पता चला कि कर्नाटक पुलिस ने हाल ही में 3 साल पुराने देशद्रोह मामले में बेल्थांगड़ी सत्र अदालत में चार्जशीट दाख़िल की है, तब वे चौंक गए. उन्होंने एडिशनल कमिश्नर ऑफ़ पुलिस आलोक कुमार पर अपने जीवन और कैरियर को तबाह करने का आरोप लगाया. विट्ठल मालेकुड़िया अब यह दावा करते हैं कि उन्हें फंसाया गया है. वह एक एक्टिविस्ट हैं और लोगों की भलाई और हक़-हुक़ूक़ के लिए लड़ते रहेंगे. विट्ठल, आने वाले ग्राम पंचायत चुनाव में भी खड़े हो रहे हैं.

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