मोदी सरकार द्वारा देरी से फैसला लेने के कारण भारत में कोराना भयावह हुआ?
उन फैसलों की बात जिनकी मांग पिछले काफी समय से की जा रही थी.
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शिव सेना के मुखपत्र सामना में पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी के काम करने के तरीके पर संपादकीय लिखा है. (तस्वीर: पीटीआई)
बात उन फैसलों की जिनकी मांग पिछले काफी समय से की जा रही थी. जिसकी मांग विपक्षी दलों के नेताओं, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लेकर कई विशेषज्ञ तक कर रहे थे. लेकिन बजाय इन मांगों पर विचार करने के, उन पर सलाह मशविरा करने के केंद्र सरकार के मंत्री उलट पुलट जवाब देते रहे. और जब स्थिति से हाथ से निकल कर भयावह हो गई तो अब केंद्र सरकार की ओर से इनकी घोषणा की गई है. क्या है ये मांगें?
पहला फैसला
वैक्सीनेशन के तीसरे चरण में यानी 1 मई से ऐसे लोग भी वैक्सीन लगवा सकेंगे जिनकी उम्र 18 साल से ज्यादा है. अब तक 45 साल तक के लोगों को ही वैक्सीनेशन की सुविधा उपलब्ध थी. अप्रैल महीने के शुरुआत में ही इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि 18 साल से ज्यादा के उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाने की अनुमति देनी चाहिए. इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण का कहना था कि टीककरण का लक्ष्य सबसे ज्यादा जोखिम वाले लोगों को सुरक्षित करना है.
लेकिन सबसे ज्यादा जोखिम वाला है कौन? एक्सपर्ट्स का भी यही मानना है कि 18-40 साल की उम्र वाले लोग ही ज्यादा बाहर निकलते हैं और कोरोना की दूसरी लहर में ये लोग ज्यादा प्रभावित भी हैं.
दूसरा फैसला
वैक्सीन निर्माता कंपनियां अब सीधे राज्यों को 50 फीसदी वैक्सीन सप्लाई कर सकती हैं. अब तक केंद्र सरकार की ओर से वैक्सीनेशन प्रोग्राम चलाया जा रहा था. राज्य सरकारों के पास ये अधिकार नहीं था कि वे सीधे कंपनियों से वैक्सीन खरीद सकें. महाराष्ट्र और राजस्थान समेत कई राज्य सरकारों ने मोदी सरकार पर वैक्सीन सप्लाई में भेदभाव का आरोप लगाया था. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वैक्सीनेशन के लिए राज्यों को फ्री हैंड करने की मांग भी की थी. केजरीवाल का कहना था कि केंद्र सरकार ने वैक्सीन को सेंट्रलाइज कर दिया है. सारी राज्य सरकारें चुन कर आई हैं, उनके पास अपने डॉक्टर्स और एक्सपर्ट्स हैं. इसलिए राज्य सरकारों को खुली छूट दे देनी चाहिए, ताकि ज्यादा बेहतर तरीके से काम हो सके.
तीसरा फैसला
वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां निर्धारित दामों पर ओपन मार्केट में भी वैक्सीन मुहैया करा सकती हैं. यानी औद्योगिक प्रतिष्ठान और प्राइवेट हॉस्पिटल सीधे कंपनियों से वैक्सीन खरीद सकते हैं. तेजी से बढ़ रहे कोरोना के मामलों के बीच लगातार ये मांग भी उठाई जा रही थी. तमाम प्राइवेट कंपनियां अपने कर्मचारियों को वैक्सीन लगवाना चाहती थीं. ये कंपनियां केंद्र सरकार से अप्रूवल मांग रही थी कि उन्हें वैक्सीन खरीदने दिया जाए. जो भी पैसा बनता है वो देने को तैयार हैं. इससे वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को भी फायदा होगा. जो लगातार पूंजी की कमी होने की बात कह रही थीं. अब जाकर केंद्र सरकार ने इसकी भी मंजूरी दी है.
ये कुछ फैसले थे जो केंद्र सरकार ने वैक्सीनेशन के तीसरे चरण में लिए हैं. इनकी मांग लंबे समय से हो रही थी. लेकिन केंद्र सरकार लगातार इन्हें अनदेखा करती रही. और ये पहली बार नहीं है. इससे पहले जब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने विदेशी वैक्सीन कंपनियों को मंजूरी देने का सुझाव दिया था तब केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने उन पर विदेशी कंपनियों के लिए लॉबिंग करने का आरोप तक का लगा दिया था. हालांकि इसके तीसरे ही दिन मोदी सरकार ने स्पुतनिक V को इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए मंजूरी दे दी थी. और चौथे दिन दूसरे देशों की वैक्सीन के लिए देश के दरवाजे खोलने का रास्ता साफ कर दिया था.
अब बारी जनता की
वैक्सीन न लगवाने के लिए लोगों के अपने तर्क हैं. तर्क ये कि वैक्सीन लगवाने से बांझपन जैसी समस्या आ सकती है. तर्क ये कि वैक्सीन लगवाने से शुक्राणु यानी स्पर्म घट सकते हैं. नपुंसकता आ सकती है. इतिहास देखिएगा तो ऐसे तमाम तर्क कोरोना की वैक्सीन के समय नहीं, पोलियो के टीके के साथ भी दिए जाते रहे हैं. सचाई क्या है? सचाई है कि ये ग़लत और मूर्खतापूर्ण तर्क हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि जो वैक्सीन लगवा रहे हैं, वो कौन-सा वैक्सीन लगवाकर सुरक्षित हैं? वे भी तो संक्रमित हो जा रहे हैं. लेकिन विज्ञान इन तर्कों पर नहीं, बल्कि अपनी वैज्ञानिक चेतना और आकड़ों के आधार पर चीज़ें निर्धारित करता है. और इन आँकड़ों में ये तर्क कहीं नहीं टिकते हैं. नपुंसकता, बांझपन या दूसरी कोई भी समयसा का वैक्सीन से कोई लेना देना नहीं है. ये बात है कि वैक्सीन लगवाने के बाद भी लोग संक्रमित हो रहे हैं. लेकिन जैसा वैज्ञानिक बताते हैं, कि वैक्सीन लगवाने के बाद कम से कम ये तो सुनिश्चित किया जा सकता है कि कोरोना का संक्रमण होने पर भी आपको अस्पताल जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. इसलिए वैक्सीन का जब समय आए, ज़रूर लगवाने जाइए. साथ के कुछ और लोगों का भी पंजीकरण कराइए और उन्हें भी वैक्सीन लगवाने के लिए प्रोत्साहित करिए. जब भी ऐसे तर्क सुनाई दें तो इन्हें काटिए.

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