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नीतीश अब क्या करने वाले हैं, ये 30 साल पहले की बात से पता चलता है

नीतीश कुमार के सीएम पद से इस्तीफा देने के ये होंगे परिणाम.

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26 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 26 जुलाई 2017, 08:50 PM IST)
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'बाई हुक और क्रुक, सत्ता हासिल करूंगा'

ये बात नीतीश कुमार ने कही थी. पटना के कॉफी हाउस में. अस्सी के दशक में. उनकी पटना इंजीनीयरिंग कॉलेज से मिली बीटेक इलेक्ट्रिकल की डिग्री पर फिर गर्द जमने लगी थी. 1977 और 1980 में वह हरनौट सीट से विधायकी का चुनाव लड़कर हार गए थे. घरवाले कह रहे थे कि सियासत छोड़ो कुछ काम धंधा पकड़ो. मगर नीतीश का मन नहीं मान रहा था. और तभी उन्होंने एक दिन आवेश में ये ऐलान किया. चाहे जैसे भी हो. सत्ता हासिल करके रहूंगा.

1985 में सत्ता की पहली सीढ़ी पर चढ़े नीतीश. हरनौट से जीते. 1989 में सांसद बन गए बाढ़ से. लालू प्रसाद यादव उनके बड़े भाई हो गए. मगर कुछ ही बरस में नीतीश को समझ आ गया. कि ये भाई राग सुरीला नहीं रहा. उन्हें लालू ब्रांड पॉलिटिक्स दुरुस्त नहीं लगी. जॉर्ज फर्नांडिस संग नीतीश अलग हो गए. 1994 में उन्होंने समता पार्टी बना ली. मशाल चुनाव निशान मिला. इसके परचम तले विधानसभा लड़े 1995 में. 324 में महज सात सीटें मिलीं. उधर लालू अपने दम 167 सीटें जीत खिलखिला रहे थे. कई को लगा कि एक और नेता अपनी अति राजनीतिक महात्वाकांक्षा का शिकार हो खत्म हो गया. मगर सियासत इस लगने की लंका लगाने का नाम है.

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नीतीश और जॉर्ज ने भाजपा से दोस्ती कर ली. तब जब बीजेपी के पास दोस्त के नाम पर सिर्फ धार्मिक राजनीती करने वाले अकाली दल और शिवसेना थे. फ्रेंड की तरफ से पहला गिफ्ट मिला 1998 में. नीतीश और जॉर्ज मंत्री बन गए. 2004 तक नीतीश के पास लाल बत्ती रही. कभी कृषि मंत्रालय तो कभी रेलवे. 2004 में जब एनडीए हारा तो नीतीश ने पूरी तरह से बिहार पर फोकस कर दिया. और एक साल में ही नतीजा मिला.

फरवरी 2005 में बिहार के चुनाव हुए तो खंडित जनादेश मिला. आरजेडी सत्ता से बाहर हो गई. लग गया राष्ट्रपति शासन. मगर केंद्र में लालू यादव रेल मंत्री बने बैठे थे. उन्हें भरोसा था कि सत्ता में वही लौटेंगे. अक्टूबर 2005 में फिर चुनाव हुए. इस बार बीजेपी-जेडीयू को स्पष्ट बहुमत मिला. और 1994 में जिस आस के साथ नीतीश लालू से अलग हुए थे. वह पूरी हो गई. वह बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. और जमकर काम किया. इसका ईनाम मिला 2010 में. नीतीश के नेतृत्व में जेडीयू-बीजेपी को पिछली बार से भी बड़ा बहुमत मिला. मगर तीन बरस बाद मोदी के नाम पर कट्टी हो गई. जो शायद अब जाकर मिट्ठी में बदलेगी.

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नीतीश कुमार सबसे ज्यादा अपनी राजनीतिक छवि को लेकर सचेत रहते हैं. इसीलिए वह नरेंद्र मोदी के नाम पर बिदके थे. इतने कि पटना में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग के दौरान बीजेपी के नेताओं को अपनी तरफ दे दिया जाने वाला डिनर कैंसल कर दिया उन्होंने. वजह, बस इतनी कि पटना की सड़कों पर उनके और नरेंद्र मोदी के लुधियाना की पांच बरस पुरानी रैली के पोस्टर लगा दिए गए.

नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक छवि को लेकर अब भी सचेत रहते हैं. इसलिए वह यादव परिवार पर लगे करप्शन के इल्जामों के चलते बिदक गए. उन्हें अपनी सुशासन बाबू की छवि पर बट्टा लगता नजर आया.

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नीतीश कुमार छवि के सहारे राजनीतिक सफलता हासिल करने को लेकर सचेत रहते हैं. इसलिए वह बिना लालची हुए काबिज होना चाहते हैं. और इस बार, एक बार फिर बीजेपी इसमें उनकी मददगार बन सकती है. क्योंकि बीजेपी की सियासत को भी मिस्टर क्लीन की छवि सूट करती है. मिस्टर नीतीश कुमार. जिन पर कभी करप्शन का इल्जाम नहीं लगा. जिनसे जब कहा जाता था कि घर बनवा लो, तो जवाब होता था. पहले बिहार तो बना लें.


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