AMU का मुल्ला भागकर JNU आया तो क्या मिला
खां साहेब के मुताबिक नरेंदर आदमी ठीक नहीं. वायरल हुई उनकी मजेदार फेसबुक पोस्ट
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फोटो - thelallantop
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ये जो नीचे आप पढ़ेंगे वो खां साहेब ने लिखा. अपने फेसबुक पर. हमें मजेदार लगा. तो आपके लिए ले आए. आप भी मजे लें. लोड न लें. खां साहेब हिंदू मुस्लिम एकता के पैरोकार नहीं हैं. उनका कहना है कि इस बात में बदमाशी की बू आती है. एकता दो अलग किसिम के लोगों में होती है. मगर उसके लिए आपको इस मुल्क की आबोहवा, भाषा, हरकतों, रोटियों और जमीनों को भी दो हिस्सों में बांटना होगा. अलगाना होगा. जो ये कर सको. तभी हिंदू अलग. मुसलमान अलग. और फिर दोनों को बैठकर मिलाते रहना. जैसे अब तक करते आए हो.अलीगढ़ में मेरे एक टीचर हुआ करते थे अब्दुल वहीद। हम चार-पांच स्टूडेंट उनके चेंबर में हर दिन बैठते थे। एक दिन उन्होंने जेएनयू पर एक किस्सा सुनाया। अब शायद रिटायर होने वाले हैं। रहने वाले शायद बरेली के थे और पढ़ाई-लिखाई से लगभग दुश्मनी थी। उनके अब्बा का ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस था। वो अपनी जीप पर रोज़ाना चलने वाले मुसाफ़िरों के लिए टिकट काटते थे, लुंगी बनियान में। 9वीं क्लास में ही नेवी कट की पैकेट फूंक डालते थे। बोले उसी उम्र में 'रंडी' के कोठे पर जाने से लेकर हर बुरा काम कर डाला था। फिर एक दिन अब्बा ने उनकी आदतों को लेकर तबीयत से डांट पिलाई और बात दिल पर लग गई। जज़्बाती बहुत थे वहीद साहब। उन्होंने सबकुछ छोड़ दिया। किसी तरह रिश्वत देकर 10वीं पास की और अलीगढ़ में दाख़िला ले लिया। अलीगढ़ के हबीब हॉल में एक सीनियर के साथ कमरा शेयर करते थे। उनके रूममेट का एक दोस्त अक्सर कमरे पर आया करता था। फिर दोनों घंटों अंग्रेज़ी में बातें करते। बार-बार जेएनयू का नाम आता था। एक दिन तंग आकर वहीद साहब ने रूममेट से पूछ लिया कि हुज़ूर ये जेएनयू क्या बला है? पढ़ते अलीगढ़ में हैं और बातें हमेशा जेएनयू की करते हैं। सवाल ख़त्म हुआ था कि रूममेट ने जमकर डांटा। कहा कि वहीद तुम्हें बटन की अंग्रेज़ी तो ढंग से आती नहीं और अपनी ज़ुबान से जेएनयू का नाम लेते हो? वहीद साहब को हिदायत दी गई कि जेएनयू का नाम दुबारा मत लेना। वहां ऐरे-गैरे नहीं जाते। वहीद साहब के रूममेट ने उन्हें ढंग से ज़लील किया था। चूंकि वो जज़्बाती बहुत थे तो फटकार दिल पर ले ली। उन्होंने तय किया कि जेएनयू ऐसी भी क्या यूनिवर्सिटी है। अब आगे की पढ़ाई वहीं करूंगा। उन्होंने तैयारी की। पहली बार ट्रेन पकड़कर दिल्ली आए। पूछते हुए किसी तरह जेएनयू पहुंचे। एमए सोशियॉलजी में दाख़िला हुआ। सोशियॉलजी की सारी किताबें का हाफिज़ा कर डाला। यूपीएससी के इंटरव्यू में हर बार फेल हुए। शुरू में जम्मू-कश्मीर यूनिवर्सिटी में पढ़ाया और अब ज़माने से एएमयू में हैं। जेएनयू का ज़िक्र ऐसे आया था कि एक बार एएमयू में एक स्टूडेंट की जान पर बन आई थी। उनका नाम शायद यूसुफ था। HT या TOI में इस्लाम पर एक आर्टिकल लिखने पर कैंपस के कुछ लड़कों ने उन्हें दौड़ा लिया। किसी तरह जान बचाकर वो वहीद साहब के पास पहुंचे। वहीद साहब ने कहा कि भई आप जिस ख़्यालात के हैं, उसके हिसाब से एएमयू ठीक नहीं। आप जेएनयू में दाख़िला ले लें और फिर जो दिल करे, वो सोचे और लिखें। वहां हर कोई आज़ाद है। लिखने-पढ़ने और सोचने के लिए। वहीद साहब बताते थे कि युसूफ ने कैंपस छोड़ा, जेएनयू आए और जो दिल किया सोचा-लिखा और बाद में बीबीसी, लंदन के लिए काम करने लगे। मितरों... नरेंदर आदमी ठीक नहीं हैं वरना इतना बावेला नहीं होता। जेएनयू तो ऐसी जगह है जहां दाढ़ी वाला मुसलमान भी मिलेगा और संस्कृत डिपार्टमेंट में चोटी वाला ब्राह्मण भी। अनायास हमलों से आप क्या हासिल कर लेंगे?खां साहेब किसी भी मजहब के ईश्वर को तकलीफ नहीं देते. उन्हें लोगों से मुहब्बत करने से फुरसत मिले तो ऊपर देखें. कहते भी हैं. कि गर हिसाब होगा ही, तो पहले गालिब और मंटो का होगा. वे बच गए तो हम भी बच जाएंगे. और जो वे ही न बचे, तो हम बचकर क्या स्वर्ग में सलाई ले सूटर बुनेंगे हूरों के लिए.गोश्त, शराब, साहित्य को उलटे क्रम में लाइक करते हैं. इन दिनों कोठेवालियों पर कुछ कुछ लिख रहे हैं. जब लिखते नहीं, तब भटकते हैं. दिल्ली में जो कि पुरानी तरफ कुछ ज्यादा है. चलते चलते एक और बात. बल्कि सलाह. आप इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद खां साहेब को न गरियाएं. कोई उन्हें गाली देता है, तो उन्हें तरस आता है. और फिर वह तय करते हैं कि सामने वाले को और तरसाया जाए. क्रूर खुशी से. और तब साहेब अपनी बिल्ली के बच्चों सी आंखों में शरारत भर ठहाके लगाने लगते हैं. गोया जुमे के रोज जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर कोई पागल अट्टहास कर रहा हो. जो जाने, जैसे जाने कि ये किसके कौल पर हंसता है. - सौरभ द्विवेदी


खां साहेब किसी भी मजहब के ईश्वर को तकलीफ नहीं देते. उन्हें लोगों से मुहब्बत करने से फुरसत मिले तो ऊपर देखें. कहते भी हैं. कि गर हिसाब होगा ही, तो पहले गालिब और मंटो का होगा. वे बच गए तो हम भी बच जाएंगे. और जो वे ही न बचे, तो हम बचकर क्या स्वर्ग में सलाई ले सूटर बुनेंगे हूरों के लिए.गोश्त, शराब, साहित्य को उलटे क्रम में लाइक करते हैं. इन दिनों कोठेवालियों पर कुछ कुछ लिख रहे हैं. जब लिखते नहीं, तब भटकते हैं. दिल्ली में जो कि पुरानी तरफ कुछ ज्यादा है.
चलते चलते एक और बात. बल्कि सलाह. आप इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद खां साहेब को न गरियाएं. कोई उन्हें गाली देता है, तो उन्हें तरस आता है. और फिर वह तय करते हैं कि सामने वाले को और तरसाया जाए. क्रूर खुशी से. और तब साहेब अपनी बिल्ली के बच्चों सी आंखों में शरारत भर ठहाके लगाने लगते हैं. गोया जुमे के रोज जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर कोई पागल अट्टहास कर रहा हो. जो जाने, जैसे जाने कि ये किसके कौल पर हंसता है.
- सौरभ द्विवेदी