अगर नोट बैन के बारे में अमित शाह को भी नहीं पता था, तो इनको कैसे खबर पहुंची?
18 दिन पहले ही बता दिया था 2000 का नोट आने वाला है. 500 और हजार के नोट बंद होने वाले हैं.
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फोटो - thelallantop
नए नोट के लिए लोग एटीएम और बैंक के बाहर. लोगों की भीड़. सिर्फ नोट लेने के लिए. 2000 का नोट नया है मार्केट में तो पहले लेने की भी होड़ है. दावा किया गया था कि इस नोट के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. कुछ वेबसाइट का तो ये भी दावा है कि 2000 का नोट आने वाला है, इस बारे में तो अमित शाह को भी पता नहीं था. क्योंकि अहम फैसला सबसे छिपा के रखा गया था. ताकि काले धन पर लगाम लगाई जा सके. लेकिन दो अखबारों के स्क्रीन शॉट वायरल हो रहे हैं, जिन्होंने पहले ही खबर दे दी थी कि 2000 का नोट मार्केट में आने वाला है. ये खबर नोट बैन होने से 18 दिन पहले ही दे दी गई थी.
ये स्क्रीनशॉट एक बड़ी चूक की तरफ इशारा करते हैं. अगर किसी को भी नहीं पता था तो फिर 'द हिंदू' और 'दैनिक जागरण' को कैसे पता चल गया कि सरकार कोई नया नोट छापने वाली है और पुराने बैन करने वाली है. जब ये खबर आई थी, तब किसी ने इस खबर पर यकीन नहीं किया था. और एक नोट भी वायरल हुआ था. 8 नवंबर को सरकार 2000 के नोट लाने का ऐलान करती है. यानी खबर छपने के 18 दिन बाद. और फिर कहा जाता है कि इस फैसले के बारे में किसी को जानकारी नहीं दी गई थी. ताकि लोग अपने काले धन को ठिकाने नहीं लगा सकें. और इन मीडिया रिपोर्ट्स से जाहिर हो जाता है कि फैसले को छिपाए रखने में सरकार नाकाम रही.
लेकिन मीडिया वालों के अपने सोर्स होते हैं. जो सरकार के अलग-अलग महकमों में होते हैं. और जानकारी दे देते हैं. ये सोर्स ऊंचे अफसर से लेकर चपरासी तक कोई भी हो सकता है. लेकिन इन सूत्रों के बारे में मीडिया वाले जानकारी नहीं देते. ख़बरों तक पहुंचने का ये ही रास्ता मीडिया वाले अपनाते हैं. सरकार के ही अपने फैसले इन सूत्रों से छिप गए तो समझ लो किसी को जानकारी नहीं थी. सूत्रों ने खबर कर दी. और मीडिया वाले उस खबर को ले उड़े. यानी सूत्रों को भी तभी पता चला होगा, जब इस बारे में बैठकें हुई होंगी. तो ये कहना कि किसी को भी इस बारे में पता नहीं था. ये सही नहीं होगा.
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जब बैन लगने के बाद 500 की नोट लेकर दुकान पहुंचे लोग
ये स्क्रीनशॉट एक बड़ी चूक की तरफ इशारा करते हैं. अगर किसी को भी नहीं पता था तो फिर 'द हिंदू' और 'दैनिक जागरण' को कैसे पता चल गया कि सरकार कोई नया नोट छापने वाली है और पुराने बैन करने वाली है. जब ये खबर आई थी, तब किसी ने इस खबर पर यकीन नहीं किया था. और एक नोट भी वायरल हुआ था. 8 नवंबर को सरकार 2000 के नोट लाने का ऐलान करती है. यानी खबर छपने के 18 दिन बाद. और फिर कहा जाता है कि इस फैसले के बारे में किसी को जानकारी नहीं दी गई थी. ताकि लोग अपने काले धन को ठिकाने नहीं लगा सकें. और इन मीडिया रिपोर्ट्स से जाहिर हो जाता है कि फैसले को छिपाए रखने में सरकार नाकाम रही.
लेकिन मीडिया वालों के अपने सोर्स होते हैं. जो सरकार के अलग-अलग महकमों में होते हैं. और जानकारी दे देते हैं. ये सोर्स ऊंचे अफसर से लेकर चपरासी तक कोई भी हो सकता है. लेकिन इन सूत्रों के बारे में मीडिया वाले जानकारी नहीं देते. ख़बरों तक पहुंचने का ये ही रास्ता मीडिया वाले अपनाते हैं. सरकार के ही अपने फैसले इन सूत्रों से छिप गए तो समझ लो किसी को जानकारी नहीं थी. सूत्रों ने खबर कर दी. और मीडिया वाले उस खबर को ले उड़े. यानी सूत्रों को भी तभी पता चला होगा, जब इस बारे में बैठकें हुई होंगी. तो ये कहना कि किसी को भी इस बारे में पता नहीं था. ये सही नहीं होगा.

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