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तो ये तरीका है स्मॉग से निपटने का!

क्लाउड सीडिंग से धुंध छंट सकती है, पर ये है क्या?

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7 नवंबर 2016 (Updated: 7 नवंबर 2016, 03:16 PM IST)
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दिल्ली में कई दिनों से स्मॉग छाया हुआ है. लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है. आंखों में जलन हो रही है. मास्क की बिक्री बढ़ गई है. सरकार भी कई कदम उठा रही है. तरह-तरह के तरीके सोचे जा रहे हैं कि कैसे इसका सामना किया जाए. ये धुंध लंबे समय के लिए घातक है. पानी का छिड़काव करवाया जा रहा है. पांच दिनों तक दिल्ली में कंस्ट्रक्शन बंद कर दिया गया है. इससे बचने के लिए जो कई तरीके बताए जा रहे हैं उनमें एक है- क्लाउड सीडिंग. लेकिन ये टेढ़ी खीर है. क्या है क्लाउड सीडिंग? ये साइंस का कमाल है. इसमें बादलों की बारिश करने की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है. ये तब ज्यादा आसान होता है जब नमी वाले खूब सारे बादल आसमान में मौजूद हों. आसमान में एयरक्राफ्ट की मदद से कुछ ऐसे तत्त्व छोड़े जाते हैं जिससे बादलों में तेज संघनन हो सके. संघनन याद होगा आपको. छोटी कक्षाओं में रटाया जाता था. इसमें भाप पानी में बदल जाती है और बादल भारी हो जाते हैं. ये भार जब ज्यादा बढ़ जाता है तो बारिश हो जाती है. इसे आसानी से ऐसे समझें जैसे नगर निगम वाले मच्छर मारने के लिए सड़कों पर छिड़काव करते हैं वैसे ही ये छिड़काव एयरक्राफ्ट से आसमान में होगा और इससे बादलों की बारिश करने की क्षमता बढ़ाई जाएगी. जो तत्त्व बारिश करवाने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं उनमें ज्यादातर सिल्वर आयोडाइड एयरोसॉल, पोटैशियम आयोडाइड या ड्राई आइस होते हैं. 300px-Cloud_Seeding.svg इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए क्लाउड एयरोसोल इंटरेक्शन एंड एक्सपेरिमेंट एनहैंसमेंट एक्सपेरिमेंट (सीएआईपीईएक्स) के सीनियर साइंटिस्ट ने कहा कि धुंध को छांटने के लिए और हल्की सी भी बारिश करवाने के लिए पहले प्रदूषण के बारे में स्टडी करनी होगी. 300px-Cloudseedingimagerevised दिल्ली में बढ़ते एयर पॉल्यूशन की वजह से इसके लिए पहले ही कैंपेन शुरू कर दिया गया था. पिछले साल दिल्ली एअरपोर्ट पर एक टॉवर लगाया गया था, जिससे कोहरे की डायनेमिक्स (गतिकी) को समझा जा सके. इसके अलावा एयरोसॉल की भी स्टडी करनी होगी. एयरोसॉल हवा में घुले हुए कण होते हैं. उन्होंने आगे कहा कि हमें धुंध को छांटने के लिए इसकी केमिस्ट्री समझनी होगी. कोहरे के कण बढ़ते नहीं है. वो बस हवा में घुले रहते हैं. इसमें नमी मौजूद होती है और हमें एयरोसॉल की मदद से इसके कण बड़े करने होंगे और पानी की बूंदें बनानी होंगी. फिर इन बूंदों को भारी करके बारिश करानी होगी. लेकिन क्लाउड सीडिंग में इस बात की गारंटी नहीं है कि बारिश होगी ही. इसमें बस बादलों की क्षमता बढ़ाई जाती है. विन्सेंट शैफर (1906-1993) ने 1946 में क्लाउड सीडिंग के बारे में बताया था. वो और नोबेल पुरस्कार विजेता इरविंग लैंगमर माउंट वाशिंगटन पहाड़ पर चढ़ रहे थे तभी उनके बीच इस बारे में बात हुई थी. इसका पहली बार अमेरिका में प्रयोग किया गया. बहुत अच्छा रिजल्ट नहीं रहा. इसके बाद चाइना, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया ने भी इसका प्रयोग किया लेकिन ज्यादा सफलता नहीं मिली. ऑस्ट्रेलिया में ये सिस्टम मैदानों में तो नहीं चला लेकिन तस्मानिया आइलैंड में सफल रहा. क्लाउड सीडिंग में सबसे ज्यादा खर्च चाइना करता है. भारत को चाइना ने क्लाउड सीडिंग टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट भी की है. चाइना ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में क्लाउड सीडिंग का प्रयोग किया था. इंडिया में भी इसका इस्तेमाल किया जा चुका है. 1983, 1984-87, 1993-94 में तमिलनाडु सरकार ने भयंकर सूखे की वजह से इसका प्रयोग किया. 2003 और 2004 में कर्नाटक सरकार ने भी इसकी शुरुआत की. महाराष्ट्र ने  भी इसी साल इसकी शुरुआत की. 2008 में आंध्र प्रदेश के 12 प्रदेशों में इसका प्लान बनाया गया. इसके अलावा इंडोनेशिया, कुवैत, यूनाइटेड अरब अमीरात, अफ्रीका में इसका  इस्तेमाल किया गया है. इसके नुकसान भी हैं. केमिकल के प्रयोग की वजह से पॉल्यूशन बढ़ सकता है और सबसे बड़ा नुकसान तो यही है कि बारिश हो न हो, कोई गारंटी नहीं. ये एक ऑप्शन भर है. स्थिति खराब होने पर हर ऑप्शन पर गौर किया जाना जरूरी है. हो सकता है ये सफल हो जाए और लोगों को बड़ी राहत मिल जाए. देखते हैं. इसे और अच्छे से समझने के लिए ये देखें- https://www.youtube.com/watch?v=imZ8XxdhhF0

ये स्टोरी निशान्त ने की है. 


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