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जब समलैंगिक विवाह मामले में CJI चंद्रचूड़ ने कहा, "शादी के लिए महिला-पुरुष जरूरी हैं क्या?"

CJI चंद्रचूड़ ने पूछा कि क्या शादी करने के लिए बाइनरी जेंडर - यानी पुरुष और महिला - का होना ज़रूरी है?

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चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ इस मसले की सुनवाई कर रही है. (फोटो: इंडिया टुडे और Unsplash.com)
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सोम शेखर
20 अप्रैल 2023 (अपडेटेड: 20 अप्रैल 2023, 10:34 PM IST)
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सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं पर आज लगातार तीसरे दिन सुनवाई हुई. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ इस मसले की सुनवाई कर रही है. इस दौरान CJI चंद्रचूड़ ने पूछा कि क्या शादी करने के लिए बाइनरी जेंडर - यानी पुरुष और महिला - का होना ज़रूरी है?

तीसरे दिन की सुनवाई में क्या हुआ?

याचिकाकर्ताओं के वकील केवी विश्वनाथन ने सवाल किया कि केंद्र सरकार का कहना है कि समलैंगिक जोड़े बच्चे पैदा नहीं कर सकते, तो क्या शादी करने के लिए प्रजनन एक वैध आधार है? इसके आगे उन्होंने तर्क दिया कि 45 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाएं जो प्रेगनेंसी के लिए फ़िट नहीं होतीं, उन्हें तो शादी करने की अनुमति है. वो हेट्रो-सेक्शुअल जोड़े, जो किसी कारण से बच्चे नहीं पैदा कर सकते - उन्हें भी शादी करने की इजाज़त है. 

इसके आगे याचिकाकर्ताओं ने ये भी तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 21 अपनी पसंद से शादी करने का अधिकार देता है. वरिष्ठ वकील ने ये भी कहा कि विवाह का अधिकार ऐसे जोड़ों (समलैंगिक) को सामाजिक सुरक्षा देगा.

इस पर CJI चंद्रचूड़ ने 2018 के उस फ़ैसले का ज़िक्र किया, जिसके तहत समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाया गया था. कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ये तो माना ही था कि सहमति से एक ही जेंडर के वयस्कों के बीच संबंध मान्य हैं. साथ ही ये भी माना कि ऐसे संबंध स्थिर होते हैं. CJI चंद्रचूड़ ने कहा,

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इससे पहले नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ़ से तर्क आया था कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग शहरी कुलीन विचार या urban eltitst view है. बीते रोज़, सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी पर टिप्पणी की थी. चीफ जस्टिस ने कहा था कि समलैंगिक विवाह की मांग को लेकर शहरी क्षेत्रों से अधिक लोग सामने आए हैं. लेकिन सरकार के पास इस तरह का कोई डेटा नहीं है जिससे ये सिद्ध हो सके कि समलैंगिक विवाह शहरी अभिजात्य कॉन्सेप्ट है. 

वीडियो: समलैंगिक विवाह पर दिल्ली हाईकोर्ट में सेंटर के तर्क को LGBT एक्टिविस्ट ने कहा संवेदनहीन

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