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चीन ने ईरान को इस युद्ध में अकेला क्यों छोड़ दिया? जवाब सुनकर पाकिस्तान खुश हो जाएगा

पश्चिम एशिया में चल रही जंग के बीच एक सवाल बीते कई दिनों से उठ रहा है कि चीन ने जंग में दखलअंदाजी देने के बजाय ईरान से इतनी दूरी क्यों बनाए रखी है? और अगर कभी पाकिस्तान जंग में फंसा, तब भी क्या चीन यही रणनीति अपनाएगा?

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23 मार्च 2026 (अपडेटेड: 23 मार्च 2026, 03:14 PM IST)
China has left Iran alone, but Will Back Pakistan In War iran israel us war
चीन 'दोस्ती' और ‘हायरार्की’ के आधार पर रिश्ते बनाता है. (फाइल फोटो: आजतक)
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पश्चिमी एशिया में तनाव अपने चरम पर है. अमेरिका-इजरायल के साथ चल रही जंग के बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया है. भारत और चीन समेत पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ा है. कच्चे तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं. इन सबके बीच एक सवाल बीते कई दिनों से उठ रहा है कि बीजिंग ने जंग में दखलअंदाजी देने के बजाय तेहरान से इतनी दूरी क्यों बना रखी है? और अगर पाकिस्तान कभी किसी जंग में फंसा, तब भी क्या चीन यही रणनीति अपनाएगा? 

'यूके चाइना ट्रांसपेरेंसी' चैरिटी समूह के ट्रस्टी ‘हॉवर्ड झांग’ इस अंतर को स्पष्ट करते हैं. NDTV ने उनके हवाले से बताया

“स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप के बावजूद चीन ने अब तक ईरान से डिप्लोमैटिक हमदर्दी दिखाई है और संयम बरतने की अपील की है. इसके अलावा उसने मीडिया में बढ़ा-चढ़ाकर बात की है. उसने सिक्योरिटी गारंटी या सीधे मिलिट्री सपोर्ट जैसा दखल नहीं दिया है, जिससे चीन पूरी तरह से तेहरान के पाले में आ जाए.”

झांग बताते हैं कि यह अंतर ही असली कहानी है. चीन की पार्टनरशिप असली है, लेकिन पाकिस्तान के बराबर नहीं है. उन्होंने बताया कि चीन 'दोस्ती' और दोस्त की अहमियत के आधार पर रिश्ते बनाता है, न कि पश्चिमी देशों (जैसे NATO) की तरह ‘कानूनी सुरक्षा गारंटी’ के आधार पर. 

यही 'अलायंस' बनाम 'पार्टनरशिप' का फर्क है. पश्चिमी देशों का सिस्टम ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ की कानूनी गारंटी पर चलता है. जबकि चीन किसी देश को सुरक्षा की गारंटी नहीं देता. वह 'पार्टनरशिप' शब्द का इस्तेमाल करता है ताकि किसी युद्ध में फंसने की कानूनी मजबूरी न रहे. यह लचीला होता है और व्यापार पर केंद्रित होता है.

इसके अलावा, चीन अन्य देशों को बराबर के साथी के बजाय एक सीढ़ी पर देखता है. वह हर देश को उनकी अहमियत के हिसाब से एक 'लेबल' देता है. इस हायरार्की में, रूस सबसे आगे है, जबकि पाकिस्तान एक खास सिक्योरिटी टियर पर है. जैसा कि झांग लिखते हैं, 

"पाकिस्तान इतना उपयोगी, बहुत ज़्यादा जुड़ा हुआ और भौगोलिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि उसे केवल एक मित्र देश के रूप में नहीं माना जा सकता.”

ये भी पढ़ें: 'पूरा होर्मुज बंद कर देंगे अगर... ', ट्रंप के 48 घंटे के अल्टीमेटम पर ईरान का पलटवार

पाकिस्तान दशकों से मिलिट्री सहयोग और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के जरिए चीन के पश्चिमी हिस्से को सहारा देता है, जिससे बीजिंग को अरब सागर तक स्ट्रेटेजिक पहुंच मिलती है. इसके उलट, ईरान एक निचले स्तर पर आता है. झांग साफ-साफ कहते हैं, 

“ईरान चीन के लिए मायने रखता है. लेकिन इतना भी नहीं कि बहुत ज्यादा फ़र्क पड़े... बीजिंग ईरान को एक सप्लायर और एक काम के डिप्लोमैटिक पार्टनर के तौर पर ही पसंद करता है. वह ईरान को इतना भी अहमियत नहीं देता कि उसके लिए लड़े और किसी भी कीमत पर उसकी हिफाजत करे.”

यहां तक कि जब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद किया, तब भी बीजिंग ने अपनी प्रतिक्रिया को संयम बरतने की अपील तक ही सीमित रखा. जबकि इस रास्ते से होकर चीन के तेल आयात का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है.

वीडियो: मिडिल ईस्ट में जंग के बीच चीन ने चुपके से क्या कर दिया?

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