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छत्तीसगढ़ किन 2 वजहों से हारी बीजेपी?

कैसे कांग्रेस ने 15 साल से सत्ता में जमे रमन सिंह का सूपड़ा साफ कर दिया?

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11 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 11 दिसंबर 2018, 02:59 PM IST)
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2012 में रमन सिंह के शासनकाल के दौरान सीबीआई के अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था.
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छत्तीसगढ़. 15 साल से बीजेपी का अभेद दुर्ग. डॉक्टर साहब का गढ़. पर 11 दिसंबर 2018 को ये करिश्मा खत्म हो गया. जहां बीजेपी पिछले 3 बार से 50 सीटें नहीं पार कर सकी. कांग्रेस 65 पार कर गई. मजेदार यही आंकड़ा है. 65 प्लस का नारा बीजेपी ने दिया था, मगर इसे पाया कांग्रेस ने. अब हर जन के मन में एक ही सवाल है कि आखिर इतना बड़ा उलटफेर हुआ कैसे. चलिये सारा गुणा गणित आपको समझाते हैं.
क्यों हारी बीजेपी और क्या रहीं वजहें? 
1. मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के इल्जाम

डॉक्टर रमन सिंह के सांसद बेटे अभिषेक सिंह पर आरोप लगे कि उनका भी नाम पनामा पेपर्स की लिस्ट में शामिल है.
डॉक्टर रमन सिंह के सांसद बेटे अभिषेक सिंह पर आरोप लगे कि उनका भी नाम पनामा पेपर्स की लिस्ट में शामिल है.

तमाम बड़े मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. खुद सीएम रमन सिंह के बेटे का नाम पनामा पेपर्स लीक में आया. इसके अलावा अवैध खनन, खदानों की बंदरबांट और नक्सली इलाके में फंड बहाना मुद्दा बना. शहरी इलाकों में ये भ्रष्टाचार मुद्दा रहा. चावर वाले बाबा के नाम से मशहूर रमन सिंह की पीडीएस स्कीम में ही घोटाले ने इनके खिलाफ माहौल बनाया.
2. बीजेपी को भारी पड़ी वादा खिलाफी

रमन सिंह ने वादा किया था कि नक्सलवाद खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. चुनाव से ठीक पहले कई नक्सली हमले हुए.
रमन सिंह ने वादा किया था कि नक्सलवाद खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. चुनाव से ठीक पहले कई नक्सली हमले हुए.

बीजेपी ने धान किसानों से बोनस का वादा किया था. मगर पांच में से 3 साल ही दिया. 2 साल नहीं दिया. धान पर एमएसपी भी 1750 रहा. जबकि वादा 2100 का था. उसका भी फायदा सभी किसानों को नहीं मिला. सो ये वादाखिलाफी किसानों को नाराज कर गई. नक्सलवाद खत्म करने का वादा हर चुनाव में रहा, मगर वो भी पूरा नहीं हुआ.
कांग्रेस कैसे जीत गई चुनाव?
1. भूपेश बघेल के संगठन से

झीरम घाटी हमले में दर्जनभर कांग्रेसियों के मारे जाने के बाद संगठन की कमान भूपेश बघेल के हाथ में आ गई. वहीं अजीत जोगी पार्टी से बाहर चले गए.
झीरम घाटी हमले में दर्जनभर कांग्रेसियों के मारे जाने के बाद संगठन की कमान भूपेश बघेल के हाथ में आ गई. वहीं अजीत जोगी पार्टी से बाहर चले गए.

2013 विधानसभा चुनाव के समय झीरम घाटी के नक्सली हमले में कांग्रेस के फ्रंटलाइन के दर्जन भर नेता मारे गए. कांग्रेस 2013 का चुनाव हार गई. बाद में कांग्रेस के इकलौते बड़े नेता अजीत जोगी भी पार्टी से बाहर हो गए. अब संगठन को दोबारा खड़ा करने का काम किया दुर्ग की पाटन सीट के विधायक भूपेश बघेल ने. पूरे प्रदेश में दौरे किए. आंदोलन किए. कार्यकर्ताओं में जान फूंकी. रमन विरोधी माहौल बनाने में सफल रहे. नतीज़ा ये कि लोग कह रहे हैं कि इस बार छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का संगठन जीता है.
2 . टीएस सिंह देव का घोषणा पत्र

टीएस सिंहदेव के घोषणापत्र ने भी कांग्रेस की जीत में अहम रोल अदा किया.
टीएस सिंहदेव के घोषणापत्र ने भी कांग्रेस की जीत में अहम रोल अदा किया.

दूसरा बड़ा फैक्टर. कांग्रेस का घोषणा पत्र.  जिसने बनाया अंबिकापुर से विधायक टीएस सिंह देव ने. इसके लिए टीएस बाबा हजारों लोगों से मिले. किसानों, युवाओं से लेकर हर वर्ग के लिए योजनाएं शामिल कीं. नतीजा ये रहा कि पूरे चुनाव इस घोषणा पत्र की चर्चा रही.
3. अजीत जोगी का बाहर जाना

अजीत जोगी के कांग्रेस के बाहर जाने से बीजेपी को फायदा हुआ.
अजीत जोगी के कांग्रेस के बाहर जाने से बीजेपी को फायदा हुआ.

कांग्रेस को उतना फायदा किसी चीज से नहीं हुआ, जितना अजीत जोगी के जाने से हुआ. अजीत जोगी, CG में कांग्रेस के पहले मुख्यमंत्री. लेकिन बाद में चाहे 2008  हो या 2013 जोगी हर बार कांग्रेस का नुकसान करते दिखे हैं. उनके वर्चस्व ने दूसरे कांग्रेसी नेताओं और संगठन को कमजोर किया. छत्तीसगढ़ के पत्रकार ऐसे में मानते हैं कि जोगी का बाहर जाना कांग्रेस के संगठन को नई ताकत देने में मददगार रहा.
4.  कांग्रेस के लुभावने पोलिंग प्रॉमिस


किसानों के लिए किए गए वादे ने भी कांग्रेस की जीत में अहम भूमिका अदा की.

युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की बात हो या, सरकार बनने के 10 दिन के अंदर कर्ज माफी जैसी घोषणा. इन सबने कांग्रेस का काम बहुत आसान किया. इसे ऐसे समझिये कि जब कांग्रेस ने धान पर 2500 रुपये एमएसपी देने का वादा किया, तो कांग्रेस की सरकार आने के इंतज़ार में किसानों ने धान नहीं बेची.


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