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60 की उम्र में निशानेबाजी शुरू कर मेडल्स से घर पाट देने वाली 'शूटर दादी' चंद्रो तोमर नहीं रहीं

चंद्रो और उनकी शूटर देवरानी प्रकाशी पर फिल्म भी बनी थी- सांड की आंख.

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Chandro Tomar 89 साल की थीं. कुछ दिन पहले ही कोरोना वायरस की चपेट में आई थीं. (फोटो उनके ट्विटर हैंडल से साभार)
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मुरारी
30 अप्रैल 2021 (अपडेटेड: 30 अप्रैल 2021, 04:10 AM IST)
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'शूटर दादी' के नाम से मशहूर निशानेबाज चंद्रो तोमर का निधन हो गया. वे कोरोना वायरस से संक्रमित थीं. उत्तर प्रदेश के बागपत में रहने वालीं चंद्रो तोमर 89 साल की थीं. 26 अप्रैल को ट्विटर के जरिए उनके परिवार ने उनके बीमार होने की सूचना दी थी. परिवार की तरफ से ट्वीट किया गया था,
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राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनके अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की थी.
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दादी चंद्रो तोमर ने दो दशक पहले प्रोफेशनल शूटिंग में हिस्सा लेना शुरू किया था. प्रोफेशनल शूटिंग में उन्होंने कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं भी जीती थीं. उनके साथ उनकी देवरानी प्रकाशी तोमर भी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने जाती थीं. दोनों बहनों की जिंदगी पर फिल्म भी बनी है. फिल्म का नाम है- सांड की आंख. जब शूटर दादियों पर 'सांड की आंख' फिल्म आई थी तब हमारी साथी लालिमा ने उन पर डिटेल में आर्टिकल लिखा था. चंद्रो दादी तो चली गईं, लेकिन उनके किस्से आज भी हमारे साथ हैं. चलिए पढ़ते हैं उनकी कहानी. खेल-खेल में सीखी शूटिंग उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के जौहड़ी गांव में रहती थीं चंद्रो दादी. आप चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर के घर जाइए तो पूरा घर मेडल से पटा हुआ मिलेगा. अब से पांच साल पहले चंद्रो तोमर जब 84 साल की थीं, तो गांव की लड़कियों को शूटिंग सिखाती थीं. गांव वाले उन्हें 'शूटर दादी' कहकर बुलाते थे. शूटर दादी चंद्रो की पोती का नाम है शेफाली तोमर. जब शेफाली 11 साल की थीं, तब वो निशानेबाज़ी सीखने के लिए रेंज पर गईं. दादी चंद्रो भी शेफाली के साथ गईं. उस वक्त दादी 68 साल की थीं. शेफाली को रेंज पर गन देखकर डर लगा. शेफाली की हिम्मत बढ़ाने के लिए चंद्रो ने गन उठाई. और गोले पर निशाना लगा दिया, पहला निशाना ही सीधा जाकर 10 नंबर पर लगा. यानी एकदम बीचोंबीच लगा. एक इंटरव्यू में चंद्रो ने बताया था-
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ये सबकुछ, उस वक्त रेंज पर मौजूद कोच देख रहे थे. उन्होंने चंद्रो को दोबारा निशाना लगाने को कहा. चंद्रो का निशाना दूसरी बार भी सटीक रहा. दादी के शानदार निशानेबाज़ी देखने के बाद, वहां उस वक्त जो बच्चे मौजूद थे, वो कहने लगे, 'दादी खेल, दादी खेल.' पानी का जग घंटे भर थामकर प्रैक्टिस दादी चंद्रो हरियाणवी फैमिली से आती थीं. बड़ा परिवार था. उन्हें पता था कि उनकी फैमिली के मर्द उन्हें सपोर्ट नहीं करेंगे. रोक-टोक लगाई जाएगी. ये डर भी लगा कि अगर शूटिंग करना शुरू कर दी, तो समाज क्या कहेगा.गांव के लोग क्या कहेंगे. इसलिए शुरुआत में दादी चंद्रो ने छिपते-छिपाते रेंज पर जाना शुरू किया. गन भारी होती है, एक हाथ को सीधा रखकर गन पकड़ना होता है. इसके लिए हाथों में पावर होना चाहिए, बैलेंस होना चाहिए. हाथों की ताकत और बैलेंस बढ़ाने के लिए दादी ने एक जुगाड़ निकाला. घर पर सबकी नजरों से छिपते हुए दादी एक जग में पानी भर लेतीं, और फिर उसे सीधा पकड़कर करीब एक घंटे तक खड़ी रहतीं. ऐसा वो अधिकतर रात में सबके सोने के बाद करती थीं, ताकि किसी की नजर न पड़े.
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दादी अपनी बोली में कहती हैं, 'मुंह में राम, हाथ में काम... सुबई जाऊं, छर्रा मारूं, टेन में लगे.' फिर क्या दादी प्रैक्टिस करती रहीं, कॉम्पिटिशन्स में भी पार्ट लेने लगीं. पहले कॉम्पिटिशन में दादी ने जीता सिल्वर मेडल. अखबार में तस्वीरें छपीं. घरवाले देख न सकें, इसलिए दादी ने अखबार ही छिपा लिया. लेकिन बाद में हिम्मत करके दादी ने अखबार दिखा दिया. और फिर शूटर दादी का वो बेहद प्यारा सा भेद उनके परिवार के सामने खुल गया, गांव के सामने खुल गया. शुरू में लोगों ने ताने कसे. गांववाले कहते, 'पोता-पोती खिलाने की उम्र में ये क्या कर रही हो.... आर्मी में जाने का इरादा है क्या...' लेकिन लोगों के तानों से दादी चंद्रो रुकी नहीं. इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया और अपना काम करती रहीं. धीरे-धीरे परिवार वाले भी इस सच्चाई के साथ सहज हो गए, कि चंद्रो शूटर दादी हैं. फिर हुई देवरानी प्रकाशी की एंट्री प्रकाशी, दादी चंद्रो की देवरानी हैं. ये भी शूटर हैं. कमाल की शूटर हैं. जेठानी को शूटिंग करता देख, इन्हें भी प्रेरणा मिली. ये भी रेंज पर जाने लगीं, निशानेबाज़ी करने. जग वाला फंडा दादी प्रकाशी ने भी अपनाया. बैलेंस बनाने के लिए रात में टाइम निकालकर जग पकड़कर खड़ी हो जातीं. प्रकाशी कहती हैं, 'लगन और हिम्मत के आगे, उम्र कोई चीज ही नहीं है. लगन, हिम्मत इतनी करी कि बुढ़ापा चला गया और जवानी आ गई.' वहीं शूटर दादी चंद्रो कहतीं, 'शरीर बूढ़ा होता है, मन नहीं.' शूटर दादियों ने कई सारे कॉम्पिटिशन्स में हिस्सा लेकर ढेर सारे मेडल जीते हैं. जौहड़ी गांव में लड़कियों को वो निशानेबाजी भी सिखाती थीं.
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हमारी साथी लालिमा ने शूटर दादी चंद्रो के एक करीबी रिश्तेदार से भी बात की थी. उन्होंने बताया था कि निशानेबाज़ी करने के पीछे दादी का मकसद, पुरुष प्रधान समाज में लड़कियों को बराबरी का हक दिलाना था. वो चाहती थीं कि लड़कियां भी आगे बढ़ें. वो चाहती थीं कि गांव की लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हो जाएं. सिर उठाकर जीना सीखें. अपने ट्विटर हैंडल के जरिए शूटर दादी अलग-अलग मुद्दों पर विचार भी रखती थीं. बीते दिनों उन्होंने मोदी सरकार से अपील की थी कि बॉर्डर पर बैठे किसानों की बात सुनी जाए और उनके मान-सम्मान की रक्षा की जाए. चंद्रो दादी के जाने के बाद बहुत से फिल्मी सितारों और हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है. हम भी उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दे रहे हैं.

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