केंद्र सरकार ने देशद्रोह कानून का किया बचाव, सुप्रीम कोर्ट में दी ये दलीलें
केंद्र सरकार ने कहा कोर्ट में बताया कि देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में देशद्रोह कानून (Sedition Law) का बचाव किया है. सरकार ने कहा कि कानून की समीक्षा करने की जरूरत नहीं है. कोर्ट में देशद्रोह कानून की वैधता पर सुनवाई चल रही है. सरकार ने कोर्ट को एक लिखित जवाब में केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य केस का जिक्र किया. सरकार के मुताबिक वो फैसला पांच जजों की बेंच ने दिया जिसके तहत देशद्रोह का कानून सही और बाध्यकारी है. साथ ही केंद्र ने शीर्ष अदालत से ये भी अपील की है कि देशद्रोह कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं को रद्द कर दिया जाए.
देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिका एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा समेत पांच पक्षों की तरफ से दायर की गई थी. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आज के दौर में औपनिवेशिक काल के इस कानून की जरूरत नहीं है. इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच कर रही है. इस बेंच में जस्टिस सूर्यकांत और हिमा कोहली भी शामिल हैं. मामले में अगली सुनवाई मंगलवार, 10 मई को होगी.
सरकार ने क्या कहा?इंडिया टुडे से जुड़े संजय शर्मा से मिली जानकारी के मुताबिक, सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लिखित दलीलें दाखिल की हैं. सरकार का कहना है कि
"सिर्फ देशद्रोह कानून के दुरुपयोग की घटनाएं ही कोर्ट के लिए पिछले फैसले पर पुनर्विचार के लिए काफी नहीं है. कानून के गलत इस्तेमाल पर पहले ही संविधान पीठ समानता के अधिकार और जीने के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों के संदर्भ में धारा-124 A के सभी पहलुओं की जांच कर चुकी है. तीन जजों की बेंच देशद्रोह कानून की वैधता की जांच नहीं कर सकती है. अगर फिर भी तीन जजों की बेंच इन दलीलों से संतुष्ट नहीं है तो वो इसे बड़ी बेंच के पास सुनवाई के लिए सिफारिश कर सकती है."
केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा कि केदारनाथ सिंह केस में फैसला अच्छी तरह से विश्लेषण के बाद दिया गया था. इसकी पुष्टि बाद में दिए गए कई फैसलों में भी हुई. सरकार ने कहा कि इस वजह से चौतरफा असर वाले इस अच्छे कानून पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है. अगली सुनवाई से पहले सोमवार तक केंद्र बाकी पक्षकारों की लिखित दलीलों पर भी अपना जवाब कोर्ट को उपलब्ध करवाएगी.
सुप्रीम कोर्ट ने भी उठाया था सवालसुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 9 मई तक जवाब दाखिल करने का समय दिया था. कोर्ट ने कहा था कि सुनवाई को अब और स्थगित नहीं किया जा सकता है. बता दें कि, आईपीसी की धारा-124(A) देशद्रोह के मामले दर्ज होते हैं. इसके मुताबिक कोई व्यक्ति अगर भारत के कानून के तहत गठित सरकार के खिलाफ लिखित या मौखिक शब्द, चिह्नों, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नफरत फैलाता या फैलाने की कोशिश करता है तो उसे इसके तहत सजा दी सकती है.
पिछले साल इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये औपनिवेशिक कानून है, आज़ादी के आंदोलन को दबाने के लिए बनाया गया था. कोर्ट ने कहा था कि ये वही कानून है जो महात्मा गांधी को चुप कराने के लिए इस्तेमाल हुआ था. सीजेआई ने सरकार से पूछा था कि क्या आजादी के 75 साल बाद अब भी ऐसे कानून की जरूरत है.

