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'पत्नी को मुफ्तखोर कहना..', दिल्ली HC का ये फैसला हर पति को जानना चाहिए

केस से एक बात और निकली. अगर एक व्यक्ति अपनी पत्नी के अलावा किसी दूसरी महिला के साथ रहता है, उसके साथ बच्चे पैदा करता है, तो इसे घरेलू हिंसा माना जाएगा.

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24 सितंबर 2024 (अपडेटेड: 24 सितंबर 2024, 11:31 PM IST)
delhi high court
भरण-पोषण देने के लिए पत्नी को पैरासाइट कहना पूरी महिला जात का अपमान: दिल्ली हाई कोर्ट. (सांकेतिक AI फ़ोटो)
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शादीशुदा संबंधों पर दिल्ली हाई कोर्ट के एक हालिया फ़ैसले से दो बातें निकल कर आई हैं. पहली, अगर एक व्यक्ति अपनी पत्नी के अलावा किसी दूसरी महिला के साथ रहता है, उसके साथ बच्चे पैदा करता है, तो पत्नी घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत घरेलू हिंसा का शिकार मानी जाएगी. दूसरी बात, अगर महिला अपने गुज़ारे के लिए कमाने में सक्षम है, तो इसका मतलब ये नहीं कि पति उसके भरण-पोषण के लिए पैसे देने से मुक्त है, और उसे 'Parasite' कहना केवल उसका नहीं, महिला जाति का अपमान है.

पैरासाइट का मतलब हिंदी में परजीवी होता है. ऐसा जीव जो अपने जीवन, पोषण के लिए दूसरे पर निर्भर रहता है. लेकिन इस मामले के कॉन्टेक्स्ट में ‘पैरासाइट’ का मतलब 'मुफ्तखोर' से है.

अब केस जान लेते हैं

साल 1998 में दोनों की शादी हुई थी. पत्नी का आरोप है कि पति उसे मानसिक, मौखिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था. इसके अलावा कुछ सालों बाद - 2010 में - वो एक महिला को घर ले लाया. कथित तौर पर इस महिला के साथ उसका विवाहेतर संबंध था. उस महिला को अपने माता-पिता से मिलवाया और कहीं और रहने लगा.

महिला की शिकायत के मुताबिक़, उसके ससुराल वालों ने उसे धमकाया था कि अगर वो पति के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करेगी, तो वो उसे और उसके बच्चों को वित्तीय सहायता देना बंद कर देगा. आरोप ये भी लगे कि पति ने दूसरी महिला से शादी कर ली और उससे एक बेटी भी हुई.

मामला कोर्ट पहुंचा. निचली अदालत ने पत्नी के पक्ष में फ़ैसला सुनाया. पत्नी को गुज़ारा भत्ता देने के निर्देश दिए. हर महीने 30,000 रुपये और उसे मानसिक यातना, अवसाद जैसी चोट के लिए 5 लाख रुपये हर्ज़ाना. इसके साथ ही कोर्ट ने 3 लाख रुपये मुआवज़े और मुक़दमे का ख़र्च भी देने के लिए कहा.

ये भी पढ़ें - पत्नी को भरण पोषण के 55 हजार देने थे, 7 बोरों में सिक्के भरकर लाया शख्स, कोर्ट ने सबक सिखाया

पति ने निचली अदालत के निर्देश को चुनौती दे दी. ये कहते हुए कि उसकी पत्नी एक सक्षम महिला है. उसने एक बुटीक में काम किया है और इसीलिए सिर्फ़ क़ानून की आड़ में उसे ‘परजीवी’ (parasite) बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती. इसके बाद केस दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा. 

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने भी महिला के पक्ष में ही फ़ैसला सुनाया. ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखा और कहा कि पत्नी का कमाना उसके ख़िलाफ़ नहीं जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा,

“बस इसलिए कि प्रतिवादी (पत्नी) सक्षम है और अपने गुज़ारे-भर कमा सकती है, इससे पति को अपनी पत्नी और बच्चों को भरण-पोषण न देने की छूट नहीं मिलती. भारतीय महिलाएं परिवार की देखभाल करने, अपने बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करने, अपने पति और अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ देती हैं… ये कहना कि पत्नी केवल एक परजीवी है और क़ानून का दुरुपयोग कर रही है, ये न केवल उसके लिए, बल्कि पूरी महिला जाति का अपमान है.”

अदालत ने आदेश में ये भी माना कि पत्नी घरेलू हिंसा से पीड़ित थी. अदालत ने साफ़ किया कि 'घरेलू हिंसा' शब्द में शारीरिक दुर्व्यवहार, यौन दुर्व्यवहार, मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार और आर्थिक दुर्व्यवहार शामिल हैं.

वीडियो: आसान भाषा में: मुस्लिम महिला ने गुज़ारा भत्ता मांगा, Supreme Court में क्या बहस हुई?

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