केशव प्रसाद को बनाया राम, मायावती को शूर्पणखा, BJP वालों कुछ करोगे नहीं?
इलाहाबाद वालों को नई रामायण जानने का मौक़ा मिला. देखना है इस बार कितनी भावनाएं आहत होती हैं.
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फोटो - thelallantop
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उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं तो जो न होना हो, वो हो जाए. गिरिये तो ऐसा कि किसी को कुछ भी बक जाइए. नए किस्म का 'परिवारवाद' भी नजर आता है. जहां अपनी पॉलिटिक्स में दूसरे की फैमिली को घसीट लीजिए.
नया उछिन्न हुआ है इलाहाबाद में. सिविल लाइन में रहने वालों ने नया ज्ञान पाया. अनुराग शुक्ल कोई वरिष्ठ छात्र नेता हो पड़े हैं. उनने नई रामायण लिख डाली. पोस्टर चिपकाए.
जिन लोगों की राक्षसों से तुलना की गई. उनकी तस्वीरों पर बाकायदा सींगें उगा दी गईं. जिनकी तुलना भगवानों से हुई. उन्हें बाकायदा अस्त्र-शस्त्र पकड़ा दिए गए. मुकुट और तरकश में तीर भी भर दिए गए. बसपा सुप्रीमो मायावती की नाक भी कटी हुई दिखाई गई है. ये तय मानिए कि दयाशंकर वाले एपिसोड के बाद भी इन लोगों ने कुछ सीखा नहीं है.
अब सवाल ये कि भजन के अलावा कहीं भगवान का नाम भी आए, तो ऑफेंड हो पड़ने वाली बीजेपी, इन पोस्टर्स पर बुरा मानेगी या नहीं. एक बात साफ़ है जिस किसी ने भी ये पोस्टर लगाए हैं. वो बसपा वालों को कोसकर बीजेपी वालों की गुडबुक में आना ही चाहता है.
भाजपा कुछ रोज पहले एक कार्टून पर भड़क गई थी. जेएनयू के टाइम पर अरविंद केजरीवाल ने हनुमान जी वाला एक कार्टून शेयर किया था. महाराजगंज में तो किसी ने केस ही दर्ज करा दिया था. ऐसा ही धोनी के साथ हुआ था. उन्हें एक मैगजीन ने हाथ में प्रोडक्ट्स पकड़े दिखाया और बेंगलुरु में उन पर केस हो गया. जेल भेजने की बातें चलने लगी थीं.
तो अब तमाम वो लोग और खुद बीजेपी वाले आगे आकर ये पोस्टर लगाने वालों का विरोध करेंगे? इन पर मुकदमा करेंगे? ये जानते हुए कि ये उनके फेवर से ही बोलने और उनके विरोधियों पर निशाना साधने की कोशिश कर रहे हैं. पर भगवान का अपमान तो हुआ न? या ये मान लेंगे कि केशव प्रसाद मौर्या ही उनके राम हैं. या हम बेवजह खर्च हो रहे हैं. ज्यादा धर्म जानने वाले पॉलिटिकल लोगों के हिसाब से कुछ गलत हुआ ही नहीं है.
इन पोस्टर्स के हिसाब से नसीमुद्दीन रावण हैं. मारीच सतीशचंद्र मिश्रा हैं. स्वामीप्रसाद मौर्या विभीषण हैं. और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की गद्दी को केशव प्रसाद मौर्या ने टेकओवर कर लिया है. हे राम! दयाशंकर सिंह लक्ष्मण हो पड़े हैं. बसपा की नेता मायावती को शूर्पणखा बताया गया. और स्वाति सिंह दुर्गा हो गईं. तुर्रा ये कि बेटी के सम्मान में समाज मैदान में उतरा है.
जिन लोगों की राक्षसों से तुलना की गई. उनकी तस्वीरों पर बाकायदा सींगें उगा दी गईं. जिनकी तुलना भगवानों से हुई. उन्हें बाकायदा अस्त्र-शस्त्र पकड़ा दिए गए. मुकुट और तरकश में तीर भी भर दिए गए. बसपा सुप्रीमो मायावती की नाक भी कटी हुई दिखाई गई है. ये तय मानिए कि दयाशंकर वाले एपिसोड के बाद भी इन लोगों ने कुछ सीखा नहीं है.
अब सवाल ये कि भजन के अलावा कहीं भगवान का नाम भी आए, तो ऑफेंड हो पड़ने वाली बीजेपी, इन पोस्टर्स पर बुरा मानेगी या नहीं. एक बात साफ़ है जिस किसी ने भी ये पोस्टर लगाए हैं. वो बसपा वालों को कोसकर बीजेपी वालों की गुडबुक में आना ही चाहता है.
भाजपा कुछ रोज पहले एक कार्टून पर भड़क गई थी. जेएनयू के टाइम पर अरविंद केजरीवाल ने हनुमान जी वाला एक कार्टून शेयर किया था. महाराजगंज में तो किसी ने केस ही दर्ज करा दिया था. ऐसा ही धोनी के साथ हुआ था. उन्हें एक मैगजीन ने हाथ में प्रोडक्ट्स पकड़े दिखाया और बेंगलुरु में उन पर केस हो गया. जेल भेजने की बातें चलने लगी थीं.
तो अब तमाम वो लोग और खुद बीजेपी वाले आगे आकर ये पोस्टर लगाने वालों का विरोध करेंगे? इन पर मुकदमा करेंगे? ये जानते हुए कि ये उनके फेवर से ही बोलने और उनके विरोधियों पर निशाना साधने की कोशिश कर रहे हैं. पर भगवान का अपमान तो हुआ न? या ये मान लेंगे कि केशव प्रसाद मौर्या ही उनके राम हैं. या हम बेवजह खर्च हो रहे हैं. ज्यादा धर्म जानने वाले पॉलिटिकल लोगों के हिसाब से कुछ गलत हुआ ही नहीं है.
