मैटर्निटी लीव तो सुना था, पर पीरियड्स लीव?
ब्रिटेन की ये कंपनी देती है औरतों को पीरियड्स में छुट्टी.
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फोटो - thelallantop
ब्रिटेन की एक कंपनी है कोएग्जिस्ट. इसने महिलाओं के पीरियड्स में होने वाली परेशानियों से उन्हें निजात दिलाने के लिए एक बढ़िया फॉर्मूला अपनाया है. नाम है 'पीरियड्स पॉलिसी'. और पॉलिसी ऐसी जिसे लल्लन की राय में ब्रिटेन में ही नहीं बल्कि भारत सहित दुनिया भर के सभी देशों में लागू किया जाना चाहिए.
कंपनी की डायरेक्टर है बेक्स बैक्सटर जो खुद एक औरत है. कंपनी में कुल 24 कर्मचारी हैं. उनमे से 17 महिलाएं हैं. जाहिर सी बात है पीरियड्स में होने वाली तकलीफों से हमेशा कोई न कोई एम्पलॉयी परेशान रहती होगी. इसलिए कंपनी ने तय किया कि पीरियड के दिनों में अपनी महिला कर्मचारियों को छुट्टी देगी.
कंपनी का कहना है कि पीरियड्स के दौरान छुट्टी देने से कंपनी की प्रोडक्टिविटी घटेगी नहीं बल्कि बढ़ेगी. कंपनी पीरियड्स से जुड़ी नकारात्मकता को खत्म करना चाहती है. कोएग्जिस्ट की डायरेक्टर बेक्स बाक्सटर कहती हैं:
"एक स्टाफ मैनेजर के तौर पर मैंने महिलाओं को उनके पीरियड्स के दौरान परेशानियां झेलते देखा है. वे ज्यादा समय लेने के लिए खुद को दोषी समझती हैं और शर्मिंदा होती हैं. वे इसे जाहिर नहीं होने देना चाहती और खामोशी से अपने डेस्क पर बैठी रहती हैं. इसकी शुरुआत वहां से हुई और हमने सोचा कि हम इस आखिरी टैबू को खत्म करने के लिए क्या कर सकते हैं."[...]"अधिकतर कंपनियों में पुरुष कर्मचारियों की संख्या महिलाओं से ज्यादा होती है. वो ज्यादा घंटे तक काम करने को बढ़ावा देते हैं. लेकिन यह मानना गलत है कि ब्रेक लेने से बिजनेस की उत्पादकता घटती है. यह कर्मचारियों के ज्यादा समय लेने की बात नहीं है. बल्कि पीरियड्स के दौरान ज्यादा लचीलेपन और कैपेसिटी के साथ काम करने का मामला है. पीरियड्स के वक्त महिलाएं ऐसी स्थिति में होती हैं. इस वक्त उन्हें अपने शरीर का लालन-पालन छोटे बच्चे की तरह करना होता है. पीरियड्स के तुरंत बाद महिलाएं तीन गुना ज्यादा स्पीड से काम करती हैं."बेक्सटर ने भरोसा जताया कि उनकी कंपनी महिला कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के साथ-साथ दूसरी कंपनियों को भी ऐसी ही पॉलिसी लागू करने के लिए इंस्पायर करेगी. पीरियड लीव का कॉन्सेप्ट नाइकी कंपनी ने 2007 में दुनिया भर को दिया. इस पालिसी को ब्रिटेन में लागू करने वाली पहली कंपनी कोएग्जिस्ट है. हमें लगता है कि पीरियड लीव का कॉसेप्ट एक दम लल्लनटॉप है. इंडिया को इससे सीख लेनी चाहिए. क्योंकि यहां आज भी महिलाओं के पीरियड्स से जुड़े कई टैबू हैं. औरतें तकलीफ में होती हैं, पर शर्म और इससे जुड़े भेदभाव के चलते अपने बॉस या पुरुष कर्मचारियों से कुछ कह नहीं पातीं. ऐसी पॉलिसी न सिर्फ कंपनी की प्रोडक्टिविटी और माहौल के लिए अच्छी है, बल्कि ह्यूमन राइट्स की तरफ एक सकारात्मक कदम है.

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