यहां स्याला इंसानों में प्यार नहीं टिकता, वहां देखो जानवर एहसान चुका रहे हैं. एकठो पेंगुइन है. अपने यहां तो होती नहीं, पर टीवी पर तो देखी होगी आपने. तो ये जोपेंगुइन है, वो हर साल 8050 किलोमीटर तैरकर एक शख्स से मिलने आता है. क्यों भला?क्योंकि 5 साल पहले उस आदमी ने पेंगुइन की जान बचाई थी.यकीन आप मानोगे नहीं. पर हमारे गांव में एक भग्गल काका थे. उन्होंने एक घायल चिरैयाकी खूब सेवा की थी और फिर उसे उड़ा दिया था. बाद में वो चिरैया दिन में एक बारभग्गल काका की मढ़ैया पर जरूर आती थी. काका भैंसों को कोयर डालते, अरहर पछोरते,पैरा छांटते. वो खपरैल पर बैठी कुछ कुछ बोलती रहती. काका कहते थे कि गाती है.अल्हरा नाम धरा दिया था. काम से निपट के काका सुस्ताने के लिए खटिया पकड़ते तो वोउड़कर कंधे पर बैठ जाती. काका कुछ देर अल्हरा से आंय बांय बोलते. फिर उसेखिलवा-पिलवाकर रवाना कर देते.तो ऐसा होता है भाई. दोस्ती हो जाती है. जो ताजा घटना है वो ब्राजील के रियोडिजेनेरियो की है. यहां 71 साल के जोआओ परेरा डिसूजा रहते हैं. पेशे से मछुआरे हैं.2011 में उन्हें समंदर किनारे पत्थरों के बीच एक साउथ अमेरिकन मैजेलैनिक पेंगुइनमिला. बहुत खराब हालत में था. तेल में डूबा हुआ, मरने की कगार पर.Picture: TV Globeजोआओ ने उसके पंख पर जमा तेल साफ किया. रोज खाना खिलाया, ताकि शरीर को ताकत मिले.उसका नाम डिनडिम रखा. एक्कै हफ्ते में डिनडिम फिट एंड फाइन हो गया. तंदरुस्त एकदम,कहो तो कुश्ती लड़ जाए. तब जोआओ ने उसे समुद्र में छोड़ दिया. घर जाने के लिए. परडिनडिम बाय गॉड टच हो गया था जोआओ की सेवा से. वो गया ही नहीं. पूरे 11 महीने रहाजोआओ के साथ. फिर नए पंख आए तो फुर्र हो गया.जोआओ की कुटिया अब डिनडिम का घर बन चुकी है. वो हर साल पूरे 8050 किलोमीटर तैरकरजून में जोआओ के पास आता है और फरवरी में विदा लेता है. ये सिलसिला पिछले 5 साल सेचल रहा है. बाकी के महीनों में वह अर्जेंटीना और चिली में चिल करता है. जैसे आपदिल्ली में नौकरी करते हैं और कुछ महीनों के लिए अपने घर हरदोई निकल जाते हैं.Picture: TV Globeजोआओ भी डिनडिम के इश्क में है. अपनी गोदी में सुलाते हैं, नहाते हैं, खाना खिलातेहैं और खेलते हैं. जोआओ के अलावा और डिनडिम को छू ले तो भाई औक्खा हो जाता है.दोनों की दोस्ती और प्यार एकदम लल्लन टॉप है.https://www.youtube.com/watch?v=6McB0jhPWqs