सुशांत सिंह राजपूत केस में मीडिया कवरेज को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने तीखी बात कही है
दो चैनलों की कवरेज पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है.
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सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को अपने बांद्रा स्थित फ्लैट में पंखे से लटके पाए गए थे. 1 साल बाद उनकी मौत की जांच किस मुकाम तक पहुंची. आइए जानें.(पीटीआई)
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सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर हुई मीडिया कवरेज को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है. सोमवार को इस मामले पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि सुशांत केस में रिपब्लिक टेलीविज़न और टाइम्स नाऊ की कुछ रिपोर्ट 'तिरस्कारपूर्ण' थीं. दोनों चैनल्स ने एक 'शातिर अभियान' चलाया और खुद ही जांचकर्ता, प्रोसीक्यूटर और जज की भूमिकाएं निभाईं.
चीफ जस्टिस दीपांकर दत्त और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की बेंच ने कहा कि मीडिया को रिपोर्टिंग के दौरान संयम बरतना चाहिए. इस मामले की मीडिया कवरेज को लेकर पूर्व पुलिस अधिकारियों, एक्टिविस्ट्स, वकीलों और कई एनजीओ ने याचिकाएं दाखिल की थीं. कोर्ट ने कहा कि मीडिया ट्रायल कोर्ट के कामकाज में हस्तक्षेप करता है और इसलिए इसे 'कोर्ट की अवमानना' माना जाता है.
251 पन्नों के अपने फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, 'मीडिया को जनता के हित के लिए खबरों को दिखाना चाहिए, अपेक्षाकृत कि जनता की उसे जानने में रुचि है.' कोर्ट ने कहा कि कोई रिपोर्ट, चर्चा, बहस या इंटरव्यू ऐसा नहीं होना चाहिए जो अभियुक्त के हितों या फिर गवाह के हितों को नुकसान पहुंचा सकता हो.

सुशांत की मौत के बाद से ही पूरे मामले को लेकर लगातार मीडिया में चर्चा बनी हुई है. (तस्वीर: इंडिया टुडे)
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि दो मीडिया चैनल की कुछ खबरें 'मानहानिकारक' थीं. इस तरह के मामलों में प्रेस को चर्चा से बचना चाहिए और केवल सूचनात्मक रिपोर्ट देने तक ही सीमित रहना चाहिए. यही जनहित में है. हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि उसने चैनलों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया है. लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि 'खबरें पत्रकारिता के मानकों और नैतिकता संबंधी नियमों के अनुरूप होनी चाहिए अन्यथा मीडिया घरानों को मानहानि की कार्रवाई का सामना भी करना होगा.'
चीफ जस्टिस दीपांकर दत्त और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की बेंच ने कहा कि मीडिया ट्रायल आपराधिक मामले की पुलिस द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप करता है और साथ ही टीवी एक्ट के तहत बनाए गए प्रोग्राम कोड के खिलाफ भी काम करता है. कोर्ट ने कहा कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दिशानिर्देशों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी लागू किया जाएगा, तब तक कि नए दिशानिर्देश बनकर तैयार नहीं हो जाते.
कोर्ट ने कहा कि आरोपियों की तस्वीर नहीं छापी जानी चाहिए, साथ ही पुलिस को दिया गया बयान आरोपी के बयान के रूप में नहीं चलाया जाना चाहिए. इसके अलावा कोर्ट का ये भी कहना है कि खुदकुशी के केस में परिवार का इंटरव्यू नहीं किया जाना चाहिए और ना ही आत्महत्या के मामले में मृतक को कमजोर चरित्र का नहीं बताया जाना चाहिए. कोर्ट का सुझाव है कि आरोपी और पीड़ित के खिलाफ पूर्वाग्रह का वातावरण बनाने वाली खबरें नहीं की जानी चाहिए. जैसे कि पीड़ित, गवाहों, उनके परिवार के सदस्यों का इंटरव्यू लेना और उन्हें टीवी पर दिखाना.
कोर्ट ने कहा कि मुंबई पुलिस और अन्य एजेंसियां एक अधिकारी को नियुक्त कर सकती हैं जो मीडिया और जांचकर्ताओं के बीच लिंक के रूप में काम करेंगे और इस तरह के सेंसिटिव केसों में मीडिया को ब्रीफ करेंगे.
चीफ जस्टिस दीपांकर दत्त और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की बेंच ने कहा कि मीडिया को रिपोर्टिंग के दौरान संयम बरतना चाहिए. इस मामले की मीडिया कवरेज को लेकर पूर्व पुलिस अधिकारियों, एक्टिविस्ट्स, वकीलों और कई एनजीओ ने याचिकाएं दाखिल की थीं. कोर्ट ने कहा कि मीडिया ट्रायल कोर्ट के कामकाज में हस्तक्षेप करता है और इसलिए इसे 'कोर्ट की अवमानना' माना जाता है.
251 पन्नों के अपने फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, 'मीडिया को जनता के हित के लिए खबरों को दिखाना चाहिए, अपेक्षाकृत कि जनता की उसे जानने में रुचि है.' कोर्ट ने कहा कि कोई रिपोर्ट, चर्चा, बहस या इंटरव्यू ऐसा नहीं होना चाहिए जो अभियुक्त के हितों या फिर गवाह के हितों को नुकसान पहुंचा सकता हो.

सुशांत की मौत के बाद से ही पूरे मामले को लेकर लगातार मीडिया में चर्चा बनी हुई है. (तस्वीर: इंडिया टुडे)
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि दो मीडिया चैनल की कुछ खबरें 'मानहानिकारक' थीं. इस तरह के मामलों में प्रेस को चर्चा से बचना चाहिए और केवल सूचनात्मक रिपोर्ट देने तक ही सीमित रहना चाहिए. यही जनहित में है. हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि उसने चैनलों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया है. लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि 'खबरें पत्रकारिता के मानकों और नैतिकता संबंधी नियमों के अनुरूप होनी चाहिए अन्यथा मीडिया घरानों को मानहानि की कार्रवाई का सामना भी करना होगा.'
चीफ जस्टिस दीपांकर दत्त और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की बेंच ने कहा कि मीडिया ट्रायल आपराधिक मामले की पुलिस द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप करता है और साथ ही टीवी एक्ट के तहत बनाए गए प्रोग्राम कोड के खिलाफ भी काम करता है. कोर्ट ने कहा कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दिशानिर्देशों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी लागू किया जाएगा, तब तक कि नए दिशानिर्देश बनकर तैयार नहीं हो जाते.
कोर्ट ने कहा कि आरोपियों की तस्वीर नहीं छापी जानी चाहिए, साथ ही पुलिस को दिया गया बयान आरोपी के बयान के रूप में नहीं चलाया जाना चाहिए. इसके अलावा कोर्ट का ये भी कहना है कि खुदकुशी के केस में परिवार का इंटरव्यू नहीं किया जाना चाहिए और ना ही आत्महत्या के मामले में मृतक को कमजोर चरित्र का नहीं बताया जाना चाहिए. कोर्ट का सुझाव है कि आरोपी और पीड़ित के खिलाफ पूर्वाग्रह का वातावरण बनाने वाली खबरें नहीं की जानी चाहिए. जैसे कि पीड़ित, गवाहों, उनके परिवार के सदस्यों का इंटरव्यू लेना और उन्हें टीवी पर दिखाना.
कोर्ट ने कहा कि मुंबई पुलिस और अन्य एजेंसियां एक अधिकारी को नियुक्त कर सकती हैं जो मीडिया और जांचकर्ताओं के बीच लिंक के रूप में काम करेंगे और इस तरह के सेंसिटिव केसों में मीडिया को ब्रीफ करेंगे.

