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भ्रष्टाचार के मामले में दोषी करार सरकारी अधिकारी को मौत के 20 साल बाद मिला न्याय

यह केस बताता है कि क्यों भारत की न्यायिक व्यवस्था पर अक्सर सवाल उठते हैं

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25 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 25 जनवरी 2021, 09:59 AM IST)
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने फैसला सुनाया है. (हाईकोर्ट की फाइल फोटो)
बॉम्बे हाईकोर्ट की फाइल फोटो
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भारत की पुलिस और न्यायिक व्यवस्था ऐसी है कि आमतौर पर लोग इनसे मदद लेने में परहेज करते हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट से जुड़ा एक मामला इसका उदाहरण है. खबर के मुताबिक, यहां एक व्यक्ति को मौत के 20 सालों बाद न्याय मिला है. यह कहानी है सुरेश कागने की. वे एक सेल्स टैक्स अधिकारी थे. 25 साल पहले उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था. केस को चलते हुए पांच साल हुए थे कि सुरेश कागने की मौत हो गई. उसके बाद अगले 20 सालों तक तारीखें पड़ती रहीं. अब जाकर सुरेश कागने को आरोपों से मुक्त किया गया है. उन्हें जीते जी न्याय नहीं मिला. दो दशक बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुरेश की विधवा पत्नी और उनके बेटे को राहत दी है. सुरेश कागने को निर्दोष करार देकर. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जब सुरेश कागने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उस समय वे बिक्री कर विभाग में अधिकारी के पद पर कार्यरत थे. 1985 में उन पर भ्रष्टाचार और हेराफेरी का आरोप लगा था. मामला सेल्स टैक्स की रीफंडिंग के झूठे दावे से जुड़ा था. कागने पर आरोप था कि उन्होंने तय मानकों व प्रक्रिया का पालन किए बिने उन क्लेम्स को स्वीकार कर लिया था. रिपोर्ट के मुताबिक, इससे सरकारी खजाने को 2.60 लाख रुपये का नुकसान होने की बात कही गई थी. इन आरोपों को सही मानते हुए कोर्ट ने कागने को 18 महीने की जेल और 26 हजार रुपये का जुर्माना भरने की सजा सुनाई थी. सितंबर 1996 में सोलापुर की स्पेशल ट्रायल कोर्ट ने कागने के साथ दो अन्य अधिकारियों को भी दोषी माना था. बाद में इसके खिलाफ अपील की गई. इसी अपील को आधार बनाते हुए साल 2015 में कागने की पत्नी और बेटे ने केस लड़ने का फैसला किया. दरअसल, 1996 में सोलापुर की स्पेशल ट्रायल कोर्ट ने एक तेल मिल मालिक के बेटे की गवाही के आधार पर ये सजा सुनाई थी. इस मामले में तेल मिल का मालिक और उसका बेटा भी आरोपी थे. अभियोजन पक्ष के 94 में से 92 गवाहों की गवाही के बाद तेल मिल मालिक और उसके बेटे को बरी कर दिया गया था. अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि उस समय मामले की लीपापोती की गई थी. केस की फिर से हुई सुनवाई में कोर्ट ने सबूतों और गवाहों के बयानों को भरोसेमंद नहीं माना. हालांकि इसमें बहुत ज्यादा देर हो चुकी थी. इससे पहले साल 2013 में हाई कोर्ट ने कागने के साथ आरोपी बने दोनों अधिकारियों को बरी कर दिया था. इन दोनों ने अलग-अलग अपील दायर की थीं. तब कोर्ट ने कहा था, "सरकारी गवाह को भरोसे के काबिल होना चाहिए. ट्रायल का उद्देश्य सच की तलाश करना होता है और अभियोजन का केस इसी पर टिका होता है. इस मामले में अभियोजन पूरी तरह विफल रहा है."

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