क्या भाजपा समर्थकों के पास केजरीवाल की आलोचना के नाम पर बस खांसी का मजाक उड़ाना बचा है?
एक प्रोग्राम में भाजपा समर्थक अरविंद केजरीवाल के बोलने पर खांसने लगे, गडकरी ने उन्हें चुप कराया...
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अरविंद केजरीवाल को सालों से खांसी की परेशानी रही है. 27 दिसंबर को विज्ञान भवन में यमुना की सफ़ाई से जुड़ा एक सरकारी प्रोग्राम था. यहां बीजेपी कार्यकर्ताओं ने केजरीवाल की खांसी का मज़ाक उड़ाया. ये फोटो उस कार्यक्रम की नहीं, पुरानी है.
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27 दिसंबर को नई दिल्ली में एक सरकारी कार्यक्रम था. इस प्रोग्राम में यमुना की सफ़ाई के लिए कुछ नए प्रॉजेक्ट लॉन्च किए जाने थे. यहां थे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. साथ में थे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी. अरविंद केजरीवाल माइक पर पहुंचे. बोलना शुरू किया. सामने हॉल में बीजेपी के नेता-कार्यकर्ता भी बैठे थे. उनमें से कई खांसने लगे. इसलिए नहीं कि उन सबको साथ खांसी आई थी. इसलिए कि उन्हें केजरीवाल का मज़ाक उड़ाना था. केजरीवाल ने ये सब अनदेखा करके बोलने की कोशिश की. मगर नकली खांसियां तेज़ हो गईं. मुख्यमंत्री को रुकना पड़ा. उन्होंने अपील की-

ये मार्च 2015 की इंडिया टुडे की एक खबर का स्क्रीनशॉट है. अरविंद केजरीवाल नैचुरल थैरपी से खांसी का इलाज करवाने बेंगलुरु गए थे. कई सालों से उन्हें क्रॉनिक कफ़ की परेशानी रही थी.
किसी की बीमारी का मज़ाक उड़ाना टुच्चई है खांसी बहुत तकलीफ़ वाली चीज है. बहुत खांसी हो, तो सिर दर्द करने लगता है. इंसान पस्त हो जाता है. ये कोई एन्जॉय करने वाली चीज नहीं. केजरीवाल शौक से तो खांसते नहीं होंगे. किसी की बीमारी का मज़ाक उड़ाना निहायत बेहूदी हरकत है. फिर चाहे वो कोई भी क्यों न हो. नितिन गडकरी ने बहुत ज़रूरी सभ्यता दिखाई. अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को टोका और रोका. ये अच्छी बात हुई. वैसे बीजेपी के लोग खुद के नेताओं की बात आने पर पद के सम्मान का ध्यान दिलाने लगते हैं. कहते हैं, इंसान की नहीं तो प्रधानमंत्री, मंत्री के पद का तो लिहाज रखो. उन्हें यही बात विरोधियों के मामले में भी याद रखनी चाहिए. किसी की भी बीमारी या शारीरिक अवस्था मज़ाक की, हंसने की चीज नहीं हो सकती. अगर आपको किसी की बीमारी में हास्य दिखता है, तो आप दिमागी तौर पर बेहद बीमार हो चुके हैं.
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अगर शांत हो जाएं, तो अच्छा रहेगा.मगर लोग चुप नहीं हुए. खांसकर मज़ाक उड़ाते रहे. मुख्यमंत्री माइक के सामने चुप खड़े उन्हें देखते रहे. फिर मंच पर बैठे नितिन गडकरी की आवाज़ गूंजी. उन्होंने कहा-
आप (मुख्यमंत्री से) शुरू करिए. (फिर बीजेपी कार्यकर्ताओं से) जरा शांत रहिए प्लीज़. सरकारी कार्यक्रम है, शांत रहिए.
अरविंद केजरीवाल को इतनी खांसी क्यों होती है? गडकरी के टोकने पर बीजेपी के लोग चुप हुए. फिर केजरीवाल अपनी बात दोबारा शुरू कर पाए. क्या ये मासूम सा हार्मलेस मज़ाक था? नहीं. ये बदतमीज़ी थी. अरविंद केजरीवाल को लंबे समय से खांसी की परेशानी रही है. तकरीबन 40-41 सालों से. एक ऐनाटॉमिकल कंडीशन की वजह से कई बार उनकी लार उनकी सांसनली के रास्ते में आ जाती थी. इस वजह से उन्हें अक्सर खांसी रहती थी. सर्दियों में ये परेशानी और बढ़ जाती है. इससे निज़ात पाने के लिए उन्होंने काफी इलाज करवाया. 2016 में उन्होंने एक सर्जरी भी करवाई थी. बेंगलुरु के नारायण हेल्थ सिटी में. उनके गले का ऑपरेशन किया था डॉक्टरों ने. उससे काफी फ़ायदा हुआ, मगर अरविंद केजरीवाल की खांसी वाली बीमारी 100 पैसा ठीक नहीं हुई.#WATCH
— ANI (@ANI) December 28, 2018
BJP workers troll Delhi CM Arvind Kejriwal, start coughing when he begins to talk. Union Minister Nitin Gadkari intervened and Kejriwal began. pic.twitter.com/tABmZJcreS

ये मार्च 2015 की इंडिया टुडे की एक खबर का स्क्रीनशॉट है. अरविंद केजरीवाल नैचुरल थैरपी से खांसी का इलाज करवाने बेंगलुरु गए थे. कई सालों से उन्हें क्रॉनिक कफ़ की परेशानी रही थी.
किसी की बीमारी का मज़ाक उड़ाना टुच्चई है खांसी बहुत तकलीफ़ वाली चीज है. बहुत खांसी हो, तो सिर दर्द करने लगता है. इंसान पस्त हो जाता है. ये कोई एन्जॉय करने वाली चीज नहीं. केजरीवाल शौक से तो खांसते नहीं होंगे. किसी की बीमारी का मज़ाक उड़ाना निहायत बेहूदी हरकत है. फिर चाहे वो कोई भी क्यों न हो. नितिन गडकरी ने बहुत ज़रूरी सभ्यता दिखाई. अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को टोका और रोका. ये अच्छी बात हुई. वैसे बीजेपी के लोग खुद के नेताओं की बात आने पर पद के सम्मान का ध्यान दिलाने लगते हैं. कहते हैं, इंसान की नहीं तो प्रधानमंत्री, मंत्री के पद का तो लिहाज रखो. उन्हें यही बात विरोधियों के मामले में भी याद रखनी चाहिए. किसी की भी बीमारी या शारीरिक अवस्था मज़ाक की, हंसने की चीज नहीं हो सकती. अगर आपको किसी की बीमारी में हास्य दिखता है, तो आप दिमागी तौर पर बेहद बीमार हो चुके हैं.
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