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मदिरा बैन से परेशान लोगों के लिए नीतीश लाए 'नीरा'

ताड़ का फल होता है नीरा. सरकार इसे प्रोजेक्ट कर रही है. गोवा में देसी नशा पेवनी इसी से बनता है. लेकिन यहां एक खास बात और होगी.

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27 मई 2016 (अपडेटेड: 26 मई 2016, 05:16 AM IST)
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बिहार में शराब बैन से बड़ी परेशानी है. एक तरफ तो लोग शैंपू चाट रहे हैं. दूसरी तरफ बेरोजगारी. दोनों के लिए मार्केट में नई चीज आने वाली है. पीने वाली. इसको नीरा कहते हैं. लेकिन इसमें नशा नहीं होता. लेकिन इससे नशीले प्रॉडक्ट जरूर बनाए जाते हैं. मजाक नहीं है. सरकार खुद इसके लिए नीति तैयार की है. इसके लिए बड़ी वाली मीटिंग हुई. बेरोजगारी को 6 महीने के अंदर खत्म करने का मास्टर प्लान है ये. nitish kumar गुरुवार के दिन सचिवालय में मीटिंग हुई. सीएम नीतीश कुमार इसमें मौजूद थे. वहां दिखाया गया एक प्रेजेंटेशन. तमिलनाडु के नीरा स्पेशलिस्ट आए थे यहां. अभी जो वित्तीय वर्ष चल रहा है, इसके लास्ट तक नीरा से बने प्रोडक्ट्स मार्केट में आ जाएंगे. जून में उद्योग नीति घोषित होने वाली है. उसमें इसका फॉर्मल ऐलान हो सकता है. जयकुमार सिंह उद्योग मंत्री हैं. उन्होंने ये जानकारी दी.

एक ताड़ से 8 हजार रुपए महीने की कमाई

तमिलनाडु से आए ताड़ विशेषज्ञों ने बताया कि बहुत फायदे का कारोबार है. ताड़ का एक पेड़ समझ लो दुधारू गाय है. जैसे दूध से तमाम प्रोडक्ट्स बनते हैं. वैसे ही ताड़ के पेड़ का हर हिस्सा इस्तेमाल हो जाता है कमाई में. ताड़ पर चढ़ने वालों को सरकार दो हजार रुपये महीना देती है. एक पेड़ से 7-8 हजार आराम से पैदा किए जा सकते हैं. नीरा का सीजन चार महीने तक रहता है, लेकिन सरकार की योजना है कि इसके बाद भी इसे प्रोसेस करके खाने-पीने की चीजें बनाई जा सकें. ताड़ का फल होता है. उसको काटो तो अंदर से तीन चार चैंबर निकलते हैं. अंदर का हिस्सा ट्रांसपेरेंट सा होता है. उसे गरीबों की लीची कहते हैं लोग. उससे नशाहीन लिक्विड बनता है. गोवा में इसकी पेवनी बनती है. ये वहां का देसी नशा है. उसी तर्ज पर बिहार सरकार इसे आगे बढ़ाएगी. लेकिन प्वाइंट टू बी नोटेड, इससे नशीली चीजें नहीं बनेंगी, ऐसा सरकार का कहना है. बल्कि इससे गुड़, हनी और कैंडी वगैरह बनेगी. कॉन्स्टेबल को फेवरेट ब्रांड की दारू नहीं मिली तो जहर पिया! 'न पिऊंगा, न पीने दूंगा...' शराब हुई बैन तो हॉस्पिटल बना बेवड़ों का ठिकाना

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