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BHU के एग्जाम में ज्ञानवापी और औरंगजेब पर ऐसे क्या सवाल पूछे, जो बवाल हो गया?

कुछ छात्रों ने कहा कि सवाल मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ हैं, कुछ ने सवालों का समर्थन किया.

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BHU kashi vishwanath demolition
BHU. (फाइल फोटो)
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धीरज मिश्रा
29 सितंबर 2022 (अपडेटेड: 29 सितंबर 2022, 07:10 PM IST)
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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की परीक्षा में काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने के संबंध में सवाल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. एमए इतिहास के छात्रों से यह पूछा गया था कि ‘औरंगजेब ने काशी के आदि विश्वेश्वर मंदिर का विध्वंस किया, इस बात का जिक्र किसने, किस पुस्तक में किया है?’

इसके अलावा यह भी पूछा गया था- ‘मासिर-ए-आलमगीरी के प्रकाश में औरंगजेब की धार्मिक नीति एवं मंदिरों को तोड़ने का वर्णन कीजिए.’

ये सवाल ऐसे समय पर पूछा गया है जब ज्ञानवापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ मंदिर भूमि विवाद मामला कोर्ट में लंबित है. इन सवालों को लेकर BHU में नए सिरे से विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें मुख्य रूप से कुछ छात्रों ने दावा किया है कि ये सवाल मुस्लिम पक्ष के खिलाफ है. वहीं कुछ इन सवालों के पक्ष में हैं.

हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि आज जिस स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद खड़ी है, वहां कभी आदि विश्वेश्वर मंदिर हुआ करता था, जो कि भगवान शिव का था. हालांकि, मुस्लिम समूहों ने इन दावों को खारिज किया है.

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एमए इतिहास की परीक्षा में पूछा गया सवाल.
साल 1991 का मामला

ज्ञानावापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ मंदिर मामला पहली बार साल 1991 में कोर्ट पहुंचा था, जिसमें ये दावा किया गया था कि जिस स्थान पर मस्जिद है, पहले वहां मंदिर था, इसलिए उस जमीन को हिंदू समुदाय को वापस लौटाया जाना चाहिए.

काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट और अन्य याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2000 साल से भी पहले महाराजा विक्रमादित्य ने उस स्थान पर मंदिर बनवाया था. बाद में 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के 'फरमान' पर इस मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बना दी गई.

उन्होंने ये भी दावा किया है कि जब मंदिर जर्जर स्थिति में पहुंच गया था, तो उसके रेनोवेशन के लिए नारायण भट्ट को राजा टोडरमल से वित्तीय सहायता मिली थी. ये सहायता मुगल शासक अकबर के करीबी राजा मान सिंह के आदेश पर दी गई थी. लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरगंजेब के आदेश पर भगवान विश्वेश्वर के मंदिर को तोड़ा गया और मंदिर के अवशेषों से मस्जिद बनाई गई.

हिंदू याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 'अनादि-काल' से उस स्थान पर शिवलिंग है. वो अपने आप जमीन से निकला था, इसलिए मंदिर को तोड़ने के बाद भी उसे अपने स्थान से हटाया नहीं जा सका है. इस आधार पर हिंदू याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि उस पूरी जमीन को हिंदू समुदाय को दिया जाए, ताकि वो शिवलिंग पर जल चढ़ाने के अपने धार्मिक अधिकारों को पूरा कर सकें.

'दोनों समुदाय के लोग कर रहे उपासना'

वहीं मुस्लिम पक्ष की ओर से दायर की गई याचिका में कहा गया है कि उस स्थान पर हमेशा से मस्जिद थी, इसलिए इसपर विवाद खड़ा करने और सर्वे कराने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए.

इस मामले को लेकर साल 1998 में मस्जिद की प्रबंध समिति ने कोर्ट में एक आवेदन दायर किया था. इसमें उन्होंने मांग की थी कि हिंदू पक्ष की याचिका को खारिज किया जाना चाहिए. उन्होंने उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का हवाला देते हुए कहा कि इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में है, उसे लेकर कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. इस कानून की धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी धार्मिक स्थल के किसी हिस्से को किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल के रूप में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है.

समिति ने अदालत को ये भी बताया था कि लंबे समय से उस स्थान पर मंदिर और मस्जिद दोनों हैं और दोनों समुदाय के लोग अपने धर्म के अनुसार उपासना करते आ रहे हैं. ये मामला बाद में हाई कोर्ट में गया और फिर करीब 20 सालों तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. लेकिन साल 2019 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद फिर से खड़ा हो गया है.

वीडियो: सुप्रीम कोर्ट का फैसला- शादीशुदा हो या नहीं, अबॉर्शन सबका अधिकार है!

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