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किन तीन वजहों से दलित-आदिवासी संगठनों ने 5 मार्च को 'भारत बंद' बुलाया?

चुनाव के माहौल में इनकी नाराज़गी का क्या असर होगा? कोई असर होगा भी कि नहीं होगा...

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5 मार्च 2019 (अपडेटेड: 5 मार्च 2019, 10:17 AM IST)
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5 मार्च को बुलाए गए इस भारत बंद में दलितों और आदिवासियों से जुड़े क़रीब 200 संगठन हिस्सा ले रहे हैं.
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5 मार्च के रोज़ देश के दलित और आदिवासी फिर एक बार सड़कों पर हैं. अपनी कुछ मांगों को लेकर उन्होंने 'भारत बंद' बुलाया है. इस बंद के पीछे है ऑल इंडिया फॉरम फॉर अकैडमिक ऐंड सोशल जस्टिस. ये 200 से ज्यादा सामाजिक संगठनों का मिला-जुला मंच है. प्रदर्शनकारी मंडी हाउस से पार्लियामेंट तक मार्च करेंगे.
इस विरोध के पीछे है सुप्रीम कोर्ट के हालिया दिनों में आए कुछ फैसले. आरोप है कि इन फैसलों से दलित और आदिवासी प्रभावित हो रहे हैं. लेकिन सरकार कोई ठोस ऐक्शन नहीं ले रही. ये लोग चाहते हैं कि सरकार कोर्ट के इन फैसलों के खिलाफ अध्यादेश लाए. फॉरम की तीन बड़ी मांगे हैं-
1. 13 पॉइंट रोस्टर को खत्म करने के लिए अध्यादेश लाया जाए. 2. आदिवासियों को ज़मीन से बेदखल करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश लाया जाए 3. हायर जूडिशरी, यानी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आदिवासी-पिछड़े वर्ग की नियुक्ति सुनिश्चित हो
सुप्रीम कोर्ट के हाल ही में आए फैसलों से आदिवासी और दलित समुदाय चिंतित है
सुप्रीम कोर्ट के हाल ही में आए फैसलों से आदिवासी और दलित समुदाय चिंतित है 

इन तीनों मुद्दों को थोड़ा डिटेल में जानते हैं
# क्या है ये ‘13 पॉइंट रोस्टर ‘13 पॉइंट रोस्टर’ यूनिवर्सिटीज़ या कॉलेजों में होने वाली नियुक्तियों में आरक्षण लागू करने का एक तरीका है. पहले यूनिवर्सिटीज़ में नौकरियों के लिए यूनिवर्सिटी या कॉलेज को एक इकाई माना जाता था. आरक्षण का फायदा भी उसी हिसाब से मिलता था. लेकिन UGC के नए नियम के मुताबिक रिजर्वेशन को डिपार्टमेंट के आधार पर लागू कर दिया गया. इसे इस तरह समझिए कि पहले क्या होता था कि आरक्षण तय करने की यूनिट होती थी यूनिवर्सिटी या कॉलेज. माने एक पूरा सेब. इसमें से फिर जिस वर्ग का जितना बनता है, उतना आरक्षण उन्हें दिया जाता था. अब क्या होता है कि एक सेब (यानी यूनिवर्सिटी या कॉलेज) को कई फांकों में बांट दिया. अलग-अलग डिपार्टमेंट, मतलब अलग-अलग फांकें. फिर इन्हें आधार बनाकर रिजर्वेशन बांटा जाने लगा. यानी हिस्से छोटे हो गए. छोटे में से फिर दलितों-आदिवासियों का हिस्सा भी सिमट गया.
सरकार और कोर्ट के बीच क्या हुआ? पहले वेकैंसी ‘200 पॉइंट रोस्टर’ के हिसाब से निकलती थी. लेकिन UGC ने इसे ‘13 पॉइंट रोस्टर’ के आधार पर करने का नियम बना दिया. 2018 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस बदलाव पर मुहर लगा दी थी. कोर्ट का फैसला आने के बाद UGC ने इसी ‘13पॉइंट रोस्टर’ के मुताबिक वैकेंसी निकालनी शुरू कर दी. लोगों ने विरोध किया. फिर UGC ने तमाम तरह की वेकैंसी पर रोक भी लगा दी. सरकार ने भी कहा कि वो इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी. लेकिन 22 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की याचिका को खारिज कर दिया. इससे ये साफ़ हो गया कि यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेजों में भर्ती ’13 पॉइंट रोस्टर’ के हिसाब से ही होगी.
13 पॉइंट का भारी विरोध हो रहा है
13 पॉइंट रोस्टर जब से लागू हुआ, उसी समय से इसका विरोध हो रहा है. ये ऐसे ही एक विरोध प्रदर्शन की पुरानी तस्वीर है. 

इस नियम के लागू हो जाने के बाद, किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के एक विभाग में भर्ती के लिए OBC को 4, SC को 7 और ST को 14 वेकैंसी निकलने का इंतज़ार करना होगा. ऐसा बहुत कम होता है कि किसी भी डिपार्टमेंट में एक साथ 13 या उससे ज़्यादा भर्तियां निकलें. सो इसका विरोध होना लाज़िम है.
ऐक्टिविस्ट इसे आरक्षण खत्म करने साजिश बता रहे हैं. वे चाहते हैं कि ‘200 पॉइंट रोस्टर’ को वापस लागू किया जाए. उसी पुराने हिसाब-किताब पर, जिसमें 49.5 प्रतिशत रिजर्वेशन और फिर बाकी 50.5 प्रतिशत अनारक्षित सीट वाले फॉर्मूले का ध्यान रखा जाता था. जानकारों की राय में 13-पॉइंट रोस्टर के होते ऐसा मुमकिन नहीं है. इसमें आरक्षण का फायदा भी हद-से-हद 30 प्रतिशत तक ही मिल पाएगा. ऐक्टिविस्ट चाहते हैं कि सरकार इस पर आध्यादेश लाए और इलाहाबाद कोर्ट के इस फैसले को पलटे. मगर उनकी आपत्तियों को सुना नहीं गया और UGC ने नई भर्तियां करनी शुरू कर दीं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. SC, ST, OBC के लिए आरक्षित पदों की संख्या में भारी कमी आई है.
# जंगलों में रहने वाले क्यों सड़कों पर उतरे? सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 21 फरवरी को फैसला दिया. कि देश की 17 राज्य सरकारें अपने यहां के जंगलों से तकरीबन 11 लाख परिवारों को बाहर निकालें. आदेश इस वजह से था कि फॉरेस्ट राइट्स ऐक्ट के तहत जंगल में ज़मीन के पट्टों पर इन लोगों का दावा खारिज हो गया था. फिर 27 फरवरी को इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट का एक और आदेश आया. पुराने आदेश पर रोक लगा दी गई. कोर्ट ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई को होगी.
एक आंकड़े के मुताबिक इस फैसले से 11 लाख आदिवासी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे
एक आंकड़े के मुताबिक 21 फरवरी को दिए गए सुप्रीम कोर्ट  के फैसले से 11 लाख आदिवासी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे. 

क्या है फॉरेस्ट राइट्स ऐक्ट 2006? भारत में वन अधिकारों के लिए हुए आंदोलनों का लंबा इतिहास है. लंबी लड़ाई के बाद दिसंबर 2006 में मनमोहन सिंह की UPA सरकार 'द शिड्यूल्ड ट्राइब्स ऐंड अदर ट्रेडिशनल फॉरेस्ट ड्वेलर्स' (रिकगनिशन ऑफ फॉरेस्ट राइट्स) ऐक्ट लेकर आई. साधारण भाषा में इसे ही फॉरेस्ट राइट्स या FRA कहा जाता है. इसके तहत 31 दिसंबर, 2005 से पहले जितने भी लोग जंगल की ज़मीन पर कम-से-कम तीन पीढ़ियों से रह रहे थे, उन्हें ज़मीन के पट्टे मिलने थे. पट्टा मिलना, मतलब सरकारी रेकॉर्ड में ज़मीन आपकी हो जाना. मालिकाना हक मिलना. वहां से आपको कोई नहीं हटा सकता. आदिवासी अपने हिसाब से ज़मीन इस्तेमाल कर सकते थे. इसके लिए आदिवासियों को दावा करना होता है. जंगलात की एक कमिटी के सामने. ये मुश्किल प्रक्रिया है. कइयों के दावे ख़ारिज हो जाते हैं.
अपने पहले आदेश पर रोक लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने फौरी राहत दी है. लेकिन वनवासियों के बीच अब भी छत छिनने का डर है.
अपने पहले आदेश पर रोक लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने फौरी राहत दी है. मगर इससे वनवासियों के सिर से छत छिनने का खतरा खत्म नहीं हुआ है. 

बात कोर्ट क्यों पहुंची? फॉरेस्ट राइट्स ऐक्ट को कई NGO और रिटायर्ड वन अधिकारियों ने कोर्ट में चुनौती दी हुई है. इस मामले में कोर्ट ने 19 फरवरी को एक आदेश निकाला. इसमें 17 राज्यों के चीफ सेक्रटरी से कहा गया है कि वो खारिज दावों वाले लोगों को 12 जुलाई, 2019 से पहले जंगल से बाहर करें. जो दावे पेंडिंग हैं, उन्हें भी इस तारीख तक निपटाना है. अभी इस फैसले पर अमल होता, उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को एक और आदेश दिया और अपने पुराने आदेश पर रोक लगा दी. लेकिन ये पक्का इलाज नहीं है. सरकारों के सामने ये समस्या खड़ी हो गई है कि 11 लाख परिवारों को जंगल से बाहर निकालकर भेजें कहां. वन अधिकार पूरे देश में, खासकर आदिवासियों के बीच बहुत बड़ा भावनात्मक मुद्दा है. उनके लिए ये अपने सिर की छत से जुड़ा मामला है. इसीलिए आदिवासी संगठन सड़क पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.
# हायर जूडिशरी में रिज़र्वेशन दलित और आदिवासी संगठन लंबे समय से सिविल सर्विसेज़ की तर्ज पर इंडियन जूडिशल सर्विसेज़ बनाने की मांग करते रहे हैं. इनका कहना है कि हायर जूडिशरी में SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक वर्गों की अनदेखी होती है. काबिल होने के बावजूद उन्हें दरकिनार किया जाता है. भारत में जूडिशरी दो तह में काम करती है. एक, हायर जूडिशरी. दूसरी, सब-ऑर्डिनेट जूडिशरी. जिसे लोअर जूडिशरी भी कहते हैं. हायर जूडिशरी में नियुक्ति के दो तरीके हैं- बार (लीगल प्रैक्टिस कर रहे वकील) से बतौर हाई कोर्ट जज नियुक्ति. दूसरा- लोअर जूडिशरी से प्रमोशन. दूसरे तरीके से जूडिशरी में पहुंचना थोड़ा मुश्किल है. सो नियुक्तियों में अक्सर परिवारवाद और सवर्णों का पक्ष लेने के आरोप लगते रहे हैं.
भारत की हायर जुडिशरी में SC/ST और माइनोरिटी जजों की संख्या न के बराबर है
भारत की हायर जूडिशरी में SC/ST और अल्पसंख्यक वर्गों से आने वाले जजों की संख्या बहुत कम है. 

लोअर जूडिशरी में नियुक्ति का रास्ता हाई कोर्ट से होकर गुजरता है. यहां नियुक्ति हाई कोर्ट के जजों की राय पर राज्य के गवर्नर करते हैं. इसके लिए एंट्रेंस टेस्ट समेत कई तरह की प्रक्रिया से होकर गुज़रना होता है. इस पूरी प्रकिया में आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं होती. ऐक्टिविस्टों का आरोप है कि इन नियुक्तियों में दलित और पिछड़ों को जान-बूझकर बाहर रखा जाता है. वो अपने इस आरोप को मजबूत करने के लिए हाल ही में निकले एक रिजल्ट का उदाहरण दे रहे हैं. रिज़ल्ट है उत्तर प्रदेश हायर जूडिशल सर्विस के मेन रिटन टेस्ट का. इस लिस्ट में SC और ST तबके से आने वाले एक भी शख्स का नाम नहीं है. ऐक्टिविस्ट इसका समाधान देखते हैं AIJS में.
इलाहाबाद कोर्ट की ओर से जारी सब-ऑर्डिनेट जूडिशरी में भर्तियों के लिए परीक्षा हुई थी
इलाहाबाद कोर्ट की ओर  सब-ऑर्डिनेट जूडिशरी में भर्तियों के लिए परीक्षा हुई थी.

मेन रिटन टेस्ट में पास हुए अभ्यर्थियों में एक भी SC/ST तबके से नहीं है
मेन रिटन टेस्ट में पास हुए लोगों में एक भी SC-ST ग्रुप से नहीं है. OBC के लोग हैं, लेकिन बस चार. 

ये AIJS क्या चीज है? इसका फुल फॉर्म है- ऑल इंडिया जूडिशल सर्विस. इसका मतलब है कि एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा हो और इसके मार्फ़त पूरे देश की लोअर जूडिशरी के लिए लोगों को चुना जाए. 1960 के दशक से ही ऐसा करने की बातें हो रही हैं. लेकिन ये आज तक हो नहीं सका. सबसे बड़ा अड़ंगा खुद जूडिशरी से है. हाई कोर्ट के जजों का कहना है कि भारत में कई तरह की क्षेत्रीय भाषाएं बोली जाती हैं. अगर लोअर कोर्ट में नियुक्तियां नेशनल लेवल पर होगीं, तो किसी भी जज के लिए दूसरी लोकल भाषा समझ पाना मुश्किल होगा. कई बार सरकारों ने हायर जूडिशरी के साथ इस मुद्दे पर सहमति बना भी ली, लेकिन फिर भी कुछ न हो सका.
कई सरकारों ने हायर जूडिशरी को भरोसे में लेने की कोशिश की है लेकिन आज तक कुछ भी ठोस नहीं हो पाया
कई सरकारों ने  AIJS पर एकराय बनाने की कोशिश की. हायर जूडिशरी को भरोसे में लेने की भी कोशिश की गई. लेकिन आज तक कुछ भी ठोस नहीं हो पाया. 

AIJS के नाम पर संविधान में संशोधन तक हुआ AIJS  के लिए पहली बड़ी कोशिश की गई 1976 में. संविधान में 42वां संशोधन किया गया. संविधान के आर्टिकल 312 में संशोधन से AIJS  बनने का रास्ता साफ हो गया था. लेकिन 42 साल बाद भी ग्राउंड पर कुछ नहीं है. आज तक इसके न बन पाने का सबसे बड़ा कारण है सरकार और हायर जूडिशरी के बीच सहमति न बन पाना. UPA-2 ने इसके लिए काफी कोशिश की. 2013 तक AIJS बनने के आसार दिख भी रहे थे. लेकिन फिर ढाक के तीन पात.
फिर 2014 में आई मोदी सरकार. पिछले पांच सालों में तीन मौके आए, जब मोदी सरकार ने AIJS बनाने की कोशिश की. लेकिन जूडिशरी के साथ खींच-तान के चलते इन पांच सालों में भी AIJS नहीं बन सकी. ऐक्टिविस्टों का आरोप है कि हायर जूडिशरी में बैठे लोगों ने जान-बूझकर इसे अटका रखा है. ताकि पिछडे़ और वंचित लोग फैसला देने वाले न बन सकें. बाकी ये विरोध प्रदर्शन लोकसभा चुनावों से ऐन पहले हो रहा है. चुनावी मोमेंटम है. मोदी सरकार इसका क्या राजनीतिक नतीजा भुगतेगी, भुगतेगी भी कि नहीं भुगतेगी, कुछ असर पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा, ये सब आगे की बातें हैं.


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