बेवफाई की असली मार तो सिद्धू पर पड़ी है
अब तो बोल भी नहीं रहे सिद्धू.
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फोटो - thelallantop
ये सीजन ही बेवफाई का चल रहा है. अमेरिका के लोगों ने अमेरिका के साथ बेवफाई की. ट्रंप को चुन लिया. लोग कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी भी बेवफा हो गये हैं. नोट बैन कर दिया. लाइन में लगवा दिया. हालांकि मैं नहीं मानता. वैसे तो दिल्ली की हवा बेवफा हो चुकी है लोगों के लिये. जान जाने की नौबत आ चुकी है. लोग बेवफा हो गये हैं हवा के लिये. गाड़ियां भी चलायेंगे, पटाखे भी छोड़ेंगे. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली से बेवफाई कर रहे हैं. पूरा ध्यान पंजाब चुनाव पर है. दिल्ली तो जैसे इनकी बातों से गायब हो गई है.
पर सबसे ज्यादा बेवफाई हुई है नवजोत सिंह सिद्धू के साथ. हालांकि शुरूआत इन्होंने ही की थी. पहले बीजेपी छोड़ दी. बीजेपी के नेताओं से बिना कोई पब्लिक बात किये अचानक एक दिन इस्तीफा सौंप दिया संसद में. पर ये मामला बहुत दिन से चल रहा था. सबके दिल में एक लहर उठती थी कि कुछ तो होने वाला है. क्योंकि बहुत दिन से सिद्धू बीजेपी की बातों पर चुटकी लेते दिख रहे थे. अब वो ऐसी बातें बोलने लगे थे कि वो क्रिटिसिज्म तो कतई नहीं लगती थीं. लगता था कि दिल के गाढ़े कोने में से निकालकर हंसी में लपेट के बोल रहे हैं.
उसके बाद हल्ला हुआ कि सिद्धू आम आदमी पार्टी जॉइन करेंगे. परिवर्तन की पार्टी. सिद्धू के मुताबिक उनको अमृतसर में बीजेपी के लोगों ने ही काम नहीं करने दिया था. तो अब मौका मिलने वाला था काम करने का. क्योंकि पंजाब में चुनाव होने वाले हैं. पर यहां भी बात एकदम उलट गई. पता नहीं चला कि कौन बेवफा है. पर बेवफाई हो गई. सिद्धू की पत्नी भी भाजपा छोड़ के आ गई थीं. पर आम आदमी पार्टी से लफड़ा हो गया सीटों को लेकर. पंछियों के मुताबिक सिद्धू अपने और अपनी पत्नी के लिये दो बड़ी सीटें और पद चाहते थे. पर आम आदमी वाले तैयार नहीं थे.
नाराज सिद्धू ने अपनी पार्टी खोल दी. आवाज-ए-पंजाब. पर ये भी जोड़ दिया कि चुनाव लड़ने के लिये नहीं है. मतलब पॉलिटिकल पार्टी नहीं थी. ये नहीं पता कि क्या बनाये थे. शायद चुनाव लड़ पाने की तैयारी ना हो. पर इनको साथ मिला बैंस ब्रदर्स का. ये इनकी आर्थिक ताकत बन गये. साइकिल पार्ट्स से कारोबार शुरू कर इन लोगों ने प्रॉपर्टी कारोबार में बहुत पैसा बनाया था. पिछले चुनाव में लुधियाना जिले से दोनों भाई विधायक चुने गये थे. वहां इन लोगों ने आम आदमी की दिक्कतों को दूर करने के लिये सुविधा सेंटर भी खोला है. हेल्प करते हैं लोगों की. पहले ये लोग अकाली दल के समर्थक थे. पर अकाली दल ने 2012 के चुनाव में दोनों में से एक ही भाई को टिकट देने को कहा तो ये लोग उनसे नाराज हो गये. उसके बाद तो अकाली दल के खिलाफ खूब बोलने लगे.
पर सिद्धू के साथ बनी इनकी चाशनी में भी दरार आने लगी. क्योंकि सिद्धू बहुत दिन तक फैसला नहीं कर पा रहे थे कि आम आदमी पार्टी के साथ जायें या कांग्रेस के साथ. आम आदमी के साथ तो रिश्ते टूट गये. पर भीतर ही भीतर बातें चल रही थीं. यही बेवफाई का सबूत होता है जी. बैंस ब्रदर्स ने आजिज होकर आम आदमी पार्टी जॉइन कर ली. अब सिद्धू बेवफाई का दंश झेल रहे हैं.
यही होता ही है. जब आप अपनी बातें साफ बताते नहीं हैं, दिल की बात छुपा के रखते हैं, कोई कम्युनिकेशन नहीं करते, तो बेवफा होने के चांसेज बढ़ जाते हैं. डिसिजन तो ले ही लेना चाहिये. जब सबसे बात करेंगे, सबको लटका के रखेंगे तो यही होगा. खैर, रिश्ते तो होते ही हैं बनने-बिगड़ने के लिये. ये तो चलता ही रहता है.

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