कम मात्रा में ड्रग्स मिलने पर जेल न हो, इस मंत्रालय ने दिया NDPS एक्ट में बदलाव का सुझाव
कम मात्रा में ड्रग्स मिलने को अपराध की परिभाषा से अलग करने की मांग की.
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मंत्रालय ने Ndps नियम में बदलाव के सुझाव दिए (साभार इंडिया टुडे)
NDPS (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस) एक्ट की समीक्षा करने के बाद केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि ड्रग्स लेने वाले और उसके एडिक्ट लोगों को जेल से बचाने के लिए अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए. कुछ दिनों पहले भेजी गई एक सिफारिश में मंत्रालय ने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए कम मात्रा में ड्रग्स मिलने को अपराध की परिभाषा से अलग करने की मांग की है.
इंडियन एक्स्प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले महीने NDPS एक्ट की नोडल एडमिनिस्ट्रेटिव अथॉरिटी राजस्व विभाग ने केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों से NDPS ऐक्ट में बदलाव को लेकर कुछ सुझाव मांगे. गृह मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और सीबीआई सहित कई मंत्रालयों और विभागों से सुझाव मांगे गए थे.
बहुत सारे नशीले पदार्थ ऐसे हैं, जिनका उत्पादन ज़रूरी है. लेकिन इन पर कड़ी निगरानी रखने की भी ज़रूरत होती है. वर्ना बड़े स्तर पर किए गए प्रोडक्शन से लोगों में लत पड़ने का भी खतरा है. ऐसे में सरकार NDPS एक्ट के तहत नशीले सब्स्टेंसेज़ पर कंट्रोल कसती है. NDPS एक्ट एक सख्त कानून है. इसकी धारा 42 के अंतर्गत इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर को बिना किसी वॉरंट के तलाशी लेने, मादक पदार्थ ज़ब्त करने और गिरफ्तार करने का अधिकार है. कौन-कौन से ड्रग्स प्रतिबंधित हैं? NDPS एक्ट के तहत प्रतिबंधित ड्रग्स की लिस्ट जारी होती है. जिसे केंद्र सरकार जारी करती है. हालांकि, ये लिस्ट समय-समय पर बदलती भी रहती है. लिस्ट में बदलाव के लिए राज्य सरकारें भी सुझाव देती हैं. नार्कोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टेंसेज़ एक्ट में दो दवाओं के नाम छिपे हैं. पहला है नार्कोटिक्स. और दूसरा है साइकोट्रॉपिक.
नार्कोटिक होते हैं नींद लाने वाले ड्रग्स. नार्कोटिक में जो दवा या पदार्थ आते हैं, वो नैचुरल होते हैं. या फिर किसी नैचुरल चीज़ से बनते हैं. जैसे गांजा, मॉर्फीन, अफीम, चरस आदि.
दूसरा है साइकोट्रॉपिक. दिमाग के फंक्शन्स पर असर डालने वाले ड्रग्स को साइकोट्रॉपिक कहते हैं. इनमें वो दवाएं आती हैं, जो केमिकल बेस्ड होती हैं. या फिर जिन्हें दो या तीन केमिकल्स को मिलाकर बनाया जाता है. जैसे एलएसडी और एमडीएमए. सजा कैसे तय होती है? NDPS एक्ट के तहत तीन मानकों पर सज़ा निर्धारित की जाती है. ये सज़ाएं बैन्ड सब्स्टेंसेज़ की क्वांटिटी के बेसिस पर तय होती है. मात्रा या क्वांटिटी के आधार पर तीन तरह की सज़ा होती हैं:
#1. स्मॉल क्वांटिटी: अगर कोई इंसान कम मात्रा में इललीगल ड्रग्स का यूज़ या सप्लाई कर रहा है तो उसे छह महीने से एक साल तक की जेल हो सकती है. साथ ही 10 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया जाएगा. इस तरह का अपराध जमानती होता है. हालांकि बार-बार पकड़े जाने पर जमानत मिलना मुश्किल हो सकता है.
#2. कमर्शियल क्वांटिटी: इस तरह के अपराध में पकड़े जाने पर जमानत नहीं मिलती. 10 से 20 साल तक की जेल और एक से दो लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.
#3. स्मॉल और कमर्शियल के बीच की क्वांटिटी (Intermediate Quantity): इस केस में 10 साल तक की सज़ा और एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है. ऐसे मामलों में जमानत मिलना या न मिलना पकड़े गए नशीले सब्स्टेंस और पुलिस की धाराओं पर निर्भर करता है.

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