खाने पर घटा भारतीयों का खर्च, आजादी के बाद पहली बार आधा रह गया
EAC-PM पेपर के मुताबिक, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भोजन पर कुल घरेलू खर्च की हिस्सेदारी में काफी गिरावट आई है. स्वतंत्रता के बाद ये पहली बार हुआ है कि भोजन पर औसत घरेलू खर्च कुल मासिक घरेलू खर्च के आधे से भी कम है.

भारत में औसत घरेलू खर्च को लेकर नया डेटा सामने आया है. पता चला है कि 1947 के बाद पहली बार खाने पर औसत घरेलू खर्च आधे से कम हो गया है. ये डेटा प्रधान मंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के पेपर में छपा है. कहा गया है कि खाने पर औसत घरेलू खर्च में ये कमी केंद्र और राज्य सरकारों की मुफ्त में अनाज बांटने वाली योजनाओं के चलते आई है.
इसे असानी से समझने के लिए मान लीजिए कि पहले अगर कोई भारतीय परिवार घर के खर्च के लिए अलग रखे 1000 रुपये में से खाने पर 500 रुपये से ज्यादा खर्च करता था. तो आज की तारीख में वो खर्च 500 रुपये से कम हो गया है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ताजा पेपर भारतीय सांख्यिकी संस्थान के मुदित कपूर, EAC-PM की सदस्य शमिका रवि, स्वतंत्र सलाहकार शंकर राजन, IIT हैदराबाद के गौरव धमीजा और भारतीय सांख्यिकी संस्थान की नेहा सरीन ने लिखा है. कहा गया,
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भोजन पर कुल घरेलू खर्च की हिस्सेदारी में काफी गिरावट आई है. स्वतंत्रता के बाद ये पहली बार हुआ है कि भोजन पर औसत घरेलू खर्च कुल मासिक घरेलू खर्च के आधे से भी कम है. ये महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतीक है.
वर्किंग पेपर में बताया गया है कि खाद्य श्रेणी के अंदर, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अनाज पर खर्च की हिस्सेदारी में काफी गिरावट आई है. लिखा है,
निचले 20 फीसदी परिवारों के लिए ये गिरावट बेहद महत्वपूर्ण है और पूरी संभावना है कि ये सरकार की खाद्य सुरक्षा नीतियों का असर है. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी स्कीम्स देश भर में लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देती हैं. अब परिवार अनाज की बजाय दूध, फल, अंडे, मछली और मांस जैसी पौष्टिक चीजों पर अपना पैसा खर्च कर पा रहे हैं जिससे आहार विविधता बढ़ने लगी है. आहार विविधता में वृद्धि बुनियादी ढांचे, परिवहन और भंडारण में पर्याप्त सुधार की ओर इशारा करती है.
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आहार विविधता में जिन राज्यों में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है उनमें सबसे ऊपर सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा हैं. उसके बाद बिहार और ओडिशा हैं. पेपर में बताया गया है कि आबादी के बीच आयरन की मात्रा बढ़ाने को कई कोशिशों के बावजूद एनीमिया के उपायों में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ है.
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