हिंदू आतंकी पकड़े जाने पर नाचने वालों, आतंकवाद का अभी एक ही धर्म है!
यूपी का अातंकी संदीप शर्मा जब से पकड़ा गया है, कुछ लोगों के हाथ जैसे खजाना लग गया है.
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फोटो - thelallantop
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पाकिस्तान में लश्कर ए तैयबा का ठिकाना. आतंकी संगठन का एक एचआर मैनेजर चश्मा लगाए, बगल में एके 47 रखे बैठा है. रिक्रूटमेंट जारी है. रंगरूट आते जा रहे हैं. उनका इंटरव्यू होता है. सबके लिए अलग अलग टाइप के क्वेस्चन हैं. "तुम्हारे घर में कौन कौन है, घर की हालत में क्या इजाफा चाहते हो, अल्लाह की राह पर चलते वक्त कदम बीच में वापस तो नहीं खींचोगे?" इन सवालों के जवाब देकर रंगरूटों का चयन होता जा रहा है. जिनको चुना गया है उनसे पहले 'पैकेज' की बात की जाएगी, लाख- पचास हजार जो भी हो. साथ में खाना और कपड़ा. उसके साथ जन्नत में जाने का पासपोर्ट(ये सच में देते हैं, गूगल कर लीजिए) और वहां पर 72 हूरों का वादा. वहां की शान की बात निराली है. यहां जितनी ज्यादा गोलियां खाकर अल्लाह की राह में कुर्बान होगा, वहां उतनी ही ऐश रहेगी. इस ब्रेन वॉश के हजारों वीडियो क्लिप यूट्यूब पर मिल जाएंगे.
ये तो हो गई छाती पर बम बांधकर खुद को उड़ाने वालों और बॉर्डर पार करके यहां हमला करने वालों की भर्ती. अब सवाल उठता है कि वहां इन्फॉर्मेशन चाहिए. सीधे मुंह उठाकर तो इन रंगरूटों को बॉर्डर पार नहीं करा सकते. इसके लिए ये देखा जाता है कि धमाका या हमला कहां करना है, यानी उस आतंकी कंपनी का मार्केट कहां है? मसलन उनको भारत को निशाना बनाना है तो वो यहां का विश्वसनीय बंदा चुनेंगे. जिससे सब कुछ निकलवा सकें और जिस पर किसी को शक न हो. जाहिर सी बात है कि हिंदू होगा तो उसे कोई आतंकी नहीं मानेगा. एक बार को शक भी होगा तो उसका नाम देखकर सुरक्षा एजेंसियां इग्नोर करेंगी. इस बात का आतंकी कंपनी को फुल फायदा मिलेगा. अब वो सामान्य आतंकियों से दो या तीन गुनी सैलरी और बोनस पर एक हिंदू युवक को हायर करते हैं. मल्टी नेशनल कंपनी जितना पैकेज सुनकर बेरोजगार हिंदू युवक को उम्मीद की एक किरन दिखेगी और वो उनकी कंपनी जॉइन कर लेता है. इसी तरह संदीप शर्मा ने लश्कर ए तैयबा जॉइन किया होगा.
सच ये है कि अपवादों पर पॉलिटिक्स नहीं खेलनी चाहिए. अगर कभी एक मुसलमान किसी गौरक्षक को गोली मार दे तो मोब लिंचिंग की सारी जिम्मेदारी मुसलमानों पर नहीं चली जाएगी. गाय के नाम पर हत्या करने वाले हिंदू हैं तो वही रहेंगे. उसी तरह इस्लाम के नाम पर जो ISIS या लश्कर ए तैयबा करता है उसे करने वाले मुसलमान ही रहेंगे. इसे झुठलाया नहीं जा सकता. दोनों को ये बात मान लेनी चाहिए बजाय इसके कि कहा जाए आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता या गौरक्षकों का कोई धर्म नहीं होता. इसी इग्नोर करने और अपवादों पर खेलने की प्रवृत्ति ने तो हर तरह के चरमपंथ को खुराक पानी दिया है. अपवाद का फायदा उठाने वालों ने ही तो सत्यानाश किया है.
धर्म के नाम पर आतंक फैलाना एक ऊंची क्वालिटी का बिजनेस है. मार्केट के हिसाब से उसमें इनवेस्ट किया जाता है. अकेला संदीप शर्मा बिना पकड़ में आए लश्कर की उतनी मदद कर सकता था जितनी वहां के 10 रंगरूट नहीं कर सकते थे. इसलिए संदीप को तगड़े लालच पर काम करने के लिए राजी किया गया होगा. देश से गद्दारी, जान की बाजी, देशभक्ति ये सब फेसबुक ट्विटर वाली बाते हैं. सच ये है कि अच्छा ऑफर देकर एक देश पर हमला करने के लिए एक आतंकी भर्ती करना कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन इससे न तो आतंक का धर्म बदल जाएगा, न उनकी स्ट्रैटजी. अच्छा ये है कि हम खुद सच को स्वीकार करने की क्षमता अपने अंदर पैदा करें.
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अब बात मुद्दे की
जब से संदीप शर्मा पकड़ में आया है और पता चला है कि वो यूपी का है और वो एक हिंदू है, तब से एक तबका खुशी में ऐसे नाच रहा है जैसे गड़ा हुआ खजाना मिल गया हो. वो किसी भी तरह ये साबित करने में लगे हुए हैं कि हिंदू भी आतंकी हो सकता है. सच ये है कि ये अपवादों पर खेलने वाले लोग हैं. बैलेंस बनाने की इतनी उकताहट है कि न तो गहराई से सोच पा रहे हैं न ही बड़े लेवल पर देख पा रहे हैं. ऐसा लगता है कि इन्होंने मान लिया था कि हिंदू भी आतंकी हो सकता है, बस उसे प्रूव करने के लिए एक मोहरे की जरूरत थी. वो संदीप शर्मा के रूप में सामने आ गया. ये उस बात का काउंटर है कि देखो हर आतंकी मुसलमान नहीं होता.
सच ये है कि अपवादों पर पॉलिटिक्स नहीं खेलनी चाहिए. अगर कभी एक मुसलमान किसी गौरक्षक को गोली मार दे तो मोब लिंचिंग की सारी जिम्मेदारी मुसलमानों पर नहीं चली जाएगी. गाय के नाम पर हत्या करने वाले हिंदू हैं तो वही रहेंगे. उसी तरह इस्लाम के नाम पर जो ISIS या लश्कर ए तैयबा करता है उसे करने वाले मुसलमान ही रहेंगे. इसे झुठलाया नहीं जा सकता. दोनों को ये बात मान लेनी चाहिए बजाय इसके कि कहा जाए आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता या गौरक्षकों का कोई धर्म नहीं होता. इसी इग्नोर करने और अपवादों पर खेलने की प्रवृत्ति ने तो हर तरह के चरमपंथ को खुराक पानी दिया है. अपवाद का फायदा उठाने वालों ने ही तो सत्यानाश किया है.
धर्म के नाम पर आतंक फैलाना एक ऊंची क्वालिटी का बिजनेस है. मार्केट के हिसाब से उसमें इनवेस्ट किया जाता है. अकेला संदीप शर्मा बिना पकड़ में आए लश्कर की उतनी मदद कर सकता था जितनी वहां के 10 रंगरूट नहीं कर सकते थे. इसलिए संदीप को तगड़े लालच पर काम करने के लिए राजी किया गया होगा. देश से गद्दारी, जान की बाजी, देशभक्ति ये सब फेसबुक ट्विटर वाली बाते हैं. सच ये है कि अच्छा ऑफर देकर एक देश पर हमला करने के लिए एक आतंकी भर्ती करना कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन इससे न तो आतंक का धर्म बदल जाएगा, न उनकी स्ट्रैटजी. अच्छा ये है कि हम खुद सच को स्वीकार करने की क्षमता अपने अंदर पैदा करें.
चलते चलते
10 जुलाई को रात साढ़े आठ बजे अनंतनाग में अमरनाथ यात्रियों का जत्था जा रहा था. उस जत्थे की एक बस पर आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की. 7 लोग मारे गए और 20 के करीब घायल हुए. उधर हमले की खबर आई, इधर कोसाई कार्यक्रम चालू हो गया. कोई सरकार को कोस रहा है कोई सरकार पर सवाल उठाने वालों को कोस रहा है. कोई अजीत डोवाल से सवाल कर रहा है, कोई प्रधानमंत्री से, कोई #NotInMyName वालों के नाम पर्ची काट रहा है तो कोई अवॉर्ड लौटाने वालों को गालिया दे रहा है. कोई मुसलमानों को निशाने पर लिये है तो कोई पूछ रहा है "तब क्यों नहीं बोले थे?" कुछ लोग फिर से बैलेंस बनाने में लग गए हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. लेकिन कश्मीर में आतंकवाद का धर्म भी है, वर्चस्व की लड़ाई भी. पैसा कहां से आ रहा है, पत्थर कहां से आ रहा है ये सबको पता है. एक दो और संदीप शर्मा पकड़ जाने से आतंकवाद का धर्म परिवर्तन नहीं होगा. फिर भी किसी आतंकी हमले पर हर मुसलमान से सवाल पूछना बंद कीजिए, नहीं तो ऐसे हिंदू आतंकी पकड़े जाने पर जश्न मनाने वालों की संख्या बढ़ती जाएगी.ये भी पढ़ें:
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